उनका ताईवान,अपना जनकपुर – नथमल शर्मा , ईवनिंग टाईम्स

उनका ताईवान,अपना जनकपुर – नथमल शर्मा , ईवनिंग टाईम्स

बिजली गुल हो जाने
के कारण ताईवान
के मंत्री ने इस्तीफा
दे दिया । बिजली
घर में खराबी के
कारण लोग गर्मी से
परेशान थे ।

▪अपने छत्तीसगढ़ के
एक मंत्री को बच्चों
ने ज्ञापन देकर कहा
स्कूल में शिक्षक
नहीं है।मंत्री ने कहा
कहाँ से लाऊं
शिक्षक ?गुस्साए
बच्चों ने चकाजाम
कर दिया घेराव भी
किया ।
▪बिहार सहित देश के
कई हिस्सों में बाढ़
के कारण लाखों
लोग परेशान । भूखे
रहने के लिए भी
मजबूर .

 

आम तौर पर कोई अग्रलेख या टिप्पणी इस तरह से शुरू नहीं की जाती । और फिर ऊपर दी गई बातों का आपस मे कोई तादात्म्य भी दिखता नहीं । फिर भी ऐसा करना पड़ा । इसलिए कि ज़रा हम भी तो देखें-सोचें कि किस तरह के हालात में है हम। क्या सचमुच सारे आदर्श,सारी नैतिकता ताक पर धर दी गई है ? क्या कोई लिहाज नहीं बचा?और क्या अब हमने खुद से भी सवाल पूछना बंद कर दिया या कि अब हम स्वयं के प्रति भी जवाबदेह नहीं रहना चाहते ?
जी नहीं, इस शाम की बात में कोई प्रवचन नहीं कर रहे हैं हम। हालात का तीखा सच है ।

दुनिया में ताईवान की अपनी एक जगह है । बहुत तरक्की की है इस देश ने भी । इन दिनों वहां बहुत गर्मी पड़ रही है । भयंकर गर्मी । ऐसे हालात में मंगलवार को वहां बिजली गुल हो गई । करीब 66 लाख परिवार परेशान हो गए। यातायात थम गया । माॅल में सारी चहल-पहल रूक गई । गर्मी से लोग बेहाल हो उठे। पता चला कि वहां के बिजली घर में खराबी के कारण ऐसा हुआ । ताईवान के आर्थिक मामलों के मंत्री ली-चीह कुंग ने इसे अपने मंत्रालय की गलती मानते हुए नैतिकता के नाते इस्तीफा दे दिया । हो सकता है अब तक वहां बिजली घर में सुधार हो गया हो। लोगों की परेशानी दूर हो गई हो और सब कुछ पहले की ही तरह चलने लगा हो। इस बारे में ज्यादा खबर नहीं है । वैसे भी हमारा रंगीन मीडिया खबरों के इतने भीतर तक अब जाता कहाँ है ।

हाँ किसी मुख्यमंत्री का इस्तीफा हो जाए तो पल-पल की खबर मिलेगी या कि किसी अभिनेत्री का दुपट्टा सरक जाए तो भी हर एंगल से खबर बनेगी । मीडिया भी क्या करे लोग ही तो राजनीति और मांसल सौंदर्य की खबरों में ज्यादा रूचि लेने लगे हैं । इससे टीआरपी बढ़ती है । मालिकान खुश होते हैं । तनख़्वाह बढ़ती है । कमीशन भी । खैर फिर भी,किसी पत्रकार ने ही तो ताईवान के मंत्री के इस्तीफे वाली खबर दी और अख़बार के किसी कोने में वह छप गई । छपनी पहले पन्ने पर थी पर (पहले पन्ने पर आजकल खबरें या ऐसी खबरें नहीं होती। पहले पन्ने अब सरकार या कार्पोरेट खरीद लेती
है । )

दुनिया के किसी कोने में ताईवान है और वहां के मंत्री ने नैतिकता दिखाई । हम गर्व से कह सकते हैं (हिंदू है वाले गर्व से नहीं ) हमारे रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने तो बरसों पहले सिर्फ एक रेल दुर्घटना के कारण इस्तीफा दे दिया था । ताईवान में आज हुआ । हम तो बरसों पहले ऐसा करके “ऐसा करने ” को भूल भी चुके । तभी तो अपने छत्तीसगढ़ में एक मंत्री ने कह दिया कि – शिक्षक नहीं है तो मैं क्या करूँ ? कहाँ से लाऊं ?

सरगुजा में एक नगर है जनकपुर । इसी जनकपुर में हायर सेकेंडरी स्कूल है । इस स्कूल में कोई शिक्षक ही नहीं है । मंत्री जी एक मंदिर जा रहे थे । दर्शन करने । रास्ते में स्कूल के विद्यार्थियों ने रोक लिया । बाकायदा लिखित में ज्ञापन दिया कि शिक्षक चाहिए । गुस्सा आया (होगा) मंत्री जी को। कह दिया कि मैं कहाँ से लाऊं शिक्षक । बस बच्चों को भी गुस्सा आ गया । कर दिया चक्का जाम । इस स्कूल में 27 शिक्षक होने चाहिए लेकिन सिर्फ पांच ही है । तीन घंटे बाद शिक्षा विभाग का ही एक ब्लाक स्तर का अधिकारी आया । आश्वासन दिया कि दो शिक्षक तुरंत आ जाएंगे । तब धरना खत्म हुआ । बात सही थी। मंत्री जी का गुस्सा भी जायज़ । ब्लाक स्तर का अधिकारी जो काम कर सकता हो उसके लिए उन्हे क्यों रोका गया ? बच्चे समझते नहीं । धीरे-धीरे समझ जाएंगे ( शायद ) मंत्री जी की ताकत और व्यवस्था का सच। हो सकता है ना भी समझें और इसी का हिस्सा बन जाए ।

अब ताईवान में कोई एकाध होगा जो ये आदर्श की बात करता हो। लाल बहादुर शास्त्री का जमाना भी तो बीत गया । एक क्या कई एक्सीडेंट हो जाएँ । गाडिय़ों में घटिया खाना मिलता रहे । यात्रियों का सामान चोरी होता रहे । इस सबमें गलती मंत्री की थोड़े ही होती है । सब काम के लिए ज़िम्मेदारी बांट दी गई है । शास्त्री जी के समय नहीं रही होगी । सब काम उन्हें ही करना पड़ता होगा । इसलिए खुद इस्तीफा दिया । अब तो जिम्मेदार कर्मचारी निलंबित कर दिए जाते हैं । पर्याप्त है । और फिर कितने मंत्री इस्तीफा दें ? हर विभाग में ही गड़बड़ियों की भरमार है ।

अब हमारे ही शहर में बरसों से सीवरेज बन रहा है । शहर खुद रहा है । लोग मर भी रहे हैं । गलती ठेकेदार की है । उसे चेतावनी देते हैं । जुर्माना भी लगाते हैं । काम चल रहा है । लोग ज्यादा नाराज़ भी नहीं है । या हों भी तो चुप रहने के लिए मजबूर हैं । पर्याप्त है इतना । क्यों इस्तीफा दे मंत्री । फिर चाहे कोई भी मामला हो। जनता को कष्ट सह लेना चाहिए । बाढ़ के हालात में भी कुछ दिन भूखे रह जाना चाहिए । मुख्यमंत्री तो हेलीकाप्टर से देख गए हैं उनकी तकलीफ । देखते हुए देखने के लिए मीडिया के साथी भी गए थे साथ में । दिखा दी है तस्वीरें । छाप भी दी है । अब बाढ़ तो प्राकृतिक विपदा है । कोई राजनीतिक मामला तो है नहीं कि गठबंधन तोड़ दिया जाए। इस्तीफा दे दिया जाए। बाढ़ प्रभावित गांवों में राहत दी जाएगी । कुछ समय बाद सब ठीक हो जाएगा । जैसे सीवरेज को भुगतते हुए हमारे यहाँ भी हो जाएगा सब ठीक ।

हम एक भयावह दौर से गुजर रहे हैं । इसमें राजनीति से सब कुछ तय होता है और राजनीति की दिशा क्या होगी इसे कार्पोरेट तय करते हैं । फिलहाल तो जनता सब कुछ सहने और चुप रहने की ही भूमिका में है । वह कुछ बदलने से खुद को जैसे असहाय सी पा रही है । राजनीति का अहंकार अपने चरम पर है और नैतिकता बहुत गहरे कहीं धंसी हुई है । चाणक्य की बात कि- प्रेम,युद्ध और राजनीति में सब जायज है का अधूरा पाठ करते हुए राजनीति सब कुछ जायज ठहराने में लगी है । इसमें बच्चों की समस्याएं,बाढ पीड़ितों का दुख,कटते पेड़,सूखती नदियां,सिमटता प्रतिपक्ष, आदि सबकुछ बिला गया है । लोग भरोसे का भ्रम पाले हुए जीते रहने का अभिनय ही कर रहे हैं । राजनीति अपने स्तर की चरमसीमा पर पहुँच कर कुटिल मुस्कान के साथ विकास कर रही देश का।

कवि चंद्रकांत देवताले की पंक्ति याद आ रही है- लकड़बग्घा हंस रहा है ।

नथमल शर्मा
(ईवनिंग टाइम्स में प्रकाशित आज शाम की बात)

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