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Exclusive: बस्तर में आदिवासी महिलाओं से बलात्कार…पुलिस का शौर्य और सुरक्षाबलों का हथियार!

राजकुमार सोनी  कैचन्यूज़ 18.7.17

‘यौन हिंसा व राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएं’ नाम के संगठन ने बस्तर में माओवादी हिंसा से निपटने के लिए आदिवासी महिलाओं के साथ किए गए दुष्कर्म को पुलिस का शर्मनाक ‘शौर्य’ और ‘घेरेबंदी’ करार दिया है. बस्तर में अलग-अलग समय में हुई घटनाओं पर तथ्यान्वेषी दल की पड़ताल के बाद ‘गवाही’ नाम से तैयार की गई लगभग 144 पन्नों की रिपोर्ट में अधिवक्ता सुधा भारद्वाज, शालिनी गेरा, श्रेया, शिवानी तनेजा, महीन मिर्जा, फरीदा एएम और रिनचिन ने दावा किया है कि बस्तर में हर 40 नागरिक के पीछे एक सुरक्षाकर्मी तैनात है, जिसकी वजह से बस्तर की गिनती दुनिया के सबसे बड़े सैन्यीकृत इलाकों में होने लगी है. इस सैन्यीकरण का सबसे ज्यादा नुकसान आदिवासियों को उठाना पड़ रहा है.

सलवा-जुडूम से शुरू हुआ यौन हिंसा का दौर

 

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि आदिवासी महिलाओं के साथ दुष्कर्म पहले भी होता था, लेकिन यौन हिंसा का सबसे बुरा दौर तब देखने को मिला जब बस्तर में शांति और शुद्धिकरण के नाम पर सलवा-जुडूम प्रारंभ हुआ. मई २००६ में इंडिपेंडेंट सिटीजन्स इनिशिएटिव से जुड़े कुछ नागरिकों ने दंतेवाड़ा का दौरा करने की कोशिश की, लेकिन सुरक्षाबलों ने उन्हें उन गांवों में जाने से रोक दिया जहां महिलाएं प्रताड़ित हुई थीं.

दल के सदस्यों ने जैसे-तैसे जगदलपुर जेल में बंद एक महिला से मुलाकात की तो उसने बताया कि वह अपने भाई के साथ गांव जा रही थीं, तब सीआरपीएफ ने उसे पकड़ लिया और दस दिनों तक उसके साथ बलात्कार किया जाता रहा. महिलाओं की राष्ट्रीय स्तर की एक टीम ने भी दंतेवाड़ा का दौरा कर यह जानने की कोशिश की थी कि आखिरकार वहां की महिलाओं के साथ क्या कुछ गुजर रहा है. टीम ने अपनी पड़ताल में यह पाया था कि सुरक्षाबल से जुड़े लोग तलाशी के दौरान ही आदिवासी महिलाओं से हिंसक व्यवहार करते थे. टीम ने आंगनबाड़ी में कार्यरत एक ऐसी कार्यकर्ता से भी मुलाकात की थी जिसके साथ नागा बटालियन के 15 जवानों ने कई दिनों तक बलात्कार किया था.

टीम की सदस्यों ने जब जेल में बंद महिलाओं से मुलाकात की तो पता चला कि विशेष पुलिस अधिकारी के तौर पर ऐसी महिलाओं की भर्ती की गई थी, जिनके साथ यौन उत्पीड़न हुआ था. उन्हें सुरक्षा बलों के पुरुषों को यौन सेवाएं देने के लिए मजबूर किया गया था. राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग ने दिसम्बर 2007 में दौरा किया, तब कई लोगों ने अपने रिश्तेदारों के मारे जाने और महिलाओं के साथ यौन हिंसा के अनुभव साझा किए.

एक गांव वाले ने आयोग को बताया कि उसके गांव लिंगागिरी का कोई भी व्यक्ति सलवा-जुडूम में शामिल नहीं हुआ था, इसलिए जुडूम के सदस्य बार-बार गांव में आते थे और उत्पात मचाया करते थे. उन्होंने कई लोगों को जान से मारा और मेरी भतीजी के साथ बलात्कार भी किया. रिपोर्ट में कहा गया है कि जब सलवा-जुडूम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगी तब 99 शपथ पत्र ऐसे थे, जिसमें सलवा-जुडूम के सदस्यों पर बलात्कार के आरोप लगाए गए थे, लेकिन इन फैसलों के पांच साल बाद भी किसी भी एक प्रकरण में प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है.

रिपोर्ट में मार्च 2011 में कोया कमांडो, कोबरा और विशेष पुलिस अफसरों के द्वारा मोपल्ली, ताड़मेटला और तिम्मापुर गांवों को जला देने के बाद वहां रहने वाली आदिवासी महिलाओं से दुष्कर्म का भी उल्लेख किया गया है. बताया गया है कि इन गांवों के लोग अब भी न्याय की बाट जोह रहे हैं.

पुलिस अफसर को मिला मेडल

रिपोर्ट में कहा गया है कि अक्टूबर 2011 में एक आदिवासी वार्डन सोनी सोरी को माओवादी समर्थक होने का झूठा आरोप लगाकर हिरासत में ले लिया गया था. उसके बाद उसे बिजली का कंरट दिया गया और पुलिसकर्मियों ने उसके गुप्तांग में पत्थर भी डाले. सोरी को दी गई इस यातना के बदले एक पुलिस अफसर अंकित गर्ग को राष्ट्रपति का गैलेंट्री अवॉर्ड देकर यौन हिंसा को शौर्य का प्रतीक बना दिया गया.

रिपोर्ट में बस्तर के चिन्नागेल्लूर, गुंडम, बुर्गीचेरू, नेन्द्रा जैसे गांवों में घटित घटनाओं के हवाले से कहा गया है कि जब तलाशी अभियान के दौरान घर के पुरुष गोलीबारी से बचने के लिए जंगलों की ओर भागे तब सुरक्षाबलों ने महिलाओं के साथ ज्यादती की. सुरक्षाबलों के दिमाग में यह धारणा बैठी हुई थी कि जो महिला नक्सली होती है वह शादी नहीं करती इसलिए उसके स्तन से दूध नहीं निकलता.

इस धारणा को पुख्ता करने के लिए महिलाओं के स्तन को निचोड़कर देखा गया. कई महिलाओं से नग्न परेड करवाई गई. रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं के साथ हिंसक यौन व्यवहार के चलते ही राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की एक टीम ने तीन से पांच अप्रैल 2016 के बीच इलाके का दौरा कर प्रभावितों का हाल-चाल जाना था. आयोग ने यह माना था कि महिलाओं के साथ दुष्कर्म की वारदातों में पुलिस का रवैया असंतोषजनक है. इसी क्रम में 7 जनवरी 2017 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस देते हुए कहा कि बस्तर में 16 महिलाओं के साथ पुलिस और सुरक्षाबलों ने यौन हिंसा की है.

‘मोदी कहेंगे तो तुम्हारा गांव भी जला देंगे’

‘यौन हिंसा व राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएं’ संगठन से जुड़ी महिलाओं ने कई गांवों में पीड़ित महिलाओं से मुलाकात के बाद यह पाया कि दुष्कर्म के ज्यादातर मामलों का पैटर्न एक जैसा है. हर गांव में सुरक्षाबल के लोग तब दाखिल होते रहे हैं जब गांव के पुरुष जंगल में रहते थे. जो लड़कियां जंगल में मवेशी चराने या महुआ बीनने गई उनके साथ भी दुष्कर्म किया गया. दुष्कर्म करने के बाद सुरक्षाकर्मी धमकी देना भी नहीं भूले. बीजापुर की एक महिला से सुरक्षाकर्मी ने कहा कि यदि किसी से शिकायत की, तो जिस तरह से पेड़ को हिलाने से पत्ते गिरते हैं वैसे ही तुम्हारे आदमी जमीन पर गिरेंगे. एक महिला ने अपनी गवाही में कहा कि सुरक्षाबल ने उससे कहा है कि यदि नरेंद्र मोदी हमें कहेंगे तो हम तुम्हारा गांव भी जला देंगे.

मुकदमा चलाने की मांग

रिपोर्ट में माओवादी समस्या का राजनीतिक तरीके से समाधान तलाशने की बात कही गई है. इसके अलावा यौन हिंसा के लिए सैन्यीकरण की सभी ईकाइयों को भंग करने के साथ यौन हिंसा में लिप्त पूर्व माओवादियों, सलवा-जुडूम के सदस्यों, जिम्मेदार पुलिसकर्मियों और सुरक्षाबलों पर अपराधिक मामला दर्ज कर मुकदमा चलाने की मांग की गई है. पीड़ित महिलाओं को न्याय कैसे मिल सके, इस दिशा में भी कुछ अहम सवाल उठाए गए हैं.

 राजकुमार सोनी 
कैच न्यूज़

First published: 18.7.17

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