मैं देशभक्त नहीं, देशप्रेमी हूँ – कन्हैया

मैं देशभक्त नहीं, देशप्रेमी हूँ – कन्हैया

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 हमारी आवाज़   से आभार  साहित
18 अगस्त 2017

मैं देशभक्त नहीं, देशप्रेमी हूँ – कन्हैया

जब किसी चीज का विरोध होता है, तो लोगों में जि़द भी पनप जाती है कि अब तो यह करके ही रहेंगे। 9 अगस्त, 2017 को एआईएसएफ और एआईवायएफ की लाँग मार्च का कारवाँ इंदौर पहुँचना था। तय तो पहले से रहा होगा लेकिन ये बात सिफर तीन-चार दिन पहले ही ज़ाहिर की गई कि इस मौके पर आयोजित सभा को संबोधित करने के लिए जेएनयू विद्यार्थी संघ के पूर्व अध्यक्ष और एआईएसएफ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य कन्हैया भी इंदौर आएँगे। इंदौर के बारे में पुराना सच यह था कि यह मध्य भारत का मेनचेस्टर हुआ करता था लेकिन अब दक्षिणपंथी गतिविधियों का नागपुर से भी बड़ा गढ़ बनता जा रहा है। और किसी हद तक पहले जो लाल रंग में रंगे दिखते थे, उनमें से कई भी अब गुलाबी होने लगे और सीधे तौर पर अपने आपको ऐसे कार्यक्रमों से दूर रखते हैं जो दूर से ही सुर्ख लाल नज़र आती हों। लेकिन कुछ लोग हैं शहर में जो गाहे-बगाहे ये साबित कर जाते हैं कि इंसानियत की उम्मीद का आसमान अभी इतना भी वीराना नहीं हुआ है और उम्मीद दे जाते हैं कि सुर्ख सवेरा आएगा और उसे हम यानि आम अवाम ही लाएगी।
तो ज़ाहिर है कि इलहाम तो आयोजकों को भी रहा ही होगा कि अगर कन्हैया आएँगे तो मामला सिर्फ़ अच्छे भाषण और तालियों पर खत्म नहीं होगा। देशभक्ति और देशद्रोह का प्रमाणपत्र बाँटने वाले ज़रूर ही कार्यक्रम बिगाड़ने की कोशिश करेंगे। तो कार्यक्रम के संयोजक विनीत तिवारी ने साथियों के साथ मिलकर व्यूह रचना बनाई। उनके साथ केन्द्रीय समूह में जुड़े एटक के मोहन निमजे, सोहनलाल शिंदे, रुद्रपाल यादव, सत्यनारायण वर्मा, बाबा साहेब, भारत सिंह, कैलाश गोठानिया, निमगाँवकर, अरविंद पोरवाल, विजय दलाल, और सीटू के साथी कैलाश लिंबोदिया, एस. के. मिश्रा, गौरीशंकर शर्मा आदि लोग, जो मज़दूर संघर्षों और ट्रेड यूनियनों से जुड़े रहे हैं। इसी के साथ उन्होंने इप्टा, प्रलेसं और अन्य प्रगतिशील संगठनों जैसे मेहनतकश, भारतीय महिला फ़ेडरेशन और आम आदमी पार्टी की युवा विंग को भी जोड़ा।
तब भी चुनौती के आकार का अंदाज़ा लगाते हुए ये नाकाफ़ी था। पिछले कुछ दिनो से इंदौर शहर में एक नाम और संघियों और भाजपा की करतूतों के खिलाफ़ निडरता से बोलने के लिए अपनी पहचान रखता है और मज़े की बात ये कि ये मोर्चा उन्होंने खोला है 90 बरस की उम्र में। वो नाम है आनंद मोहन माथुर का। उन्होंने इसी बरस की 23 मार्च को भगतसिंह के शहादत दिवस के मौके पर भगतसिंह दीवाने ब्रिगेड बनाने का दीवानगी भरा काम किया और चंद महीनों के भीतर ही एक हज़ार नौजवानों को उससे जोड़ भी लिया। नारा यही है कि जाति तोड़ो और मजहब की या किसी भी किस्म की संकीर्णता में मत फँसो। ज़ाहिर है ऐसे नारे खुले दिमाग के लोगों के अलावा उन्हें ही अपील करते हैं जो खुद किसी संकीर्णता का शिकार बने हों। ऐसे लोग दलितों और अल्पसंख्यकों में ही ज़्यादा होते हैं सो भगतसिंह दीवाने ब्रिगेड में भी वह लोग अधिक हैं। इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात ये रही उन्हें इस कार्यक्रम में जोड़ने की कि वे खुद 1942 में एआईएसएफ के सचिव रहे थे। बाद में वे वकालत में मसरूफ़ हो गए और आगे उनसे सांगठनिक राब्ता कायम नहीं रह सका। वैसे तो अनौपचारिक तौर पर जुड़े ही रहे। होमी दाजी के वे दोस्त रहे, पड़ोसी भी थे। सन 1950 में इप्टा में सक्रिय रहे। अभिनय किया, निर्देशन किया, बलराज साहनी और ज़ोहरा सहगल ने उनकी पीठ ठोकी। तो वे, उनकी भगतसिंह दीवाने ब्रिगेड और उनके सहयोगी विजय सिंह यादव (जाटव) भी आयोजन के केन्द्रीय हिस्से बन गए। इसी तरह कम्युनिस्ट पार्टी की वरिष्ठ सदस्य और पूरे इंदौर में मम्मीजी के नाम से जानी जाने वालीं कॉमरेड पेरिन होमी दाजी को, वरिष्ठ कर्मचारी नेता वसंत शिंत्रे और आल इंडिया बैंक आफि़सर्स एसोसिएशन के वरिष्ठ नेतृतवकारी साथी आलोक खरे को भी इस आयोजन में निवेदक बनाया गया। ये सब लोग एक तरह से शहर के अमन और इंसाफ़ के रखवाले बुज़ुर्ग कहे जा सकते हैं।
एक रात पहले ही सोशल मीडिया पर कुछ भाजपा से जुड़े युवा नेताओं के नाम से एक पोस्ट वायरल की गई थी कि ‘कन्हैया को इंदौर की धरती को अपवित्र नहीं करने देंगे। देशद्रोही का मुँह काला कर देंगे।’ इसके साथ ही आनंद मोहन माथुर का भी मुँह काला करने की बात भी की गई थी।
इसके लिए एहतियातन रात में ही आयोजकों द्वारा शहर पुलिस के आला अधिकारियों को संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन पता चला कि डीआईजी बीमार हैं और एस. पी. उस दिन मेधा पाटकर को अस्पताल से छुट्टी करवाकर उन्हें इंदौर से बाहर ले जाने में मसरूफ़ थे। माथुरजी ने कलेक्टर से बात की तो उन्होंने कुछ भी गड़बड़ न होने का आ’वासन तो दे दिया लेकिन ये भी बताया कि वे तो अगले दिन सुबह ही बाहर जा रहे हैं। उधर पुलिस के उस क्षेत्र के टीआई, जहाँ कार्यक्रम होना था, फोन पर आयोजकों को ही ये जताने की कोशिश करते रहे कि आपके पास कार्यक्रम की इजाज़त नहीं है तो आप कार्यक्रम नहीं कर सकते। माथुर जी भी जि़द पर थे कि अगर हम सरकारी जगह पर कार्यक्रम नहीं कर रहे तो भला किस बात की इजाज़त। बोले कि एक बार ले ली तो हमेशा का सिरदर्द हो जाएगा। बहरहाल, सारे साथियों के साथ शाम को फिर बैठकर व्यूह रचना बनाई गई। कौन कब कहाँ होगा, कहाँ रुकेगा, हॉल में कितने बजे से पहुँचकर अपनी-अपनी जगह और जि़म्मेदारी संभालेगा वगैरह, वगैरह।
एक शाम पहले ही राज्य के एआईएसएफ और एआईवायएफ के पदाधिकारियों का दल इंदौर आ गया था जिसमें एआईवायएफ के राज्य अध्यक्ष कॉ श्रवण श्रीवास्तव (रीवा) और राज्स सचिव कॉ संजय नामदेव (सिंगरौली) और एआईवएसएफ के राज्य संयोजक कॉ राहुल वासनिक (सिवनी) और सह संयोजक कॉ यीशु प्रकाश बुरदे (सिवनी) थे। सिवनी, सिंगरौली और रीवा से आए साथियों को उसी गेस्ट हाउस में रुकवाया था जिसमें अगले दिन सुबह लाँग मार्च कारवाँ के साथी और कन्हैया आकर रुकने वाले थे। किसी तरह रात निकली और सब से बात हो गई कि सब ठीक चल रहा है कि तभी सुबह 10 बजे गेस्ट हाउस को 20-25 लोगों ने घेर लिया और उनकी जीप पर लगे एआईएसएफ और एआईवायएफ के बैनर वगैरह फाड़ दिये। तिरंगे झंडे थामे भीड़ नारे लगा रही थी, ‘देश के गद्दारों को जूते मारो सालों को।’ विनीत कहते हैं कि सुनकर वितृष्णा हुई कि ‘ये हुड़दंगी सिखाएँगे देश क्या होता है। विनीत ने बताया कि ‘कुछ तो तत्काल करना था वर्ना पता नहीं ये क्या कर डालें। आजकल तो लिंचिंग पर भी उतारू हो ही रहे हैं। जल्दी-जल्दी इधर-उधर फोन करके 15-20 मिनट में वहाँ पुलिस पहुँच गई और हुड़दंगियों को खदेड़ दिया। अब ये तय था कि ये लोग शाम को कार्यक्रम में ज़रूर गड़बड़ करेंगे। माथुर साहब ने सेंट्रल कोतवाली जाकर शिकायत की। उधर विनीत ने भोपाल पुलिस हेडक्वार्टर में पुलिस महानिदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक अनुराधा शंकर सिंह से मिलने के लिए कॉ शैलेन्द्र शैली और कॉ सत्यम पाण्डे को भेजा। और कॉ जया मेहता की सलाह मानकर ख़ुद कॉ पेरिन दाजी को लेकर पुलिस एस. पी. से मिलने चले गए जहाँ एस. पी.मेधा पाटकर के पास बॉम्बे अस्पताल में थे। वहाँ पेरिन दाजी मेधा से बगलगीर होकर मिलीं और साथ ही उन्होंने वहाँ मौजूद एस. पी. को शाम के कार्यक्रम हेतु सुरक्षा उपलब्ध कराने का आग्रह किया। विनीत का स्वास्थ्य इतना खराब था कि उनके लिए खुद गाड़ी चलाना भी संभव नहीं था। और लगातार फोन पर फोन आए जा रहे थे। ऐसे में युवा साथी अदिति और अर्चिष्मान ने मदद की। वो ड्राइव करते रहे, और विनीत बैठकर फ़ोन पर ज़रूरी संपर्क करते रहे। उधर बाकी सभी साथी 6-7 गाडि़यों में एयरपोर्ट निकल गए थे कन्हैया को लेने। इन तीन-चार तरफ़ा एहतियाती कदमों से किसी हद तक पुलिस की सुरक्षा मिलना तय हो गया लेकिन हमारी रुकने की जगह कैंसिल कर दी गई। हमें ताबड़तोड़ दूसरे इंतज़ामात करने पड़े। कन्हैया ने अपनी मेधाताई से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की तो वैसे ही ये खबर फिर से हुड़दंगियों तक पहुँच गई और वो वहाँ भी झण्डे-डण्डे लेकर विरोध के लिए आ पहुँचे। ज़ाहिर है सूचनाएँ कहीं से इरादतन लीक की जा रही थीं। बहरहाल शाम के मुख्य कार्यक्रम के मद्देनज़र मेधा से मिलने का इरादा कन्हैया को भारी मन से मुल्तबी करना पड़ा।’
शाम को कार्यक्रम शुरू होने के पहले एक बार 100-150 लोगों का एक जत्था तिरंगे पकड़े और नारे लगाता सभागृह पर आया। पुलिस ने उन्हें रोकने-समझाने की कोशिश की तो वे हुज्जत पर उतर आये। पुलिस ने लाठी चलाई तो वे लोग बाहर खड़ी गाडि़यों पर पथराव करते भाग गए। इससे 4-5 गाडि़यों के काँच ज़रूर फूटे लेकिन किसी को शारीरिक चोट नहीं आई। इसके बाद पुलिस ने मेन रोड पर ही मोर्चा जमा लिया ताकि वहाँ से अंदर दाखिल होते वक़्त ही उपद्रव करने वालों को रोका जा सके। वहीं आयोजकों में से कुछ लोगों को पहचान के लिए पुलिस ने अपने साथ खड़ा कर लिया ताकि संदिग्ध या बिना पहचान वाला कोई न घुस पाये। आनंद मोहन माथुर ने ठीक ही कहा था कि यदि विरोध नहीं होता, तो बाहर भी पैर रखने की जगह नहीं होती, मगर उन्हें अंदर नहीं पता था कि बाहर भी पैर रखने की जगह नहीं थी। हॉल में कुर्सियां फुल होने के बाद लोग नीचे बैठ गए थे और नीचे की जगह भी पूरी होने के बाद ऊपर बालकनी में चले गए थे और वहां के अलावा बाहर प्रोजेक्टर स्क्रीन पर भी देख-सुन रहे थे। एक-दूसरे की शिनाख्ती के बिना कोई भीतर नहीं जा पा रहा था और तब भी इतनी भीड़ हो गई थी। पुलिस ने बहुत ही मुस्तैदी से काम किया और कथित हिंदूवादियों को खदेड़ दिया। कुछ लोगों पर लाठियां भी चलानी पड़ीं तो झिझकी नहीं। अरसे बाद लगा कि पुलिस किसी की तरफदार नहीं है। इसीलिए आनंद मोहन माथुर, विनीत तिवारी और कन्हैया सबने पुलिस की तारीफ की। आनंद मोहन माथुर के घर पर ढेरों-ढेर पुलिस थी और कन्हैया कुमार भी पुलिस की गाड़ी में ही आए। ना तो हुड़दंगी किसी का मुंह काला कर पाए और ना ही सभागृह के पास फटक पाए। (हालाँकि उन्होंने फोटोशॉप पर फर्जी तस्वीर बनाकर कन्हैया की तस्वीर पर ही कालिख पोत दी और कहा कि इंदौर में कन्हैया का मुँह काला किया गया। इस हरक़त से उनकी झूठ फैलाने की आदत की ही पुख्ता शिनाख्त होती है।) उसके बाद फिर एक बार उन्होंने इकट्ठा होकर थोड़ी बड़ी तादाद में सभागृह की ओर बढ़ना और नारेबाजी करना शुरू किया लेकिन इतना पुलिस बल था कि वे चंद मिनटों में ही फिर खदेड़ दिए गए। कार्यक्रम इप्टा के जनगीतों ‘ये जंग है जंगे-आज़ादी, आज़ादी के परचम के तले’, और रबीन्द्रनाथ ठाकुर के गीत ‘एकला चलो रे’ से शुरू हुआ जिसकी प्रस्तुति शर्मिष्ठा और उनके साथियों ने की। विनीत ने संचालन करते हुए 9 अगस्त के बहुआयामी महत्त्व पर रोशनी डाली और विश्व आदिवासी दिवस पर आदिवासी नायकों बीरसा मुंडा और टंट्या भील को भगतसिंह और आम्बेडकर के समकक्ष बिठाकर अपना सम्मान ज़ाहिर किया। नागासाकी दिवस और भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगाँठ भी इसी दिन होने से इस मौके के मौजूँ पोस्टरों से लॉबी सजाई हुई थी। मंच पर सामने ही शलभ श्रीराम सिंह, गोरख पांडे और फ़ैज़ की नज़्में माहौल में और जोश भरने के साथ सोचने पर मजबूर भी कर रही थीं।
जनगीतों के बाद इप्टा के ही एक और समूह ने गुलरेज़ के निर्देशन में एक 15 मिनट का माइम प्रस्तुत किया जो झकझोर देने वाला था। बिना शब्दों के उसने इस देश में लोगों के बीच आपसी भाईचारे को कैसे क़त्ल किया जा रहा है, इसकी मार्मिक कहानी कही।
नर्मदा आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर के साथ एकजुटता जताने आए केरल के पूर्व वन एवं पर्यावरण मंत्री विनय बिस्वम भी इत्तफाक से उस दिन इंदौर में ही थे। अपने दो मिनट के संबोधन में उन्होंने मार्के की बात कही कि ये जो बाहर तिरंगा लेकर अपने आपको देशभक्त बताने का स्वांग कर रहे हैं, इन्हें शायद ये भी नहीं पता कि इनके मातृ संगठन आरएसएस ने कभी तिरंगे का भी विरोध किया था, इस देश के संविधान का भी विरोध किया था और आज़ादी का भी विरोध किया था। वे अंग्रेजों के ग़ुलाम बने रहकर ही खुश थे।
इंदौर के सभी आयोजकों की ओर से स्वागत वक्तव्य दिया आनंद मोहन माथुर ने और रूपांकन के कविता पोस्टरों से लाँग मार्च में शामिल सभी सभी युवा और विद्यार्थी यात्रियों का स्वागत किया गया। मंच पर लाँग मार्च के सभी यात्री पूरे जोश से मौजूद थे। जब एआईवायएफ की तरफ़ से राष्ट्रीय अध्यक्ष कॉ आफ़ताब आलम और एआईएसएफ की तरफ़ से राष्ट्रीय महासचिव कॉ विश्वजीत ने लाँग मार्च के मक़सद और अब तक के अपने अनुभवों को संक्षेप में साझा किया तो पूरे हॉल की तालियों ने उनके जज़्बे को सलाम किया और शुभकामनाएँ दीं।
इसके बाद मुख्य वक्तव्य के तौर पर कॉ कन्हैया का भाषण शुरू हुआ। कन्हैया खूब बोले। उनके बोलने में दर्द इस बात का था कि उन्हें देशद्रोही कहा गया। किसी ने उनके बारे में अखबार में लिख दिया कि – अफजल गुरू की बरसी मना कर चर्चित हुए कन्हैया…और ये लाइन उन्हें चुभ गई। उन्होंने कहा कि पहली बात तो मैंने अफज़ल गुरू की बरसी नहीं मनाई, लेकिन मनाता भी हो तो मैं अफजल गुरू की बरसी मना कर चर्चित हुआ और तुम लोग बरसों से गोड़से की बरसी मना कर चर्चित क्यों नहीं हो पाए। इसका मतलब यह हुआ कि अफजल गोड़से से भी बड़ा आतंकवादी था? फिर उन्होंने समझाया कि यह आरोप पूरी तरह झूठा है। केवल गृहमंत्री राजनाथ सिंह के ट्वीट के बाद पुलिस ने पकड़ कर मुकदमा कायम कर दिया। कोई सबूत नहीं हैं। पुलिस आज तक चार्जशीट ही फाइल नहीं कर पाई है। उन्होंने कहा कि मैं देशभक्त नहीं देशप्रेमी हूं। भक्ति में भगवान ऊपर है और भक्त नीचे। प्रेम में सब बराबर होते हैं। मैं अपने देश को प्रेम करता हूं, देश के लोगों से प्रेम करता हूं। देश की विविधता और विविधता में एकता से प्रेम करता हूं। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी हैं, सीएम शिवराज हैं, विधायक भी यहां बीजेपी का है और मैं कन्हैया कुमार इन सबके खिलाफ इसलिए बोल पा रहा हूं कि देश का संविधान महान लोगों ने लिखा है। पुलिस संविधान की कसम खाकर काम करती है और संविधान के प्रति जवाबदेह है। संघ भाजपा देश का संविधान इसीलिए बदलना चाहते हैं कि लोगो को बोलने से रोक सकें। उन्होंने कहा कि मैं मोदी विरोधी नहीं हूं, मैं अपने देश के दुखी और सताए हुए लोगों के हक के लिए लड़ रहा हूं।
वे डेढ़ घंटा बोलते रहे और लोग बस सुनते रहे, सुनते रहे। वे एक से दूसरे विषय पर जा रहे थे। तंज कर रहे थे, मुहावरे और दोहे बोल रहे थे। लोग मजा ले रहे थे, तालियां बजा रहे थे, नारे लगा रहे थे। ऐसा इसलिए कि मोदी सरकार आने के बाद इतने लोग इंदौर में पहली बार इतना खुला, साफ़ और तर्कपूर्ण वक्तव्य मोदी के खिलाफ़ सुन रहे थे। वे हर विषय पर अध्ययन और तैयारी के साथ आए थे और उनके सवालों के कोई जवाब उनके विरोधियों के पास नहीं हैं। मिसाल के तौर पर उनका यह पूछना कि सावरकर को वीर क्यों कहते हैं, उन्होंने तो अंग्रेजों से माफ़ी मांगी थी? फौज के महिमामंडन करने वाली सरकार के खिलाफ उनका सवाल है कि फिर एक रैंक एक पेंशन की योजना क्यों लागू नहीं हो रही? उनका सवाल यह है कि क्यों एक साल में तीन सौ से ज्यादा फौजी आत्महत्या कर चुके हैं?
आनंद मोहन माथुर और कन्हैया कुमार दोनों ने कहा कि हमारा मुंह काला भी कर दिया जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हमारे विचार काले नहीं कर पाएँगे। कन्हैया ने कहा कि काली टोपी और काले दिल वाले लोग काले से आगे नहीं जा सकते मगर हमारा रंग लाल है। आप हमसे नफरत करिए मगर हम देश से और अपने लोगों से मुहब्बत ही करेंगे। भाषण के अंत में लोगों के बहुत कहने पर कन्हैया ने आजादी वाला गीत गाया जो माहौल को बिल्कुल उरूज़ पर ले गया। बूढ़े क्या, अधेड़ क्या, बच्चे और नौजवान क्या, सबने खड़े होकर गाया, सबने नारे लगाए। ऐसा लगा कि जितना विरोध होगा उतना ही जोश इन लोगों के भीतर बढ़ता जाएगा। उनका लाँग मार्च देश के और कई राज्यों को पार करता हुआ हुसैनीवालां में खत्म होगा, जहां भगतसिंह का स्मारक है। सभी राज्यों के किसी न किसी शहर में कन्हैया की भी सभा होगी। मध्य प्रदेश में ये इंदौर में हुआ, इसके लिए आयोजकों की हिम्मत दाद की हक़दार है। केंद्र सरकार की ऐसी अखिल भारतीय मुखालफत कोई सियासी दल भले ना कर पाएं, नौजवानों और विद्यार्थियों ने ये बीड़ा उठाया है, ये बड़ी और उम्मीद बुलंद करने वाली बात है।
अंत में भगतसिंह दीवाने ब्रिगेड के सहसंयोजक विजय सिंह यादव (जाटव) ने आभार माना।
जब कार्यक्रम खत्म हुआ तो सब कारवाले कन्हैया को अपनी कार में बैठा कर माथुर साहब के घर तक छोड़ना चाहते थे। लेकिन कन्हैया विनीत के निर्देश के इंतज़ार में थे। आखिर में व्यापमं और ड्रग ट्रायल के मामले उजागर करने से चर्चा में आए व्हिसल ब्लोअर डॉ. आनंद राय की कार में कन्हैया और आनंद मोहन माथुर बैठे। बाहर हिंदूवादी हुड़दंगियों के मुखबिरों को खबर लग गई (या कर दी गई) कि कन्हैया कौन सी कार में है, सो उन्होंने अपनी कायराना हरकत करते हुए कार पर पथराव किया। उससे कार का काँच ज़रूर टूटा, गनमैन और ड्राइवर को काँच के छोटे-छोटे टुकड़े भी लगे लेकिन किसी को ज़्यादा चोट नहीं आई। कन्हैया माथुर जी के घर ही रुके। रात भर पचास के क़रीब पुलिस वाले माथुरजी के घर के बाहर डेरा डाले रहे। ये सवाल ज़रूर फिर भी अटकता है कि पुलिस ने पथराव करने वालों, सोशल मीडिया पर नामजद धमकी देने वालों के खिलाफ़ प्रकरण क्यों नहीं दर्ज किया।
***बचाव की तैयारी भी पूरी थी***
आयोजकों ने पैनी नजर रखी कि विरोध करने वाले कहीं समर्थक के भेस में ना आ जाएं। विरोध करने वाले दिन भर घुसपैठ की कोशिशें करते रहे मगर विनीत तिवारी, अशोक दुबे, अजय लागू, रुद्रपाल यादव, सोहनलाल शिंदे, मोहन निमजे, सत्यनारायण वर्मा, विक्की शुक्ला आदि की टीम ने किसी की एक ना चलने दी। विनीत तिवारी की टीम के लोग दोपहर तीन बजे से ही माथुर सभागृह पहुंच गए थे और सभागृह से ऐसे लोगों को बाहर निकलवा दिया, जिन्हें वे नहीं पहचानते थे। आगे की कुर्सियां भी उम्ररसीदां लोगों के लिए उन्होंने रोक लीं। इसके बावजूद अगर कोई विरोध करने वाला अंदर आ जाता तो पचास लोग लाठी वाले भी थे, जो ऐसे किसी भी हुड़दंग के लिए तैयार थे। एक गनमैन भी था। पिछली बार इन्हीं आयोजकों के इप्टा के राष्ट्रीय सम्मेलन के कार्यक्रम में कथित हिंदूवादियों ने हुड़दंग किया था, इसलिए इस बार ये लोग भी पूरी तैयारी से थे। हालांकि इस बार पुलिस भी बहुत सख्त थी। मंच पर कोई ना चढ़ पाए इसके लिए पुलिस मंच के पास भी तैनात थी। हर आदमी को विनीत तिवारी के इशारे के बाद ही अंदर आने दिया जा रहा था। पुलिस और विनीत दोनों की ही नाकेबंदी इतनी पुख्ता रही कि परिंदा भी पर नहीं मार पाया। शिवराज के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह पहली बार है, जब किसी विरोधी विचार वाले आयोजन को इतनी सुरक्षा मिली हो। आनंद मोहन माथुर और कन्हैया की पार्टी के लोगों ने भी दिल्ली-इंदौर-भोपाल एक कर रखा था। भोपाल में पुलिस के सबसे आला अफसर से मिलकर अनुरोध किया गया था कि इंदौर में धमकी मिली है और आप सुरक्षा करें और उन्होंने आश्वासन दिया कि ऐसा कोई काम नहीं होने दिया जाएगा जो संवैधानिक मूल्यों को चोट पहुँचाता हो।
***पुलिस हमारी आपकी, हमारे संविधान की, नहीं किसी पार्टी की***
कन्हैया कुमार के भाषण के दौरान कई बार तालियां बजीं, कई बार नारे लगे, डेढ़ घंटे वे ऐसा धाराप्रवाह बोले कि लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे। उन्होंने कहा कि मुझ पर कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि मैंने अफजल गुरू की बरसी मनाई और देशविरोधी नारे लगाए। गृहमंत्री के ट्विट के आधार पर पुलिस ने मुझ पर मुकदमा बनाया मगर अभी तक चार्जशीट पेश नहीं हुई है। क्यों? क्योंकि कोई सबूत नहीं हैं। जानबूझ कर यह आरोप इसलिए लगाया गया क्योंकि उस समय रोहित वेमुला की मौत का मामला चल रहा था और ध्यान हटाने के लिए किसी झूठे आरोप की जरूरत थी। उनका फोटो खींचने की कोशिश कर रहे, मीडिया वालों पर उन्होंने तंज किया कि जाइये मोदी की तस्वीर खींचिए, मुझे फोटो नहीं खिंचानी। उन्होंने कहा कि ये लोग झूठ बोलते हैं। अगर मैंने कोई गुनाह किया होता तो अदालत मुझे जमानत नहीं देती। उन्होंने इंदौर के पुलिस प्रशासन की तारीफ की और कहा कि आज जो मैं बोल पा रहा हूं तो इसका कारण यह है कि पुलिस मोदी की नहीं, शिवराज की नहीं, संविधान की कसम खाती है। भाजपा आरएसएस के लोग इसीलिए संविधान को बदलना चाहते हैं कि कोई कन्हैया बोल ना पाए। उन्होंने कहा कि जेएनयू में डेढ़ सौ देशों के विद्यार्थी पढ़ते हैं और वहां आए दिन हर तरह के अत्याचार के खिलाफ नारे लगते हैं। उन्होंने कहा कि ये बीजेपी आरएसएस वाले मुझ पर फौज विरोधी होने का आरोप लगाते हैं। मैं शहीद के परिवार से आता हूं। मेरा भाई सेना में शहीद हुआ है। मेरे घर से 16 लोग फौज में गए हैं। क्या भाजपा के किसी नेता या मंत्री का बेटा फौज में है? इनके कार्यकर्ताओं के बेटे फौज में हैं? उन्होंने कहा कि संघ लोगों को देशभक्ति के सर्टिफिकेट बांटता है, मगर क्या संघ के एक भी आदमी को देश के लिए फांसी हुई है? राम की बात करते हैं और असली भक्त ये नाथूराम के हैं। उन्होंने कहा कि सावरकर को वीर क्यों कहते हैं, मुझे नहीं पता। अंग्रेजों से माफी मांगने वाला वीर होता है, या उनसे लड़ने वाला वीर होता है? उनका इशारा अंडमान निकोबार जेल से सावरकर और उनके भाई के रिहा होने को लेकर था, जहां सावरकर और उनके भाई ने माफीनामा लिखा था और यह भी लिखा था कि हम राजनीति में हिस्सा नहीं लेंगे।
उन्होंने संघ की भारतीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि खाकी चड्डी और उस पर काली टोपी पहनना कौन से देश की संस्कृति है? उनका इशारा इस बात को लेकर था कि संघ ने अपनी वर्दी और नियमावली हिटलर की नाजी सेना से ली है। बहुत ही गहन अध्ययन के साथ वे काफी सरलता से बोल रहे थे। उनके लहजे का बिहारीपन बहुत ही अच्छा लग रहा था और उनके तंज बहुत ही असरदार और गुदगुदाने वाले थे। उन्होंने इंदौर में विरोध करने वालों को खुली चुनौती देते हुए कहा कि अगली बार मेरी सभा दशहरा मैदान पर होगी, रोक सको तो रोक लेना। उन्होंने कहा कि हम सरकारी स्कूल में जनता के पैसों से पढ़े हैं। हम देश की खातिर लड़ेंगे और संघ भाजपा को कामयाब नहीं होने देंगे। उन्होंने कहा कि भागवत कहते हैं महिलाएं रात को ना निकलें। वे ऐसा इसलिए कहते हैं कि नेताओं के बच्चे रात को निकलते हैं। उन्होंने कहा कि संघ की भारतीयता नागपुर की सीमा पर खत्म हो जाती है, जबकि देश बहुत बड़ा है। ये लोग अब महापुरुषों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर रहे हैं। नेहरू के खिलाफ पटेल को खड़ा कर रहे हैं। अगर नेहरू नहीं होते और वे अनुमति नहीं देते तो पटेल कुछ नहीं कर पाते। उन्होंने मंच पर मौजूद आनंद मोहन माथुर, पेरिन दाजी, वसंत शिंत्रे और आलोक खरे का नाम लेकर कहा कि आपने जिस तरह का भारत बनाने के लिए कुर्बानियाँ दी हैं, हम उस भारत को बचाएँगे, और आगे बढ़ाएँगे।
हॉल खचाखच भरा था। लोग ऊपर बालकनी में भी थे और बाहर भी। दरअसल हिंदूवादी कार्यकर्ताओं की जिद ने आयोजकों और कन्हैया कुमार के समर्थकों में भी जिद भर दी कि अब तो हम कार्यक्रम को सफल करके रहेंगे। बहरहाल हिंदूवादी कार्यकर्ता पुलिस के लठ खाकर लौटने के सिवा कुछ नहीं कर पाए। प्रगतिशील कॉमरेड लोग इस मामले में हिंदूवादियों पर भारी पड़े।
-दीपक असीम

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