.बिल गेट्स का दान किसके हित में? __ जेके कर

.बिल गेट्स का दान किसके हित में? __ जेके कर

आज के नवभारत में…..

19.08.2017

दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बिल गेट्स ने 4.6 अरब डॉलर के शेयर दान कर दिये हैं. भारतीय मुद्रा में यह 29,500 करोड़ रुपये के लगभग होती है. उसी के बाद से वर्तमान युग के दानवीर कर्ण, बिल गेट्स फिर से अखबारों की सुर्खियों में छा गये हैं. हालांकि यह नहीं बताया गया है कि उन्होंने यह रकम किसे दान में दी है परन्तु माना जा रहा है कि यह रकम उनकी संस्था गेट्स फाउंडेशन को दान में दी गई है. बिल गेट्स के इस दान को साधुवाद देने के साथ-साथ ही इसकी पड़ताल करने में क्या हर्ज है कि आखिरकार उनके महान कार्यो से किसे लाभ मिल रहा है. यह फाउंडेशन एचआईवी, टीबी, मलेरिया, निमोनिया, अतिसार की बीमारी जैसे रोगों के बचाव का पुनीत कार्य करती है. जिसमें एचआईवी को छोड़कर बाकी बीमारियां ज्यादातर विकासशील देशों में होती है.

साल 2000 में इस गेट्स फाउंडेशन की स्थापना की गई थी. गेट्स फाउंडेशन के घोषित लक्ष्य को उनके ही शब्दों में पहले पढ़ ले जिसमें कहा गया है कि हम प्रभावशाली वैक्सीन, दवा तथा निदान के लिये अपने भागीदारों के साथ काम करते हैं और उन लोगों तक स्वास्थ्य सेवायें पहुचाने का प्रयास करते हैं जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है. और हम संक्रामक रोगों से बचाव के लिये नये वैक्सीन को ईंज़ाद करने के लिये भारी मात्रा में निवेश करते हैं. जाहिर है कि नवउदारवाद के युग से इस दानवीर कर्ण का अधिकांश दान नये-नये वैक्सीन के ईज़ाद में खर्च होता है. बता दें कि इस तरह के नये वैक्सीन भारत तथा अफ्रीका जैसे देशों विकासशील देशों का उपयोग सरकार के कंधों पर बंदूक रखकर किया जाता है, पहले दान में वैक्सीन दी जाती है उसके बाद उन वैक्सीन को सरकारी कार्यक्रमों में शामिल करवा दिया जाता है. इन वैक्सीनों की सप्लाई दुनिया की महाकाय वैक्सीन उद्योग के जरिये की जाती है.

अब जरा गेट्स फाउंडेशन के बोर्ड पर नज़र डाल दी जाये. इसमें बिल गेट्स तथा उनकी पत्नी मेलिंदा गेट्स के अलावा दुनिया के सबसे बड़े रईसों में शुमार बारेन बफेट ट्रस्टी हैं. इनके अलावा इसके बोर्ड में ऐसे कई लोग शामिल हैं जो पहले मल्टीनेशनल दवा तथा वैक्सीन कंपनियों के उच्चाधिकारी रह चुके हैं. गेट्स फाउंडेशऩ के ग्लोबल हेल्थ के अध्यक्ष ट्रीवोर मुंडेल हैं जिनका काम नये-नये वैक्सीन तथा दवा के ईज़ाद को नेतृत्व देना है. साल 2011 में गेट्स फाउंडेशन में आने के पहले यह नोवार्टिस, फाइजर तथा पार्क-डेविस नामक महाकाय दवा कंपनियों में अपनी सेवायें दे चुके हैं. गेट्स फाउंडेशन ने विकासशील देशों में सेवा का कार्य करने के लिये मल्टीनेशनल कंपनियों के पूर्व अधिकारियों को चुना है इससे जाहिर है कि वे कितना गरीब की सेवा करते हैं तथा कितना दवा कंपनियों के हितों की रक्षा करते हैं.

बिल और मेलिंदा गेट्स ने साल 1999 में 750 मिलियन डॉलर का दान देकर ‘गावी’ अर्थात् ग्लोबल एलायंस फॉर वैक्सीन इनिशियेटिव नाम के एक संस्था की शुरुआत कराई थी. आज भी गेट्स फाउंडेशन इस ‘गावी’ का पार्टनर है. यह ‘गावी’ दुनिया के गरीब देशों में वैक्सीन की जरूरत को पूरा करने का कार्य करती है. ‘गावी’ में गेट्स फाउंडेशऩ के अलावा विश्व-बैंक भी साझीदार है. खुद ‘गावी’ के द्वारा दिये गये बयान के अनुसार साल 2014 में इस संगठन ने जितने वैक्सीन की सप्लाई की उसमें से 60 फीसदी भारत में सप्लाई किये गये थे. हालांकि, अपने घोषित तथा अघोषित उद्देस्यों को अमलीजामा पहनाने के लिये विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा यूनिसेफ को भी साझीदार बनाया गया है.

‘गावी’ खुद इस बात की खुलेआम घोषणा करता है कि उसके द्वारा सप्लाई किये गये आधे से ज्यादा वैक्सीन दुनिया के ‘उभरते हुये बाजारों’ में सप्लाई किये जाते हैं. इसके लिये बकायदा 16 देशों के 44 वैक्सीन कंपनियों को एक संगठन ‘डेवेलेपिंग कंन्ट्रीज वैक्सीन मैनुफैक्चरर नेटवर्क’ का एक संगठन बनाया गया है जो इस कार्य को अंजाम देता है. यह संगठन 40 तरह के वैक्सीन की सप्लाई करता है. इसके सदस्यों में बायोलाजिक ई नामक दवा कंपनी है जो भारत सरकार के टीकाकरण कार्यक्रम में सहयोग देती है. इसके अलावा इस गठजोड़ की सदस्य भारत बायोटेक इंटरनेशनल भी है जो भारत में वैक्सीन की सप्लाई करती है.

आइये अब उन वैक्सीन्स की पड़ताल कर ले जिन्हें भारत जैसे विकासशील देशों में बच्चों को दिया (पढ़े- घोंपा) जाता है. ‘गावी’ के सहयोग से भारत में पेंटावेलेंट वैक्सीन, हेपेटाइटिस बी वैक्सीन, हेमोपेलस इंफुलेएंजा की वैक्सीन जैसे वैक्सीन को बढ़ावा दिया गया है. दरअसल, भारत का टीकाकरण बाज़ार लंबे समय से सुप्तावस्था में था. जिसे ‘गावी’ तथा गेट्स फाउंडेशन के सहयोग से जगाया गया है. अर्थात नये-नये टीके भारतीयों को ठोंके जा रहे हैं, भले ही भारतीय परिस्थियों के अनुसार ये अनावश्यक हैं. समुद्रपारीय दवा कंपनियों के सामने एक और कारण है जिसके लिये वे भारतीय टीका बाज़ार में अपनी पैठ बनाना चाहते हैं. वह यह है कि अब उनकी अरबों-खरबों डॉलर की दवाओं का पेटेंट अधिकार खत्म होता जा रहा है. बिक्री को बनाये रखने के लिये वे अब टीकाकरण के अभियान में उतर आये हैं.

सबसे हेपेटाइटिस बी का हौव्वा खड़ा कर इसके टीके को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करवा दिया गया है. यह हेपेटाइटिस बी नाम का पीलिया फैलता है संक्रमित रक्तदान, शल्य क्रिया के संक्रमित औजारों या सुई से. कुछ हद तक यौन संबंधों से. आप सब को ज्ञात होगा कि रक्तदान से पहले उसका परीक्षण कराया जाता है कि उस व्यक्ति को पीलिया, मलेरिया, एड्स या यौन रोग न हो. चिकित्सा तथा शल्यक्रिया के सभी औजारों को उपयोग के पहले संक्रमण रहित बनाया जाता है. वरन चिकित्सा सेवा में रत चिकित्सकों तथा कर्मचारियों को मरीजों से पीलिया से पीड़ित होने का डर रहता है. इसीलिये हेपाटाइटिस बी का टीका चिकित्सा कर्मचारियों के लिये जो मरीज के संपर्क में रहते हैं, उसके लिए आवश्यक है. धन्य हो ‘गावी’ का जिसने भारत की अधिकांश जनता को यह टीका लगवा दिया है. अब तो राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल होने के कारण सभी बच्चों को यह टीका लगाया जा रहा है.

दूसरा टीका जिसे लेकर खूब हो हल्ला मचाया जा रहा है वह है ‘हिब’ अर्थात हिमोफिलस इन्फ्लूएंजा टाइप बी. खुद अमरीकी सरकार के स्वास्थ्य विभाग के अनुसार यह संक्रमण, संक्रमित व्यक्ति के नाक एवं गले के श्लेष्मा या बलगम से फैलता है. इसमें मेननजाइटिस, निमोनिया तथा वात रोग होता है. तीसरा टीका जिसे लेकर दवा कंपनियां सीधे तौर पर प्रचार कर रही हैं वह है रोटा-वाइरस का टीका. रोटा वाइरस में डायरिया होता है, जो आम तौर पर पश्चिमी देशों में होता है. फिर यह महंगा टीका भारतीय बच्चों को क्यों लगाया जा रहा है. यदि कुछ बच्चों को इस वायरस से डायरिया या अतिसार होता है तो उसे ओआरएस पाउडर पानी में घोल कर देना चाहिये. यह डायरिया तीन से आठ दिनों तक रहता है. प्रत्येक 70 संक्रमित बच्चों में से केवल एक बच्चे को अस्पताल में दाखिल करना पड़ता है. रोटा वाइरस के टीके के मुकाबले इसका उपचार ज्यादा सस्ता पड़ता है.

इनके अलावा भी लड़कियों को गर्भाशय के कैंसर से बचने के नाम पर वैक्सीन लगाये जा रहे हैं. इस वैक्सीन का नाम है एचपीव्ही- ह्यूमन पैपीलोना वायरस. ‘गावी’ के चलते रूबेला तथा यलो फीवर का टीका भी लगाने की तैयारी सरकार कर रही है.

इस तरह से बिल गेट्स द्वारा दान में दी रकम अंततः विकाशील देशों में वैक्सीन को बढ़ावा देने का काम करती है. यह दिगर बात है कि इन वैक्सीन की भारत जैसे देशों को कितनी जरूरत है. हां, इससे वैक्सीन उद्योग के वारेन्यारे हो रहे हैं यह सच है. इस तरह से बिल गेट्स महोदय के दान से विकासशील देशों की जनता को लाभ हो रहा है या नहीं परन्तु वैक्सीन उद्योग तो अपने चरम पर है.

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