ईश्वर का बहिष्कार   _राधामोहन गोकुलजी-  दस्तक के लिए प्रस्तुति अमिताभ मिश्र

ईश्वर का बहिष्कार _राधामोहन गोकुलजी- दस्तक के लिए प्रस्तुति अमिताभ मिश्र

दोस्तों राधामोहन गोकुल जी का एक आलेख ईश्वर का बहिष्कार साझा करने की जुर्रत कर रहा हूँ। निबंध लंबा है। इसके चार हिस्से हैं जिन्हें हम इस शनिवार से चार हिस्सों में साझा करेंगे। ये महत्वपूर्ण वक्तव्य है जिसे पढ़ें और बात करें। यह पहला हिस्सा है। हर हिस्सा अपने आप में पूर्ण है। तो पढें जरूर और बात भी करें।

*ईश्वर का बहिष्कार*

*राधामोहन गोकुलजी*

(राधामोहन गोकुलजी राष्‍ट्रीय जागरण काल की वह विभूति थे जिनमें यूरोपीय पुनर्जागरण काल के महामानवों वाली विचारों और कर्म की एकता थी। उनमें वाल्‍तेयर, दिदेरो, और रूसो जैसे फ्रांसीसी प्रबोधनकालीन दार्शनिकों की तार्किक प्रखरता थी और बेलिंस्‍की, हर्जन, चेर्नीशेव्‍स्‍की और दोब्रोल्‍यूबोब जैसे 19वीं सदी के रूसी क्रान्तिकारी जनवादी चिन्‍तकों वाली जुझारू भौतिकवादी दृष्टि और साहसिकता भी। 19वीं सदी के अन्‍त में उन्‍होंने जाति प्रथा और रूढ़ि‍यों का विरोध किया था। 20वीं सदी के उत्‍तरार्द्ध में उन्‍होंने स्त्रियों की मुक्ति और लैंगिक समानता के बारे में जितने उग्र और वैज्ञानिक विचार अभिव्‍यक्‍त किये थे, उनका आज भी अभाव मिलता है। 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध में वे नास्तिकता और तार्किकता के उत्‍कट प्रचारक के रूप में जाने जाते थे। सोवियत क्रान्ति के समय तक वे मार्क्‍सवाद की ओर मुड़ चुके थे। वे भारत में समाजवाद के प्रचारकों की पहली पीढ़ी के सदस्‍य थे। इस तथ्‍य को कम ही लोग जानते हैं कि महाकवि निराला गोकुलजी को गुरूतुल्‍य मानते थे। प्रेमचन्‍द ने उन्‍हें आधुनिक युग के चार्वाक की संज्ञा दी थी। 20वीं सदी के प्रारम्भिक तीन दशकों के सभी साहित्‍यकार और पत्रकार उन्‍हें आदरणीय मानते थे। भगतसिंह, शिव वर्मा और एच.एस.आर.ए. के कई क्रान्तिकारियों को वैज्ञानिक समाजवाद की दिशा में मोड़ने में भी गोकुलजी का योगदान था। इस महान व्‍यक्तित्‍व का ये लेख ‘माधुरी’ (सं. प्रेमचन्‍द) में सन 1925-26 में प्रकाशित हुआ था।
राहुल फाउण्‍डेशन, लखनऊ द्वारा ये लेख और गोकुल जी की कई अन्‍य पुस्‍तकें प्रकाशित हुई हैं।)

१.
प्रकृतिवादी और केवल काल्पनिक भावनाओं में बड़ा अन्तर है। एक तो गुलाब के फ़ूल को प्रत्यक्ष देखता है- उसकी बनावट का ज्ञान और रूप-रंग आदि अनेक गुणों की जानकारी रखता है। यदि उससे गुलाब के सम्बन्ध में कोई प्रश्न करें, तो वह उसके अस्तित्व के प्रमाण में सीधी और वास्तविक दलीलों से काम लेगा और गुलाब के फ़ूल का यथार्थ ज्ञान भी करा देगा। लेकिन दूसरा गुलाबी रंग के वर्णन करने को तैयार होता है और उस दशा में, जबकि उसने स्वंय गुलाब को कभी नहीं देखा तो सीधा कोई प्रमाण नहीं दे सकता। परोक्ष और अव्यावहारिक प्रमाणों से जो वह काम लेगा तो निस्संदेह कदम-कदम पर ठोकर खायेगा। यह तो उस दशा में होता है, जबकि गुलाब कोई वस्तु है और गुलाबी रंगत, चाहे गुलाब से भिन्न द्रव्यहीन अवस्था में उसका देखना असंभव हो, कोई ऐसी चीज है, जिसे हम आँखों से देख सकते हैं।

ईश्वर एक ऐसा कल्पित पदार्थ है, जिसे कभी किसी ने अपनी ज्ञानेन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहीं किया इसलिए कि उसका सर्वथा अभाव है। ईश्वर कोई ऐसी चीज़ है ही नहीं। जिस पदार्थ का अत्यन्त अभाव है, उसका अस्तित्व कभी हो ही नहीं सकता। संसार में जितनी वस्तुएँ हैं, वे चाहे कितनी भी सूक्ष्म क्यों न हों, सबका प्रादुर्भाव प्रकृति से होता है; प्रकृतिजन्य सारे पदार्थ किसी न किसी दशा में इन्द्रिय ग्राह्य होते हैं। उदाहरण के लिए जल को लीजिए। यह भाप की सूरत में आँखों को दिखाई देता है। यदि यह और विश्लिष्ट होकर सूक्ष्मतम वायव्य (Gaseous) हो जाय अर्थात् गैस का रूप धारण कर ले, तो भी वह इन्द्रियों द्वारा जानने का विषय होगा। फि़र देखिए बिजली बहुत ही सूक्ष्म रूप की एक वस्तु है; आँख, कान, नाक द्वारा इसे नहीं जान सकते। लेकिन बिजली की उत्पत्ति प्राकृत पदार्थों से होती है; और जब हम उसका व्यवहार किसी रूप में करते हैं तो द्रव्यों में उसे स्पष्ट देखते हैं कि काम कर रही है।

यह बात‘ईश्वर’ नाम के पदार्थ में नहीं है क्योंकि उसको प्रकृति का निर्माता, संचालक और नाशकर्ता माना जाता है। प्रकट है कि जो वस्तु नहीं है- केवलमात्र एक काल्पनिक भाव है- उससे वास्तविक पदार्थ का बनना,बनाना या प्रकट हो जाना  प्रत्यक्ष ही एक निर्मूल, अशुद्ध एवं मानव विज्ञान- विरूद्ध एक कल्पना मात्र है। यदि हम इसे बल, शक्ति किंवा गति मानें तो भी हम द्रव्य के सिवा अन्यत्र इसे कहीं भी नहीं देखते। इसी तरह गुलाबी रंग भी कभी किसी ने भिन्न, स्वतंत्र कहीं न देखा होगा, जैसा ऊपर कहा गया है। सारांश यह कि प्रकृति से अलग कभी कोई शक्ति या कोई और भाववाचक संज्ञाएँ हैं। इनका भी बोध हमें प्रकृति के ही द्वारा होता है। किसी ख़ास दशा का निरीक्षण करके हम उसको एक नाम दे देते हैं; परन्तु वस्तुतः यह ऐसी कोई चीज़ नहीं है, जिसे हम प्रकृति से भिन्न मान लें।

  ईश्वर के माननेवाले उसे सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, सर्वव्यापी, इत्यादि सभी गुणों से विभूषित करते हैं। यह लोग यह नहीं सोचते कि शक्तिमान कहने से यह एक गुण ‘शक्ति’ का दूसरी चीज में आरेाप करते हैं, तो दूसरी चीज कोई वस्तु होनी चाहिए और ईश्वर कोई वस्तु नहीं है। यही तर्क न्याय, दया आदि की बावत भी किया जा सकता है। जीव को एक प्रकार से हम शरीर में देखते हैं, लेकिन बिना शरीर के कोई जीव ऐसा पदार्थ देखा नहीं जाता। संभव है कि रसायनशास्त्र के अनुसार जीव भी दो या अधिक चीज़ों के मेल से उत्पन्न कोई स्थिति विशेष हो। मनोवैज्ञानिक सिद्ध कई कुतुहलजनक घटनाओं के देखने पर जान पड़ता है कि शंकर स्वामी को यह ख़याल हुआ था कि ईश्वर तो कोई चीज़ नहीं है। मगर जीव में कई विलक्षण शक्तियाँ हैं। इसलिए जीव और ईश्वर दोनों एक ही पदार्थ हैं। इस तरह पर शंकर स्वामी ने संसार को काल्पनिक ईश्वर के मानने से बहुत दूर तक हटाया-‘अहंब्रह्मास्मि’ ‘तत्वमसि’ ‘सर्वखल्विदं ब्रह्य’ का पाठ पढ़ाया। वेदान्त भी, जहाँ तक ईश्वर की मिथ्या कल्पना का सम्बन्ध है, एक खासा नास्तिकवाद है, जो संसार को बहुत ठीक मालूम होता जा रहा है। इनके विचार के लोगों की वृद्धि होती जाती है।

 ईसाइयों ने खुदा की पवित्रत्मा को चिड़िया के रूप में पानी पर तैरा कर, उसका मरियम के साथ सहवास कराकर अथवा तूर-पहाड़ पर जलती आग की शकल में मूसा को दिखला कर यही सिद्ध किया है कि बिना वस्तु के किसी शक्ति का स्थिर रहना असंभव है। कुरान ने खुदा को एक बड़े मकान में बिठाकर तख़ती पर लिखने और फ़रिश्तों द्वारा सारा काम इजाम देने का ख़याल इसलिए पैदा किया कि बिना किसी व्यक्त पदार्थ के यह सारे गुण उसमें नहीं हो सकते, जिन्हें मुसलमान लोग खुदा में मानते हैं।’कुन’ का कहना बिना जिह्वा के असंभव है, और जिह्वा से खुदा भी प्रकृतिजन्य एक पदार्थ बन जाता है।

सातवें आसमान पर मुहम्मद साहब का बुराक पर चढ़कर जाना, रिजवां का इन्हें बहिश्त दिखलाना, महात्मा मसीहा का आसमान पर उठाया जाना तथा गरूड़ पुराण आदि की कही हुई स्वर्गों और नरकों की कल्पनाएँ, सभी इस बात की साक्षी हैं कि धर्म केवल कल्पना-मात्र हैं। इनसे सिवा लोगों को मिथ्या झगड़ों में फ़ँसा पर बेकार बनाने के, कोई भी लाभदायक काम नहीं हो सकता। इसलिए मनुष्य जितनी जल्दी ईश्वर, खुदा या गॉड और धर्म, मजहब या रिलीजन को त्याग दें उतना ही अच्छा। मनुष्य जाति के कल्याण के लिए ही मैंने इन विचारों को प्रकट करने का साहस किया है। आशा है, विचारशील पुरुष इससे लाभ उठावेंगे।

लोग जो समय रोज़े, नमाज़,संध्‍या-पूजा और प्रार्थना में नष्ट करते हैं, उसे यदि समाज के किसी उपयोगी काम में लगावें, तो अपने भाइयों का अपना बहुत कल्याण कर सकते हैं। यदि संसार से ईश्वर और धर्म के व्यर्थ गपोड़े मिट जायँ, तो लोगों में फ़ैले हुए झगड़ों का अन्त हो जाय। जब कोई मूर्ख से मूर्ख पिता भी अपना वश चलते अपने पुत्रों को नहीं लड़ने देता तो, यदि वास्तव में कोई खुदा होता और सर्वशक्तिमान् खुदा होता- तो वह अपनी संतान को कदाचित् अपने नाम पर कुत्तों की तरह न लड़ाता। यदि खुदा शक्ति और बुद्धिवाला होता तो भी वह एक ही धर्म सारे संसार के लिए बनाता- सारे संसार की एक ही बोली और एक ही संस्कृति होती- जिससे इन झगड़ों का बीज ही न पड़ता। जो खुदा झगड़ों का बीज बोता हो, जो धर्म मनुष्यों के लिए वास्तविक हितकर न हो, वह यदि वास्तव में कुछ हो भी तो विषवत् त्याज्य ही है।

फ्रांस का विद्धान वाल्टेयर कहता है if god did not exist, it would be necessary to invent him for the people must have a religion.

अर्थात्- यदि ईश्वर न भी हो तो भी हमें एक ईश्वर का आविष्कार करना जरूरी है, क्योंकि जनता को धर्म की जरूरत है। हमें इस पंडित की बात पर हँसी आती है। पहले तो उपर्युक्त वाक्य के पढ़ने से प्रकट होता है कि वाल्टेयर को स्वंय ईश्वर नामक किसी पदार्थ की सत्ता का पूर्ण विश्वास न था, इसलिए वह मूर्ख जनता को धोके में डालने की नियत से एक ईश्वर की कल्पना करने के फ़ेर में पड़ा। दूसरे उसने ईश्वर के लिए Him कर्मवाचक; एकवचन पुल्लिंग, प्रथम पुरुष का प्रयोग करके उसे मर्द करार दिया। इससे प्रकट है कि वह इस अजीब जानवर को मनुष्य मानता है और मनुष्य मानने से उसकी सर्वशक्तिमत्ता, सर्वव्यापकता आदि की सारी बातें धूल में मिल जाती हैं। यही बात हिन्दू मुसलमानों के खुदा की भी है। तीसरे जनता को एक धर्म दरकार है इसलिए एक खुदा का आविष्कार करना भी ज़रूरी है, यह भी बड़ी मज़ेदार बात है। जनता ने कभी खुदा नहीं माँगा; ‘वाल्टेयर’ और उसी की तरह सोचनेवाले भद्रपुरुषों ने खाहमखाह एक खुदा गढ़कर जनता को अगणित बेहूदगियों का शिकार बना डाला।

खुदा की ही कल्पना ने इंजील, कुरान, पुराण को रक्तरंजित इतिहास का भाण्डागार बनाया और घृणित कथाओं और भावों से मनुष्य जाति का सर्वनाश किया है। मैं तो महात्मा ‘मिकाइल बेकुनिन’ को सराहता हूँ, जो खुले शब्दों में मनुष्य जाति के हित के लिए वाल्टेयर को तुर्की-ब तुर्की जवाब देते हुए कहता हैः-if god really existed, it would be necessary to abolish him.

अर्थात्- यदि खुदा सचमुच होता, तो भी उसे धक्का देकर निकाल देना ज़रूरी होता। सच है धर्म और ईश्वर ऐसी ही बुरी कल्पना है। इनसे संसार का जब तक पीछा न छूटेगा, तब तब उसका कल्याण न होगा।

जब तक योरोप में खुदा और धर्म सदृश रद्दी काल्पनिक बातों का ज़ोर रहा, रोमन कैथोलिक और प्रोटिस्टेंट निरन्तर सर फ़ोड़ते रहे। कैथोलिकों ने शक्ति प्राप्त होने पर प्रोटिस्टेंटों को अग्नि के हवाले किया। और प्रोटिस्टेंटों ने अधिकार पाने पर रोमन कैथोलिकों के प्राणों की आहुति देकर अपना कलेजा ठंडा किया। भारत में शैव-शाक्त आदि ने धर्म के नाम पर खूब कुत्ते बिल्लियों की सी लड़ाई की। पर जिस दिन योरोप ने धर्म और खुदा के ढकोसले को छोड़ा, उसी दिन से उसमें देश-प्रेम ओैर ज्ञान-पिपासा जाग्रत हुई। आज योरोप प्रकृति की पूजा करके सर्वत्र अपने को पुजवा रहा है।

एशिया की बरबादी के कारण धर्म और खुदा ही हैं। आज बीसवीं सदी में भी इस मूर्खता के कारण एशिया की दशा अत्यन्त सोचनीय हो रही है। जिस जाति में जितनी धर्मान्धता है, वह उतनी ही अँधेरे गर्त में पड़ी हुई है। मुसलमानों में अधिक धर्मान्धता है, इसी से उनका संसार में पतन होता जा रहा है। भारत में भी मुसलमान विद्या, बुद्धि और धन आदि सभी बातों में अत्यन्त नीचे हैं। टर्की ने इस भेद को समझा, इसलिए उसने धर्म के हानिकर बन्धन को ढीला कर दिया। अब वह समय रहते इस रद्दी खयाल को अद्धर्चन्द्र देकर सुखी होने का प्रयत्न करेगा, यह हमारा पूर्ण विश्वास है।

यदि ईश्वर और धर्म का ब्रह्यपाश कट जाय, यदि इस ‘गौर्डियन नाट’ के टुकड़े हो जायँ, तो संसार के धर्म-ग्रन्थों के सारे निस्सार गपोड़ों का भी अंत हो जाय। प्रत्यक्ष और विज्ञान-सिद्ध बातों के विरूद्ध विश्वास, आचार और व्यवहार का पाप मनुष्यों में से जाता रहे- स्वर्ग के झूठे मन मोहनेवाले दास्तानों और बच्चों की सी बेसर-पैर की बातों से संसार का पीछा छूट जाय ग़ालिब ने एक जगह बहिश्त का खासा मजाक उड़ाया है। वह कहता है-

‘हमको मालूम है जन्नत की हकीकत गालिब,

दिल को खुश रखने को गालिब यह खयाल अच्छा है।’े

 किसी ने सच कहा हैः- doctrine kills the life, and the living spontaneity of action. सिद्धान्तवाद जीवन को नष्ट कर डालता है और कार्य के स्वाभाविक अस्तित्व को मटियामेट कर छोड़ता है। सार यह कि व्यक्ति हो या जाति कल्पनामात्र की तरंगों से ताड़ित होकर समुद्र में डाँट लगी हई खाली बोतल के समान इधर-उधर ठोकरें खाती फि़रती है, फ़ल कुछ नहीं होता। हाँ, संसार के कितने ही मनुष्य विज्ञान की ओर ध्‍यान न देकर इंजील, कुरान, वेद, पुराण के पढ़ने में न जाने कितना समय ख़राब कर देते हैं। अच्छा हो जो इन लोगों में सुबुद्धि का संचार हो।

(‘माधुरी’ नवम्बर 1925 से फ़रवरी 1926 तक)

*दस्तक के लिए प्रस्तुति अमिताभ मिश्र*

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