सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट रूप से निजता को एक मौलिक अधिकार मानता है – प्रेस विज्ञप्ति, rethinkaadhaar  campaign

सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट रूप से निजता को एक मौलिक अधिकार मानता है – प्रेस विज्ञप्ति, rethinkaadhaar campaign

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आधार के मामले में केंद्र सरकार ने अगस्त 2015 में कहा था कि भारत के संविधान के अनुसार निजता एक मौलिक अधिकार नहीं है. तबसे सरकार व Unique Identification Authority of India (UIDAI) जो एगेंसी आधार के डेटाबेस के प्रबंधन के लिए ज़िम्मेदार है, दोनों ने न्यायालय में यह बार बार कहा है कि भारतीयों का निजता का कोई मौलिक अधिकार नहीं है और निजता केवल अभिजात वर्ग की चिंता है. इन हानिकारक तर्कों का आज समापन हो गया है.

संविधानिक पीठ का आज का एकमत फैसला स्पष्ट रूप से निजता को एक मौलिक अधिकार मानता है. इस बहुमत फैसले ने जो कहाँ है वह संदेह का मुद्दा होना ही नहीं चाहिए था: कि निजता इस देश के लोगों का एक मौलिक अधिकार है, चाहे वे अमीर हो या गरीब. किसी भी स्थिति में मौलिक अधिकारों का हनन नहीं हो सकता.

यह फैसला सरकार की डेटा की रक्षा करने के लिए कानून बनाने के प्रयासों को मानता है. भविष्य में बने किसी भी कानून को, डेटा की रक्षा करने के लिए बनाए गए कानून को भी, यह सुनिश्चित करना होगा कि वह लोगों के निजता के अधिकार को बचाए रखे. किसी भी नीती को इस बात पर परखा जा सकता है कि वह निजता के अधिकार का हनन करती है या नहीं.

सरकार ने निजता के अधिकार का मामला सर्वोच्च न्यायालय की एक नौ जजों की पीठ के हवाले कर दिया था. चूंकि सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाया है, अब आधार के मामले की सुनवाई एक छोटी पीठ के द्वारा पुनः शुरू हो सकती है.

हम आधार की याचिकाओं की जल्द सुनवाई का स्वागत करते हैं.

सरकार को यह सूचित कर दिया है कि वह हमारे निजता के अधिकार की रक्षा करे.

मामले का कालक्रम

सितम्बर 2013: सर्वोच्च न्यायालय UPA सरकार को कहती है कि आधार कोई भी सेवा के लिए अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता.

जुलाई 2015: NDA सरकार सर्वोच्च न्यायालय को कहती है कि उसका आधार को कई सेवाओं के लिए अनिवार्य बनाने का इरादा है. अटर्नी जेनरल मुकुल रोहतगी यह बोलकर कि नागरिकों को निजता का कोई मौलिक अधिकार नहीं है सबको चौका देते हैं. सर्वोच्च न्यायालय कहता है कि इस बात का निर्णय संविधानिक पीठ करेगी.अगस्त 2015: सर्वोच्च न्यायालय आधार का प्रयोग जन वितरण प्रणाली तक सीमित करता है, वह भी स्वैच्छिक रूप से.

अक्टूबर 2015: सर्वोच्च न्यायालय चार अन्य योजनाओं में आधार के प्रयोग की अनुमति देता है, पर केवल स्वैच्छिक रूप से.

मार्च 2016: सरकार आधार कानून को एक मनी बिल के रूप में पारित करती है, जिससे राज्य सभा से मंजूरी नहीं लेनी पड़े, जहां उसका बहुमत नहीं है. आधार को 50 से अधिक योजनाओं के लिए अनिवार्य बनाती है.

जून 2017: लगभग दो वर्षों के इंतज़ार के बाद सर्वोच्च न्यायालय निजता के अधिकार पर निर्णय लेने के लिए संविधानिक पीठ का गठन करती है.

आज के फैसले की पृठभूमि के लिए: https://rethinkaadhaar.in/blog/2017/8/24/explainer-what-is-the-right-to-privacy-judgement-all-about

 

अधिक जानकारी के लिए प्राविता (9868869900) को संपर्क करें या contact@rethinkaadhaar.in को लिखें.

 

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