प्रतिभा गोटीवाले* की कविताएँ – दस्तक में आज प्रस्तुत

प्रतिभा गोटीवाले* की कविताएँ – दस्तक में आज प्रस्तुत

मित्रो,
आज समूह पर प्रस्तुत हैं समूह की साथी *प्रतिभा गोटीवाले* की कविताएँ. कविताएँ पढ़ें और इन पर बात ज़रूर करें..

दस्तक में आज प्रस्तुत अनिल करमेले

*|| अग्नि परीक्षा ||*

तुम ने कहा प्रेम
और मैंने मान लिया
तुमने कहा समर्पण
मैंने वो भी मान लिया
पर जब मैंने दोहराया प्रेम
तुमने कहा साबित करो ?
मैंने कहा समर्पण
तुमने फिर कहा प्रमाण दो
सहम गई थी मैं
देह की गवाही
बड़ी मुश्किल से
प्रमाणित कर पाई थी
कटघरे में खड़े
मासूम मन की सच्चाई
जाने क्यों होता आया है ऐसा
की होठों से निकलते ही
तुम्हारे शब्द बनते रहे
पत्थर की लकीर
और मेरे शब्द
मेरे ही खिलाफ रचते रहे
चक्रव्यूह
मन उकसाता रहा
शब्द होठों से झरते रहे
और हमेशा अग्नि परीक्षा से
गुजरती रही देह
जानते हो मैंने बोलना
कम कर दिया हैं
शब्दों से डर लगने लगा है
मुझे आजकल…।

*|| बीते हुए दिन ||*

कई बार होता है
कि समय की नदी में
बहते बहते
कुछ पुराने दिन
छुप जाते हैं
समय की नजर बचा
लम्हों की सीपियों में, शंखों में…
या अटक जाते हैं
यादों की झाड़ियों में,
कुछ बनकर रेत
जमने लगते हैं किनारों पर
और फिर कभी किसी दिन
जब तुम टहलने निकलते हो
इस रेत पर
तो अकस्मात मिलते है खजाने
शंखों के, सीपियों के…
हाथों में लेते ही
इनमें दुबके हुए पुराने दिन
निकल आते हैं बाहर
या झरते हैं झाड़ियों से…
बनकर फूल
और तुम जी आते हो
बहुत पुराना…
एक बीता हुआ दिन।

*|| काश ||*

*(एक)*

जब भी याद आती हैं पुरानी बातें
तो हँस पड़ता हूँ सोचकर
कि कैसे
तुम खिलाती थी
हर एक बात पर कसम
खाने की कसम,
खत लिखने की कसम,
घर जल्दी लौटने की कसम
मैं हँसकर कहता था…
यार ! क्या आम की तरह
मर्तबानों में भर रखे हैं तुमने
कसमों के अचार, चटनी, मुरब्बे
हर बात के साथ
एक लपेट कर दे देती हो
तुम कहती कुछ नहीं थी
बस हँस देती थी
आज जब तुम नहीं हो कहीं
बेहद याद आते हैं
कसमों के वो खट्टे, मीठे, कसैले स्वाद
मन में लिए एक आस
घूमता हूँ गली दर गली खानाबदोश
ये सोचता हुआ
काश… कहीं रोक ले कोई
मीठी सी एक कसम देकर…।

*(दो)*

कल खोलते ही अलमारी
आ गया था हाथों में…
तुम्हारी साड़ी का आँचल
और बरबस ही
हँस पड़ा था मैं देखकर
किनारे पर बँधी गाँठें
जब ढूँढ़ते ढूँढ़ते कोई चीज
परेशान हो जाती थी तुम
तो बांध लेती थी
एक गाँठ पल्लू में
और मिल जाती थी
खोई चीजें
सोचता हूँ
काश… ऐसा हो
मैं भी बांधू एक गाँठ
और मिल जाओ …तुम।

*|| तुम्हें याद करते हुए ||*

तुम्हे याद करते हुए
मेरे शहर की झील
बिलकुल तुम्हारी आखों जैसी
दिखाई देने लगती हैं
जिसके पानी में
एक पहेली सा
दिखता है
मेरा अक़्स
अगले ही पल लहरे
खंगाल कर अपनी स्मृतियाँ
निकाल लाती हैं तुम्हारी परछाई
और हल कर देती हैं पहेली
मैं मुस्कुरा उठती हूँ तुम्हारे साथ ।

तुम्हे याद करते हुए
मेरे शहर की फ़िज़ाएं
उस मौसम का पीछा करने लगती हैं
जिसके कांधो से उतर कर
बादल खो गए हैं शहर में
अब उनके हर कदम पर
एक जंगल उग आया हैं
और उन्ही जंगलो में
उन्हें तलाशता मौसम
फ़िर लौटने के वादे के साथ
फ़िज़ाओं से विदा लेता हैं
बरबस ही भीग जाती हैं मेरी आँखे ।

तुम्हे याद करते हुए
भारत भवन की सीढ़ियाँ
ग़मगीन सी एक दूसरे के काँधो पर
टिकाए अपना सिर
बैठी रहती हैं ताकते हुए शून्य
और कैफेटेरिया के हर कोने से टूटती हैं
तुम्हारी आवाज़
मैं और टेबल अक्सर बातें करते हैं
एक ख़ाली कुर्सी से
कि अचानक यशवंत सवालिया निगाहों से
देखता हैं मुझे
और जवाब में मैं मुस्कुराकर
बस इतना कहती हूँ उससे
“लेकिन चाय हमेशा की तरह दो ही लाना… यशवंत ।”

✍🏻 *प्रतिभा गोटीवाले*

*दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले*

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