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हिमांशु कुमार

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उसके दो छोटे बेटे हैं,

एक बेटे की उम्र बारह वर्ष और दुसरे की आठ वर्ष है,

बामन की पत्नी उस समय मर गई जब उसका छोटा बेटा तीन साल का था,

बामन का एक छोटा भाई भी है,

बुरकपाल गाँव के पास माओवादियों और सीआरपीएफ के सिपाहियों के बीच मुठभेड़ हुई जिसमें 25 सिपाही मारे गए,

यह खबर अखबारों में छपी,

लेकिन दूसरी खबर नहीं छपी,

दूसरी खबर यह है कि इस मुठभेड़ के अगले दिन सीआरपीएफ के सिपाही बुरकापाल गांव में गए,

सिपाहियों ने घर में काम कर रहे बामन को पकड़ लिया,

सिपाही बामन को पकड़ कर अपने साथ ले गए और थाने में ले जाकर गोली मार कर बामन की हत्या कर दी,

सिपाहियों ने लाश को थाने में ही दफना दिया,

गाँव वालों के बहुत मांगने पर एक सप्ताह बाद सड़ी गली लाश दुबारा खोद कर गाँव वालों को दे दी गई,

बामन के बच्चों की देखभाल बच्चों का चाचा करने लगा,

अभी दो महीना पहले सिपाही गाँव में आये और आदिवासियों से कहा कि आप लोगों को सरकार रोज़गार देगी सब युवक लोग जमा हो जाओ,

चालीस आदिवासी युवक गांव के बीच में एक मैदान में जमा हो गए,

इनमें बच्चों का चाचा भी था,

सिपाही इन युवकों को पकड कर ले गए और इनसे दिन भर थाने की सफाई, लकडियाँ कटवाना और भवन मरम्मत का काम करवाया,

उसके अगले दिन इन सभी युवकों को पुलिस शहर ले गई और मीडिया को बताया कि पुलिस ने बड़ी संख्या में माओवादियों को जंगल में घात लगा कर वीरता पूर्वक एक आपरेशन के बाद पकड़ा है,

इन आदिवासियों को जेल में डाल दिया गया,

बामन के दोनों बच्चों की माँ पहले ही मर गई थी,

पिता को पुलिस ने मार डाला,

चाचा को पुलिस ने धोखा देकर जेल में डाल दिया,

इसके बाद तो दोनों बच्चे पूरी तरह अनाथ हो गए,

सोनी सोरी इस गाँव में गयीं तो गाँव वालों ने इन बच्चों को उनसे मिलवाया,

सोनी सोरी इन बच्चों को अपने साथ अपने घर ले आयी हैं,

सोनी सोरी का घर इसी तरह के सरकार पीड़ितों से भरा हुआ रहता है,

माओवादी पीड़ितों के लिए तो सरकारी राहत का इंतजाम होता है,

लेकिन सरकार पीड़ित लोगों के लिए कोई इंतजाम नहीं होता,

क्योंकि सरकार कहती है कि सरकार किसी को तकलीफ नहीं देती,

वैसे अगर कोई सरकार की दी हुई तकलीफ को उजागर कर दे तो सरकार उसे झट से नक्सलवादी कहने लगती है,

बहरहाल अब दोनों बच्चे सोनी सोरी के साथ हैं,

सोनी इनकी पढ़ाई और दूसरे सभी इंतजाम करेंगी,

लेकिन सोनी सोरी को कहीं से कोई धन तो मिलता नहीं है,

तो प्रस्ताव यह है कि एक एक बच्चे की हम में से अलग अलग लोग ज़िम्मेदारी ले लें,

उनकी पढ़ाई, कपडे, किताबें, आदि पर भी मामूली खर्चा होगा,

क्योंकि सोनी सोरी कलेक्टर से बात करके इनका दाखिला सरकारी स्कूल में करवाने की कोशिश कर रही हैं,

इस तरह से अगर दूर रह कर मदद करने का कोई माडल खड़ा होता है तो हजारों और भी पीड़ित लोग हैं जिनकी मदद के लिए कोई रास्ता निकाला जा सकता है,

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हिमांशु कुमार

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