नई दवा नीति से दाम बढ़ेंगे – जेके कर

नई दवा नीति से दाम बढ़ेंगे – जेके कर

नवभारत   से आभार सहित 

नई दवा नीति से दाम बढ़ेंगे

जेके कर

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मनमोहन सरकार पर कॉर्पोरेट घराने पॉलिसी पैरालाइसिस तथा जनता भ्रष्ट होने का आरोप लगाती रही है. करीब 30 सालों बाद स्पष्ट बहुमत से सत्ता में आई मोदी सरकार ने कॉर्पोरेट सेक्टर की उस शिकायत को दूर कर दी है. हां, इससे आम जनता की तकलीफों में इज़ाफा हुआ है यह दिगर बात है. केन्द्र सरकार के रसायन मंत्रालय के औषध विभाग द्वारा हाल ही पेश किये गये दवा नीति 2017 का मसौदा इसकी ही पुष्टि करता है. खासकर दवा नीति 2017 के मसौदे में कहा गया है कि दवाओं के मूल्य नियंत्रण के स्थान पर उनके दामों की निगरानी की जायेगी तथा केवल ऐसी दवायें जो नान पेटेंटेड उनके दाम तय किये जायेंगे और पेटेंटेड दवायें मूल्य नियंत्रण से बाहर होंगी. जाहिर है कि यदि इस दवा नीति को लागू कर दिया जाता है तो कम से कम दवा उद्योग के ‘भ्रद पुरुष’ तो सरकार पर यह आरोप नहीं लगा सकते हैं कि मोदी सरकार भी मनमोहन सरकार के समान पॉलिसी पैरालाइसिस से भुगत रही है तथा नई नीतियां लागू करवाने में अक्षम है.

हाल ही में केन्द्र सरकार के औषध विभाग द्वारा दवा नीति 2017 का मसौदा पेश किया गया है. हम इसकी पड़ताल जनता तथा उद्योग पर पड़ने वाले प्रभाव के दृष्टिकोण से करने का प्रयास करेंगे. गौर करने वाली बात यह है कि हमारें देश में स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च का करीब 65 फीसदी जनता को दवाओँ पर ही खर्च करना पड़ता है. साल 2015-16 में भारत का दवा बाज़ार 2, 04, 627.15 करोड़ का रहा है जिसमें से घरेलू दवा का बाज़ार 98, 414.4 करोड़ का रहा है तथा 110, 5, 342.20 करोड़ रुपये की दवाओँ का निर्यात किया गया है. इस तरह से भारतीय दवा उद्योग देश के लिये विदेशी मुद्राओँ का अर्जन करने वाला तीसरा सबसे बड़ा उद्योग है. इन तमाम आकड़ों पर नज़र डालने के बाद आइये दवा नीति के मसौदे में क्या है उस पर नज़र डालते हैं.

वर्तमान में भारतीय दवा उद्योग करीब 60 फीसदी बल्क ड्रग का आयात कर उससे दवायें बनाता है. इस स्थिति को बदलने के लिये दवा नीति में कहा गया है कि जिन दवाओं का निर्माण स्वदेशी उत्पादित बल्क ड्रग से किया जायेगा उस पर 5 साल तक दवा नियंत्रण लागू नहीं होगा. अर्थात् यदि भारत की कोई बड़ी दवा कंपनी जो बल्क ड्रग का उत्पादन करने में सक्षम है ऐसा करती है तो उसके दवा का मूल्य वह 5 साल तक अपने हिसाब से तय कर सकती है. जहां तक जेनेरिक दवा को प्रोत्साहन देने की बात है वह केवल सरकारी खरीद तक ही सीमित करने का प्रस्ताव है. सरकारी खरीद जेनेरिक नाम से ही होगी केवल कॉम्बिनेशन वाले दवाओं की खरीदी ब्रांडनेम से होगी. इस तरह से जेनेरिक का जो हौव्वा खड़ा किया गया था उसकी खुद ही हवा निकाल दी गई है.

अब तक हमारे देश में मध्यम तथा छोटी दवा कंपनियां अपने दवाओँ का उत्पादन बड़ी-बड़ी उत्पादन ईकाइयों से लोन लाइसेंस के तहत करवाती है. अब लोन लाइसेंस को क्रमशः बंद कर दिया जायेगा सिवाये बॉयोफॉर्मास्युटिकल्स के उत्पादन के. यह सब दवाओं के उच्च गुणवत्ता को बनाये ऱखने के नाम पर प्रस्तावित है जबकि सालभर पहले खुद सरकार के द्वारा कराये गये अब के सबसे बड़े राष्ट्रीय सर्वेक्षण का नतीजा है कि देश में 3.16 फीसदी सब-स्टैंडर्ड पाई गई हैं. यदि इस लोन लाइसेंस तथा थर्ड पार्टी मैनुफैक्चरिंग को बंद कर दिया जाता है तो मध्यम तथा छोटे श्रेणी के सैंकड़ों-हजारों दवा कंपनियां बंद हो जायेंगी तथा इसका सीधा लाभ बड़ी-बड़ी दवा कंपनियों को होगा.

इसके अलावा देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के नाम पर ई-फॉर्मेसी को बढ़ावा दिया जाना भी प्रस्तावित है. हमारें देश में वर्तमान में करीब 8 लाख दवा की खुदरा दुकाने हैं. ई-फॉर्मेसी को बढ़ावा देने से दवा का वितरण तथा विक्रय पर भी बड़ी-बड़ी विदेशी कंपनियों का एकाधिकार हो जायेगा. इसी के साथ लाखों खुदरा दवा दुकाने बंदी के कगार पर पहुंच जायेगी. इस मसौदे में कहा गया है कि सभी ‘नये ड्रग डिलीवरी सिस्टम’ को ‘नये दवा’ की मान्यता दी जायेगी. अब इसका निहितार्थ क्या है इस पर कयास ही लगाये जा सकते हैं. भविष्य में यदि यह ‘ऊंट अरब को ही टेंट के बाहर खदेड़’ दे तो कोई आश्चर्य न होगा. उल्लेखनीय है कि भारतीय पेटेंट कानून की धारा 3 (डी) के अनुसार नये तरह के ‘ड्रग डिलीवरी सिस्टम’ के आधार पर किसी दवा को ‘नये केमिकल’ की संज्ञा नहीं दी जा सकती है. इस कारण से ही बहुराष्ट्रीय दवा कंपनी नोवॉर्टिस की दवा ग्लीवेक को भारत में एकाधिकार नहीं दिया गया है तथा जिस दवा को यह कंपनी 1.20 लाख लाख रुपये में बेचती थी उसी खुराक को भारतीय दवा कंपनी नेटको ने महज 9 हजार रुपये में उपलब्ध करा दिया था.

दवाओँ के मूल्यों पर नियंत्रण रखने वाली संस्था नेशनल फॉर्मास्युटिकल्स प्राइसिंग एजेंसी सलाह देने के लिये दवा उद्योग के लोग, चिकित्सक, दवा दुकानदार, विशेषज्ञ तथा नागरिक समाज के प्रतिनिधियों तथा सरकार के प्रतिनिधी की एक सलाहकार समिति का गठन किया जायेगा जो दवाओँ के मूल्य नियंत्रण पर सलाह देगी. इस तरह से दवाओं के मूल्य नियंत्रण रखने वाली संस्था में जनवाद के नाम पर दवा उद्योग के प्रतिनिधियों को भी घुसने दिया जायेगा. जाहिर है कि ऐसा कौन होगा जो अपने मुनाफे को कम करने की सलाह देगा.

इस तरह से नई दवा नीति से दवाओँ के दाम बढ़ेंगे, दवा उद्योग में छंटनी होगी, विदेशी दवा कंपनियों का बोलबाला हो जायेगा चाहे वो दवा के निर्माण के क्षेत्र में हो या दवाओं की बिक्री के मामले में हो. इससे ज्यादा बोलेंगे तो बोलेगा कि यह बोलता है.

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नवभारत में प्रकाशित

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