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1984 में जबलपुर में एक दस दिवसीय कविता शिविर मायाराम सुरजन जी ने करवाया था जिसमे नवोदित कवि प्रशिक्षणार्थी के रूप में छत्तीसगढ़ से मैंने भाग लिया था । परसाई जी , डॉ कमला प्रसाद , भगवत रावत , डॉ सोमदत्त गर्ग ,डॉ मलय ,राजेन्द्र शर्मा , धनंजय वर्मा , राजेश जोशी और दूसरा सप्तक के कवि हरिनारायण व्यास जैसे वरिष्ठ साहित्यकार हमारे प्रशिक्षक थे । कविता के विभिन्न पहलुओं पर लगातार दस दिनों तक बातें होती रही । फिर सब युवाओं को एक एक पंक्ति दी गई जिस पर हमें कविता लिखनी थी । मुझे पंक्ति मिली थी ” कल का दिन बिगड़ी मशीन सा था*” । *इस पंक्ति पर जो कविता मैंने लिखी थी वह यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ।*
*बाद में सन 85 में शिविरार्थियों की कविताओं को श्री हरिशंकर अग्रवाल ने पिपरिया से निकलने वाली अपनी पत्रिका आकंठ में प्रकाशित किया ।*

1 .⭕ *बीता हुआ दिन* ⭕

कल का जो दिन बीता
बिगड़ी हुई मशीन सा था
कल कितनी प्रतीक्षा थी
हवाओं में फैले गीतों की
गीतों को पकड़ते सुरों की
और नन्हे बच्चे सी मुस्कराती
ज़िन्दगी की

कल का दिन
बिगड़ी हुई मशीन सा था
कल राजाओं के
मखमली कपड़ों के नीचे
मेरे और तुम्हारे
उसके और सबके
दिलों की धड़कनें
काँटे में फँसी मछली सी
तड़पती थीं

सचमुच प्रतीक्षा थी तुम्हारी
ओ आसमान की ओर बहती हुई हवाओं
तुम्हारी भी प्रतीक्षा थी
लेकिन कल का दिन
बिगड़ी हुई मशीन सा था

कल का वो दिन
आज फिर उतर आया है
तुम्हारी आँखों में
आज भी तुम्हारी आँखें
भेड़िये की आँखों सी चमकती हुई
कल का खेल
खेल रही हैं ।
**

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*कविता*

2 .⭕ *हमारे हाथ अभी बाकी हैं* ⭕

कल रात मेरी गली में एक कुत्ता रोया था
और उस वक़्त आशंकाओं से त्रस्त कोई नहीं सोया था
डर के कारण सबके चेहरे पीत थे
किसी अज्ञात आशंका से सब भयभीत थे
सब अपने अपने हाथों में लेकर खड़े थे अन्धविश्वास के पत्थर
कुत्ते को मारने के लिये तत्पर
किसीने नहीं सोचा
कुत्ता क्यों रोता है
उसे भी भूख लगती है
उसे भी दर्द होता है

हम भी शायद कुत्ते हो गए हैं
इसलिए खड़े हैं उनके दरवाज़ों पर
जो नहीं समझ सकते
हमारे रूदन के पीछे छिपा दर्द

उनके हाथों में हैं वे पत्थर
जो कल हमने तोड़े थे चट्टानों से
बांध बनवाने के लिए
या अपने गाँव तक जाने वाली
सड़क पर बिछाने के लिए

उनका उपयोग करना चाहते हैं वे
कुचलने के लिये हमारी ज़ुबान
चूर करने के लिए
हमारे स्वप्न और अरमान
वे जानते हैं
हमें जो कहनी है
वह बात अभी बाकी है

ज़ुबानें कुचले जाने से नहीं डरेंगे हम
हमारे मुँह में दाँत अभी बाकी हैं

लेकिन हम आदमी हैं कुत्ते नहीं
आओ उठे दौड़ें
और छीन लें उनके हाथों से वे पत्थर
हमारे हाथ अभी बाकी हैं
हमारे हाथ अभी बाकी हैं
**

*1983-84 में डॉ सुरेंद्र दुबे दुर्ग आए । वे व्यंग्य कविताएँ लिखते थे । भाई महावीर अग्रवाल के साथ वे रायपुर के अमृत संदेश कार्यालय जाते थे । उन दिनों उनकी कविता श्रंखला वेताल उवाच इस अखबार में छपना शरू हुई । हरि सेन इस श्रंखला के चित्रकार थे । बाद में सुरेंद्र भैया मंच की ओर मुड़ गए और हास्य व्यंग्य के सुविख्यात कवि हुए । मुकुंद कौशल भी उन दिनों सुविख्यात कवि थे , कवि सम्मेलन के अखिल भारतीय मंचों पर उनके नाम की धूम थी । इन दोनों बड़े भाइयों ने मुझे सलाह दी कि मैं भी मंचों पर जाना शुरु करूँ ।*
*सुरेंद्र भैया से घरोबा रहा , उनके घर अक्सर जाता था और डाइनिंग टेबल बजाकर फिल्मी गाने गाता था । उन्होंने सलाह दी … “तुम प्रेम गीत लिखो , दिखते भी सुंदर हो ,गाते भी अच्छा हो , कुछ ही दिनों में देश भर में छा जाओगे “*
*लेकिन मेरी रुचि समकालीन कविता के शिल्प में थी , मेरा युवा आक्रोश व्यवस्था के प्रति था किसानों मजदूरों और आम आदमी के दुख में मेरा दुख चैन पाता था सो मैं उन्ही के लिए कविता लिखता रहा*

*लेकिन बड़े भाइयों की सलाह थी सो उनके साथ मंचों पर भी मैं जाता रहा औऱ आक्रोश की समकालीन कविता को उसी अंदाज में प्रस्तुत करता रहा ।* *कविता वही होती थी जो पत्रिका में छपती थी लेकिन मंच पर उसका पाठ और प्रस्तुतिकरण इस अंदाज में होता कि वह तालियाँ बटोर लेती* ।

*ऐसी ही मेरी एक कविता “आज का पितामह” यहाँ प्रस्तुत है जो आज भी मंच पर खूब पसंद की जाती है* –

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3 .⭕ आज का पितामह ⭕

क्या आप सोच सकते हैं
भीष्म पितामह की तरह
सर से पाँव तक
असंख्य तीरों से बिन्धकर भी
कोई ज़िन्दा रह सकता है

अगर आप ध्यान से सोचें तो
इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं
मेरे देश के आम परिवार का पितामह
कितने ही तीर खाकर अब तक ज़िन्दा है
महंगाई का तीर लाचारी का तीर
भुखमरी का तीर बेगारी का तीर
ग़रीबी का तीर बेरोज़गारी का तीर
भ्रष्टाचारी का तीर अत्याचारी का तीर
अशिक्षा का तीर कुशिक्षा का तीर
दंगई का तीर और नंगई का तीर
हदबन्दी का तीर चकबंदी का तीर
वोटबंदी का तीर और नोटबन्दी का तीर

ताज़ा ताज़ा इलेक्शन जीता हुआ पार्थ
असमंजस में है
पितामह को सिरहाना देने हेतु
तरकस में अब केवल
आश्वासन का तीर बाक़ी है

भूख-प्यास से अधीर तात के लिये
जमीन पर
राहत कार्य का तीर चलाने से पहले
पार्थ डरता है
कहीं विपक्षी दल
पाइप लाइन फोड़ने का आरोप लगाकर
संसद से बहिष्कार न कर दे

उसकी नियति तो यही है कि
वह शर शैय्या पर पड़ा पड़ा
प्रजातंत्र के पाँसों का कमाल देखता रहे
गरीब को होते देखे नंगा
और किसीको लाखों का सूट पहने
मालामाल देखता रहे

उसकी नज़रों के सामने है रणभूमि
जहाँ हैं ध्वज
हरे ध्वज
नीले ध्वज
लाल ध्वज
भगवे और रंगबिरंगे
ध्वजों के दंड थामे हैं मठाधीश
ऊँचे ऊँचे आसनों पर विराजमान
मैं फलाना मैं ढिकाना
मैं अमका मैं तमका
जैसी टोपी लगाये हैं लोग
उखाड़ रहे हैं माइक
चार टांगों पर टिकी कुर्सी के लिये
कुत्तों की तरह आपस में लड़ रहे हैं
रथी अधीरथी और महारथी

लेकिन यह सब देखने के बावज़ूद
पितामह अभी मरेगा नहीं
अभी तो देखना शेष है
इस सड़ी-गली व्यवस्था के
चक्रव्यूह को टूटते हुए

मुझे यकीन है
कल को यह पितामह
मौत के विरुद्ध
ज़िन्दगी के पक्ष में लड़ने हेतु
फिर उठ खड़ा होगा
निकालकर फेंक देगा वह
अपने शरीर से एक एक तीर
क्योंकि उसे इच्छामृत्यु का नहीं
इच्छाओं के साथ जीने का वरदान प्राप्त है ।

*शरद कोकास*

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*1981 में जब मैं कॉलेज से निकलकर नौकरी के लिए छत्तीसगढ़ आया तो सबसे पहले सेक्टर 2 भिलाई में अपने चाचाजी मनोहरलाल कोकाश जी के यहाँ चार माह रहा । चूँकि मेरी पोस्टिंग स्टेट बैंक की दुर्ग ब्रांच में थी और रोज़ आना जाना अखरता था इसलिये मैंने दुर्ग में एक कमरा किराए पर लिया और यहाँ शिफ्ट हो गया ।*

*दुर्ग के साहित्यिक मित्रों से परिचय के साथ ही भिलाई के वरिष्ठ साहित्यकारों से मेरा परिचय हुआ जिनमें श्री रवि श्रीवास्तव , श्रीमती संतोष झांजी , श्री लोकबाबू , श्री अशोक सिंघई , आदि प्रमुख थे । मैं उम्र में सबसे छोटा था सो इन लोगों से बहुत स्नेह मिलता रहा । फिर भिलाई की गोष्ठियों में भी मैं जाता रहा । संतोष झांजी जी नाटकों में भी सक्रिय थीं । भिलाई के नेहरू सांस्कृतिक सदन में खूब नाटक मैंने देखे ।*

*बाद में दुर्ग इप्टा का गठन हुआ , उसमे भी मैं शामिल हुआ । दुर्ग में कुछ नाटक हमने किये जिसमे ‘श्रीमान ट की नाक कहाँ है’ यह नाटक मुझे याद है । फिर भिलाई के मणिमय मुखर्जी , राजेश श्रीवास्तव , विभाष उपाध्याय जैसे रंगकर्मियों से मित्रता हुई ।* *परमेश्वर वैष्णव , नासिर अहमद सिकन्दर , मुमताज़ विनोद मिश्र जैसे साहित्यकारों से भी मित्रता हुई।*

*दुर्ग में स्टेट बैंक के हमारे मित्र विनायक अग्रवाल क्षितिज रंगशिविर में संतोष जैन के साथ सक्रिय थे । उनके साथ मैंने भी संस्था जॉइन की और प्रेम साइमन के लिखे नाटक ‘ विरोध’ और ‘मुर्गीवाला’ में अभिनय भी किया । भोपाल में भी इन नाटकों की प्रस्तुति रविन्द्र भवन में हुई ।*

*मेरा मन कविता में ज़्यादा लगता है इसलिए नाटकों की ओर मैं नही गया लेकिन नाटक और रंगमंच पर मैंने कई कविताएँ लिखीं* ।

*ऐसी ही एक कविता यहाँ प्रस्तुत है । इसका पाठ भी अक्सर मंच पर करता हूँ । यह कविता संतोष झांजी जी को विशेष रूप से पसंद है ।*

◆◆◆◆◆◆◆◆

*कविता*

4 .⭕ नाटक में काम करने वाली लड़की ⭕

पिता हुए नाराज़
भाई ने दी धमकी
माँ ने बन्द कर दी बातचीत
उसने नाटक नहीं छोड़ा

घर में आए लोग
पिता ने पहना नया कुर्ता
माँ ने सजाई बैठक
भाई लेकर आया मिठाई

वह आई साड़ी पहनकर
चाय की ट्रे में लिए आस

सभी ने बांधे तारीफों के पुल
अभिनय प्रतिभा का किया गुणगान

चले गए लोग
वह हुई नाराज़
उसने दी धमकी
बन्द कर दी बातचीत

घरवालों ने नाटक नहीं छोड़ा ।

*शरद कोकास*

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*किसी भी व्यक्ति के जीवन मे 20 से 30 साल की उम्र बहुत खास होती है । मेरा यह समय दुर्ग में बीता । ज़ाहिर है कोई इस उम्र में प्रेम भी करेगा और कवि होगा तो प्रेम कवितायें भी लिखेगा । सो मैंने भी कुछ प्रेम कविताएं उन दिनों लिखीं ।*
*झील से प्यार करते हुए श्रृंखला की यह कविताएँ भिलाई के वरिष्ठ साहित्यकार त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय जी को विशेष रूप से पसन्द थीं । जब संकलन में यह कविताएँ आईं तो उन्होंने आग्रह किया कि मैं किसी दिन उनके घर आकर एकल काव्य पाठ करूँ ।*

*मुझे बहुत अफसोस है कि उनके इस संसार मे रहते हुए उनकी इच्छा मैं पूरी नहीं कर पाया।*

*उस श्रृंखला की एक कविता प्रस्तुत है*

— शरद कोकास

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5 .⭕ *झील से प्यार करते हुए – दो* ⭕

वेदना सी गहराने लगती है जब
शाम की परछाईयाँ
सूरज खड़ा होता है
दफ्तर की इमारत के बाहर
मुझे अंगूठा दिखाकर
भाग जाने को तत्पर

फाइलें दुबक जाती हैं
दराज़ों की गोद में
बरामदा नज़र आता है
कर्फ्यू लगे शहर की तरह

ट्यूबलाईटों के बन्द होते ही
फाइलों पर जमी उदासी
टपक पड़ती है मेरे चेहरे पर

झील के पानी में होती है हलचल
झील पूछती है मुझसे
मेरी उदासी का सबब
मैं कह नहीं पाता झील से
आज बॉस ने मुझे गाली दी है

मैं गुज़रता हूँ अपने भीतर की अन्धी सुरंग से
बड़बड़ाता हूँ चुभने वाले स्वप्नों में
कूद पड़ता हूँ विरोध के अलाव में
शापग्रस्त यक्ष की तरह
पालता हूँ तर्जनी और अंगूठे के बीच
लिखने से उपजे फफोलों को

झील रात भर नदी बनकर
मेरे भीतर बहती है
मै सुबह कविता की नाव बनाकर
छोड़ देता हूँ उसके शांत जल में
वैदिक काल से आती वर्जनाओं की हवा
झील के जल में हिलोरें पैदा करती है
डुबो देती है मेरी कागज़ की नाव

झील बेबस है
मुझसे प्रेम तो करती है
लेकिन हवाओं पर उसका कोई वश नहीं है ।

*शरद कोकास*

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