तन – मन सुन्दर या तन सुन्दर -नथमल शर्मा ,ईवनिंग टाइम्स 

तन – मन सुन्दर या तन सुन्दर -नथमल शर्मा ,ईवनिंग टाइम्स 

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संपादकीय

अपने छत्तीसगढ़ के एक स्कूल की शिक्षिका के साथ एक हादसा हो गया । इसलिए बात याद आ गई कि तन सुन्दर होना चाहिए या मन। या कि तन-मन दोनों ही । किसी को क्या पहनना है,क्या खाना है ये तो उसकी रूचि पर ही निर्भर करता है । उसे भी कोई कहने लगे कि ऐसा पहनना ठीक नहीं । इससे *माहौल* पर असर होता है । स्कूल की शिक्षिका को चुस्त कपड़े नहीं पहनना चाहिए ।

राजधानी रायपुर के पास ही है अभनपुर। वहीं की एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका को नोटिस थमा दिया गया । नोटिस में कहा गया कि वे चुस्त कपड़े पहनकर आतीं हैं । इससे सबका ध्यान भटकता है । जाहिर है पढ़ाई भी प्रभावित होती है । यह नोटिस स्कूल की समीति के अध्यक्ष की ओर से दिया गया । वहां अध्यक्ष पद की शोभा एक पुरूष (मर्द ) बढ़ा रहे हैं । नोटिस मिलने से शिक्षिका परेशान है । बात ऊपर के अधिकारियों तक पहुंची। ऊपरी पद पर एक महिला अधिकारी बैठी हैं । वे समझ गईं कि शिकायत कुछ और ही है । शिक्षिका ने कहा भी कि अध्यक्ष उसे लगातार परेशान ही कर रहा है । वह तो सात वर्षों से है स्कूल में । माहौल अब ही क्यों बिगाड़ने का आरोप लगाया जा रहा है । पहले तो कभी कोई शिकायत नहीं रही किसी को। उच्च पद पर बैठी अधिकारी समझ ही रही थी । उन्होंने शिकायत को ठंडे बस्ते में डाल दिया । वैसे होना यह था कि स्कूल के अध्यक्ष के खिलाफ कार्रवाई की जाती । फिलहाल इतना साहस नहीं आया है । राजनीति की ताक़त समझते/समझतीं हैं सभी ।

बरसों से हाशिए पर रह रही स्त्री ने खुद को तलाशने की कोशिश शुरू कर दी है । कुछ ही बरस हुए हैं इस कोशिश को करते हुए । बरसों से वह स्त्री ही बनी रही और इंसान होने के लिए तरसती रहीं ।जबकि सबसे ज्यादा इंसानियत उसी में बसती है । वही है जो अपने हिस्से का बसंत देकर सबको हरियाली बांटती रही। फिर भी अपनी जगह के लिए तरसती ही रही। पूरी दुनिया में ही यही हालात है। ब्रिटेन जैसे देश में बीसवीं सदी तक उसे मताधिकार नहीं मिला था । वह सिर्फ वंश बढ़ाने के लिए बच्चे पैदा करने वाली मशीन बनी रही। बहुत संस्कारी । बहुत लाजवंती । सुन्दर दिखना जरूरी । स्त्री का गहना तो उसकी लाज है कह – कहकर उसे चौके और बिस्तर तक ही समेट कर रखा गया । आज भी हालात बहुत नहीं बदले हैं । आज वह काम कर रही है । कई बरसों से कहा जा रहा है कि वह हवाई जहाज उड़ा रही है । ट्रेन चला रही है । राजनीति भी करने लगी है । वह अपनी जगह बना/बढ़ा रही है । अपना हक छीन कर लेने को मचल रही है । वगैरह – वगैरह। पुरूष (मर्द ) को यह पसंद भी नहीं आया । क्योंकि वह फैसले भी लेने लगी। फिर भी कुछ भुनभुनाहट के साथ वह चुप रहा । इसलिए कि वह अकेला अपनी गृहस्थी की गाड़ी नहीं खींच पा रहा । बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए पति-पत्नी दोनों का काम करना जरूरी हो गया । बस यही *जरूरी होना* होना स्त्री के लिए वरदान के रूप में आया । अब उसके बाहर निकलने को ना चाहते हुए भी स्वीकार किया जाने लगा । पहली बार उसने खुला आकाश देखा । उसे खुद पर भरोसा नहीं हुआ जब उसने अकेले ही निर्णायक फैसले लिए । वह चल पड़ी इस अपनी नई राह पर। लेकिन घर गृहस्थी की सारी जिम्मेदारी निभाते हुए । घर और बाहर में तादात्म्य बिठाना पड़ा उसे । जल्दी लौटने के बावजूद पुरूष की अपेक्षा स्त्री से ही रहती /है भी कि घर के कामकाज की जवाबदारी उसकी ही है। वह इसे भी निभाती रही। निभा रही है । फिर भी पुरुष है कि स्वीकार ही नहीं कर पा रहा है । वह स्त्री के *साथ* देने को अपने दंभ पर चोट की तरह ले रहा है । उसे अपनी सत्ता खिसकती लगने लगी। इसी बीच पूंजीवाद से पोषित स्त्री विमर्श हिलोरे मारने लगा । इसने रहा-सहा संतुलन बिगाड़ दिया ।

सामाजिक,पारिवारिक तनाव बढ़ने लगा । बढ़ते ही जा रहा है ।तथाकथित सशक्तिकरण ने सामाजिक ताने-बाने को भी छिन्न-भिन्न कर दिया है । सशक्त हो रही स्त्री एक बार फिर अकेली पड़ने लगी है । वह आर्थिक रूप से भले ही मजबूत हो रही है पर उसका अंतस लगातार सूख रहा है । बहुत बड़े मरूस्थल की अकेली यात्री होती जा रही है । वह इसे भी पार कर लेगी क्योंकि बियाबां को बगिया बनाने की कला और ताकत दी है उसे प्रकृति ने। लेकिन लंपट पुरूष (मर्द ) का वह क्या करे ? पहले लंपट इंद्र को श्राप दिए बरसों हो गए। सदियाँ बीत गई। लेकिन पुरुष ने इंद्र के श्राप से डरने के बजाय जैसे खुद को इंद्रत्व में ढाल लिया है । कभी वह इंद्राणी बनकर बेटी को ही मार देते हैं तो कभी बस कंडक्टर के साथ मिलकर निर्भया का बलात्कार कर हत्या कर देते हैं । कभी वह चंडीगढ़ के किसी सेक्टर में उसका पीछा करते हुए बाप के पावरपर थाने को धता बता देते हैं । ऐसा होता है । हो रहा है बरसों से । हम मोमबत्तियाँ जलाकर या रात को मेरी सड़क पर निकलकर खिलाफत कर फिर लौट आते हैं अपनी कंदराओं में । अगले किसी हादसे तक। ऐसे में ही तो कोई मंत्री किसी महिला अधिकारी को निकाल देता है सारा बल लगाकर भी वह अपना हक नहीं पाती। अभनपुर में कोई अध्यक्ष फिर हिम्मत/हिमाकत करता है और चुस्त कपड़े पहनने पर नोटिस देता है । सिर्फ नोटिस दिया है इसलिए जरूरत नहीं है अभी मोमबत्तियाँ जलाने की। मोमबत्तियाँ जलाने की फिलहाल जरूरत नहीं है उनके लिए भी जो रोज पिस रही है । रोज ही थोड़ा थोड़ा जल रही है। अपने हिस्से का आसमान ढूंढ रही है । यह सच है कि आज़ादी का रास्ता भी राजनीति से होकर जाता है । और यह भी सच है कि आज की सत्ता को सम्हालने वाली पार्टी को संचालित करने वाले समूह में कोई महिला पदाधिकारी नहीं है । आज तक कभी नहीं बनी। इसलिए स्त्री की शुचिता को सर्वोपरि मानने वाले राजनीतिक माहौल में चुस्त कपड़ों के खिलाफ बात होनी है । कोई उसके चुस्त कपड़े किसी बस में या स्कूल में या कहीं भी खींच देगा तो हम भी मोमबत्तियाँ जलाकर उसके खिलाफ बोलेंगे । जरूर बोलेंगे । वैसे भी स्त्री को समझा दिया गया है कि उसकी लड़ाई उसे अकेले ही लड़नी है । वह लड़ भी रही है । पर रास्ता अभी बहुत लंबा है । इसीलिए साहिर साहब की पंक्ति याद आ रही-

तेरे सर पर ये आंचल तो खूब है लेकिन
इस आंचल को परचम बना लेती तो अच्छा ।

और हाँ,
जिस दिन तीन तलाक़ वाला फैसला आया उसी दिन यह *बात* लिखी गई थी ।आज प्रकाशनार्थ भेजते समय पढ़ने पर लगा कि हालात तो वही है । चुस्त कपड़े हों या तीन तलाक़ पिस तो महिलाएं ही रही है । इसलिए आज की यह बात जस की तस।

▪नथमल शर्मा

संपादक ,ईवनिंग टाइम्स 

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