दस्तक में आज प्रस्तुत .

सदियाँ बीत गईं

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सूनी रात में
नि:शब्द एक तारा
अपने आखिरी क्षण का प्रकाश लिए
निराशाओं में टूटता है

जाग जातीं इचछाएं
आत्मीयता से भरा देखता हूँ
अपने संसार को

पहाड़ पर अटके बादल
बोलते हैं आकाश के बोल
और पेड़ों का प्यार हवा गुनगुनाती है
होती है सुबह
चोटियों पर फिसलती किरणें बर्फ को नदी का कहा सुनाती हैं
धारा में बहतीं अविरल छायाएं
देह को मुक्त कर जली जातीं लम्बान में
पुकारता है अगाध

अदृश्य झरना सुनाई देता है झर-झर
छूटा हुआ आंखों में नहाता है
बर्फ में दबे बीज लेते हैं सांस
उल्लसित घास ढलानों से ऊपर
नवजात हरे को लिए चढ़ती चली जाती
नीले स्वच्छ -स्याह की ओर
बीच -बीच में पवित्र श्वेत झिलमिलाता है

भेड़ों के साथ जीवन
विस्तार में गीत गाते हुए बिचरता है

रात थकान की तरलता में
झांकते हैं तारे
नींद गहरे टिमटमाती है
इसी बीच होते हैं धमाके
इतने अचानक कि
पल-छिन में छिन्न-भिन्न
मरते जीते भागते
निरावेग देखतीं हैं
घरों की टूटी दीवारें
झुके-लुढ़के छज्जे
मलबे में दबी खिड़कियाँ और चहरे
भागते -भागते जहाँ सांस लेता हूँ
वहीं फिर गिरते हैं गोले

सदियाँ बीत गईं
अनगित मौत मरे
लेकिन नहीं जान पाए
टूटे तारों का भ्रम लिए गिरतें हैं गोले
किसकी इच्छा के लिए !

कविता : *रामकुमार तिवारी*

प्रस्तुति: *शरद कोकास*

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