पालनार मामले जिला दंन्तेवाड़ा की पूरी प्रशासन अपने आप को बचाने में लगी है.

पालनार मामले जिला दंन्तेवाड़ा की पूरी प्रशासन अपने आप को बचाने में लगी है.

लिंगा राम कोड़पी

दंतेवाडा
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छत्तीसगढ़ राज्य जिला दंन्तेवाड़ा की पूरी प्रशासन अपने आप को बचाने में लगी हैं । पहली बात तो यह हैं की गुरूकुल कन्या छात्रावास में राखी का त्यौहार मनाने का आदेश किसने दिया । जिला के कलेक्टर सौरभ कुमार का कहना है कि उन्होंने कोई अनूमती नही दी हैं । क्या शिक्षा अधिकीरीयों ने अनूमती दी हैं ? इस घटना को कोई भी आदीवासी जनप्रतीनिधी साधारणता से ले सकते हैं , लेकीन हम नही ले सकते ।

कल अंन्तराष्ट्रीय आदीवासी दिवस था ।कल मै गीदम घर में सुबह चाय पी रहा था, तबी कुछ आवाजे सुनाई दी, वह आवाजे आदीवासीयों के नारे थे । करीब 3 से 4 हजार लोग रोड़ मे कतार से चल रहे थे, आगे चलने वाला विश्व आदीवासी का झंड़ा लिये हुए चल रहा था , पीछे चलने वाले नारा लगा रहे थे । नारा यह था , “एक तीर एक कमान आदीवासी एक समान ” मुझे यह नारा सुन कर बहुत क्रोध आया मैं अपने आप को समझाने लगा कि क्रोध नही शान्ती से काम करना होगा । फिर सोच मेरे दिमाग मे आया की बस्तर के आदीवासीयों के पास खुन नही बल्की पानी हैं । खून होता तो पालनार की घटना के बारे में सोचते और आज विरोध करते लेकिन विरोध क्या करेगे खून होगा तो विरोध करेगे । इनके पास तो खून ही नही हैं । यही नही इस घटना के अलावा भी कई सारे घटनाए है .

उदाहरण के तौर पर सोनी सोढ़ी के साथ जो घटना हुई उस घटना को ले लिजीये दूसरी कोन्टा क्षेत्र से मड़कम हिड़मे की घटना को ले लिजीये । बीजापूर से बेल्लमनेन्ड्रा , चिन्नागेल्लूर , पेद्दागेल्लूर की घटना को ले लिजीये इन गाँवो में तो 40 महीलाओं के साथ बलात्कार हुआ ।
यही नही गंम्पूड़ की घटना को ही ले लिजीये यह घटना तो शिक्षीतो के बीच में हुआ हैं लेकिन कोई बोलना नही चाहता । पालनार गाँव को कैसलेश गोशित किया गया था , इस गाँव के नाम पर दंन्तेवाड़ा के कलेक्टर केसीदेव सेनापती को प्रधानमंत्री दामोदर नरेन्द्र मोदी द्वारा अवार्ड भी दिया गया हैं । पालनार एक शिक्षीत गाँव हैं , इस गाँव मे 100 में 80 प्रतीशत आबादी शिक्षीत हैं । छात्राओं के मामले को आखीर दबा के क्यों रखा गया ? पालनार गाँव का शिक्षीत होने का क्या अर्थ हैं ? जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन हमेशा से अपने आप को बचाने में कामयाब होता है । पालनार के घटने मे जिले के कई आदीवासी जनप्रतीनिधी भी शामिल हैं ।
पहला जनप्रतीनीधि तो अमन नंदलाल मुड़ामी है जो कि क्षेत्र से जिला पंचायत सदस्य हैं । दूसरा गाँव का सरपंच सुकालू मुड़मी ये दोनो ही प्रतीनिधी ग्रांम पालनार के हैं । तीसरी कमला विनय नाग जो की दंन्तेवाड़ा जिला पंचायत अध्यक्ष हैं, यह जनप्रतीनिधी 31 जुलाई को 111 बयालियन सुरंक्षा बलो के साथ मौजूद थी । 111 बटालियन के मनीष कुमार टू आई. सी. यह अधीकारी भी मौजूद था । जिला शिक्षा अधिकारी अहिल्या ठाकुर का कहना है कि पालनार कन्या छात्रावास के 31 जुलाई के कार्यक्रम की जानकारी ही नही थी । अर्थात पालनार का कार्यक्रम पुलिस प्रशासन ने हत्यार के दम पर करवाया हैं । छात्राओं के साथ जो हुआ उस घटना की जानकारी जिला पंचायत सदस्य नंदलाल मुड़मी और पालनार सरपंच को जानकारी मिल चुकी थी । यह प्रतीनिधि और पुलिस अधिकारी व जिला कलेक्टर सौरभ कुमार के समक्ष 1 अगस्त को पालनार गुरूकुल आवासीय कन्या छात्रावास कि बालिकाओं से बयान लिया गया । उस बयान को सुनने के बाद जिला कलेक्टर ने बच्चों को यह आश्वासन दिया की अपराधियों पर कार्यवाही जरूर होगी लेकिन 6 अगस्त तक कोई कार्यवाही नही हुई । अमन नंदलाल मुड़ामी , सुकालू मुड़ामी, कमला विनय नाग , ये सारे जनप्रतीनिधी भारतिय जनता पार्टी के सदस्य व कार्यकर्ता है, आज छत्तीसगंढ़ राज्य में इनकी सरकार हैं ।

सोचने की बात यह है कि ये कार्यकर्ता बी.जे.पी के सक्रीय सदस्य है और समाज की नजर से देखा जाए तो ये पहले आदीवासी हैं । लेकिन इन जनप्रतीनिधीयों ने इतनी बड़ी घटना को क्यो छुपाये रखा ? यही नही दंन्तेवाड़ा जिले का पुलिस अधीक्षक कमलोचन कश्यप भी आदीवासी हैं । इनका आदीवासी होने का क्या मतलब हैं । इनके कारनामे देखकर तो लगता हैं कि इन्होंने ही कन्या छात्रावास के बच्चों को प्रशासन को बेच दिया हैं । आदीवासी बच्चों के साथ शोषण नही तो क्या हैं । इतना कुछ हुआ किसको आदीवासी समाज ने दंड़ित किया ? अपराधी तो जिला कलेक्टर सौरभ कुमार, पुलिस अधीक्षक कमलोचन कश्यप, जिला पंचायत अध्यक्ष कमला विनय नाग , जिला पंचायत सदस्य अमन नंदलाल मुड़ामी, और पालनार के सरपंच सुकालू मुड़ामी भी हैं , क्यों की इन्होंने अपराध को जानने के बाद छुपाने की कोशिश की हैं ।

आदीवासी समाज को जिला प्रशासन व पुलिस अधीकारीयों के खिलाफ चीफ जस्टीस सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के चीफ जस्टीस को लिखना चाहिए ताकि इन अधीकारीयों पर प्रथम शिकायत दर्ज हो सके । आदीवासी समाज को तो बच्चों के मामले में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग और संयुक्त राष्ट्र संग को भी लिखना चाहिए ।
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लिंगा राम कोड़पी
दंतेवाडा

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