शशि दुबे की कविताएँ
दस्तक में आज प्रस्तुत
12 जुलाई 17
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मेरा परिचय कोई खास नहीं।हां लिखती बचपन से हूँ।घर का माहौल साहित्यिक था।मैं ने एम एस सी की पर साइंस विषय भी मेरी साहित्य के प्रति रुचि को कम नहीं कर पाया।हां कुछ समय तक मैं परिवार में ब्यस्त रही,फिर लेखन से जुड़ गई।बहुत सारी उपलब्धियां तो नहीं हैं मेरे पास पर फिर भी लेखन मुझे आत्मिक सन्तोष देता है।
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तवायफ
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तवायफ शब्द
कानों में पड़ते ही
आँखों पर
एक चित्र छा जाता है
बेहयाई का
बेशर्मी का
स्वछंदता का
सामाजिक निर्बन्धता का
सिकुड़ जाती है
हमारी आँखें,
आ जाता है
मुख पर
घृणा का भाव
मुंह बिचकाकर
प्रदर्शित करते हैं
उनके प्रति उपेक्षा
ब्यक्त करते है,
नफ़रत करते हैं इनसे
दूर ही रखते हैं
अपनी बहू,बेटियों को
मानों ही छूत की बीमारी
वैसा ही करते हैं हम
जैसा करते हैं
गन्दी,बजबजाती
नालियों को देखकर
में प्रतिक्रिया में
थूक देते हैं
निकाल बाहर करते हैं
भीतर तक
पसर गई
गंदगी को
भूल जाते हैं हम
गर ये गन्दगियाँ
नाली में न बजबजातीं
तो पूरा शहर,आपका घर
बजबजा उठता
दुर्गंध फैल जाती
फिर हम कहां, कहां थूकते
छींटे हम पर ही पड़ते
इन नालियों के रहने से ही
हमारा घर,आंगन पवित्र है
तुलसी चौरे पर भीनी
अगरबत्ती की सुगंध है
ये तवायफें भी
वैसे ही समेट लेती हैं
समाज की सारी गंदगी
बचाती हैं
शरीफजादियों को
भेड़ की खाल ओढ़े भेड़ियों से
मासूम दिखते
विकृत मानसिकता वाले हैवानों से
अरे ये वो हैं
जो चंद सिक्कों के बदले
झेलती हैं,जिल्लतें
शरीर पर अनचाहे
हाथों का स्पर्श
लिजलिजा जाती हैं ये
पर शरीफ़ औरतों की
आबरू पर आंच
आने से बचाती हैं
समाज को रखती हैं,मर्यादित
सहेजती हैं,नफ़रतें
सम्माननीय इनके पास जाकर
और सम्माननीय बनते हैं
पर ये मान का एक शब्द भी नहीं पातीं
ये तवायफ़ भी खुद नहीं बनतीं
कोई न कोई मज़बूरी
इन्हें इस दर पर लाती है
हवस पुरुषों की उठती है
तवायफ़ ये कहलाती हैं।
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‬बस थोड़ी देर बाद
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मेरे बेटे
जब तुम छोटे थे
मेरे हाथों को रहता
बहुत सारा काम
मिल नहीं पाता था
जरा भी आराम
तुम चाहते थे मैं
हर पल रहूं तुम्हारे साथ
पर मैं कहती
आती हूं बेटा
बस थोड़ी देर बाद।

1 तुम्हारी आँखें ,मुझे देखते ही
विहँस उठतीं
अंग,अंग चपल हो उठता
दोनों हाथों को उठा कहते
माँ लो सीने से लगा
पर मैं तुम्हें झूले में लिटा
कहती आती हूं बेटा
बस थोड़ी देर बाद

2 तुमने सीखा था
नया,नया चलना
चाहते थे
बस चलते ही रहना
दिखाना चाहते थे,मुझे
अपने नन्हें परों की उड़ान
सुनना चाहते थे,वाह, वाह
पर मैं, तुम्हारे गालों को थपथपा
कहती थी
आती हूं बेटा
बस थोड़ी देर बाद

3 वो,तुम्हारे छोटे छोटे से खेल
जो होते थे,तुम्हारे लिये खास
खेलना चाहते थे मेरे साथ
पर मैं, तुम्हें खिलौनों के बीच बिठा
कहती थी
आती हूं बेटा
बस थोड़ी देर बाद

4 तुम्हारी वो रंगीन पुस्तकें
जिनमें खींचते थे तुम
आड़ी, तिरछी रेखायें
भरना चाहते थे उनमें
तरह,तरह के रंग
मेरे संग
पर मैं, तुम्हें रंगों में सना छोड़
कहती थी
आती हूं बेटा
बस थोड़ी देर बाद।
अब बीत गये वो दिन
बीत गई वो रातें
शेष हैं सिर्फ उनकी यादें
अब नहीं है मुझे कोई काम
समय ही समय है
आराम ही आराम
करना चाहती हूं पूरे
वो सभी अधूरे काम
चाहती हूं,तुम रहो मेरे साथ
बांटना चाहती हूं पुरानी यादें
करना चाहती हूं,सुख,दुःख की बातें
पर अब तुम कहते हो
आता हूँ मां
बस थोड़ी देर बाद
,,,,

  • बेटी बचाओ
    #
    बेटी बचाओ,बेटी बचाओ
    नारा गूंज रहा चहुंओर
    सोच रही बैठी एक बेटी
    ये है कैसा ढोलमपोल
    कहती मेरे ज्वलन्त प्रश्नों का
    उत्तर पहले दो,जो दे पाओ
    फिर जाकर गुहराना जग में
    बेटी बचाओ,बेटी बचाओ

1 छिन गई पिता से जिसके
बेटी की भोली मुस्कान
छेड़, हृदय की धड़कनों को
बेसुरी कर दी,जिसकी तान
उस बेटी के खोये जीवन के
रंगीन पलों को वापस लौटाओ
फिर पिताओं से जाकर कहना
बेटी बचाओ,बेटी बचाओ

2 जीवन उसका सरल न होगा
क्या,क्या उसने सहा न होगा
मां सीता से बढ़कर उसने क्या
जहर दर्द का पिया न होगा
संभव हो तो जाकर पहले
उसके दर्द का अनुमान लगाओ
फिर जोरों से नारा देना
बेटी बचाओ,बेटी बचाओ

3 न सधवा थी,न विधवा थी
न ही वो कंवारी कन्या थी
कोई उसकी खता नहीं थी फिर भी
उपेक्छित थी,परित्यक्ता थी
जाकर हिसाब दो उन जख्मों का
फिर उसकी पहचान बताओ
तब जाकर चिल्लाना जग में
बेटी बचाओ,बेटी बचाओ

4 किस पिता की छाती में दम जो
सह सके बोझ, बेटी के टूटे सपनों का
तिल, तिल मरती देख हंस सके
मोल कर सके,सूनी आँखों का
उन सूनी आँखों में लाकर
सपने कुछ रंगीन सजाओ
फिर तुम सबसे जाकर कहना
बेटी बचाओ,बेटी बचाओ

5 आये दिन निर्भया बढ़ रहीं
न जी पातीं न मर रहीं
बाहर जातीं तो दानव हैं
भीतर भी सियार मानव हैं
उन भोली मासूमों का खोया
आत्मसम्मान लौटाओ
फिर समाज से जाकर कहना
बेटी बचाओ,बेटी बचाओ

 

  • 6 पढ़ी लिखी हों या अनपढ़ हों
    बाहर से हंसती दिखती हैं
    दिल छलनी हो रहा सभी का
    जीना मुश्किल हो गया सभी का
    जाकर पहले उनके हिस्से का
    आसमान उनको लौटाओ
    फिर गर्व से कहना जाकर
    बेटी बचाओ,बेटी बचाओ
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    शशी दुबे द्वारा दस्तक में प्रस्तुत कविताएँ
    दिनांक 12 जुलाई 17

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