किस (नंद) के आनंद भयो -नथमल शर्मा ,ईवनिंग टाईम्स 

किस (नंद) के आनंद भयो -नथमल शर्मा ,ईवनिंग टाईम्स 

 

नथमल शर्मा
*(ईवनिंग टाइम्स में प्रकाशित आज शाम की बात )*

आजादी के जश्न के साथ ही जन्माष्टमी की खुशियाँ। शान से लहराता तिरंगा और दही लूट के लिए फूटती हांडी । आजादी के आंदोलन को , शहीदों को एक बार फिर याद करने का दिन । लाल किले की प्राचीर से लेकर हर शहर के पुलिस मैदान में अपने भाग्य विधाताओं की बातें और सीख सुनने का भी दिन । गूंजते आजादी के तरानों के बीच ही अपने बहुत प्यारे बच्चों को नाचते-गाते देखने का सुखद अहसास । स्वतंत्रता दिवस मनाकर लड्डू लेकर लौटते बच्चे । हम सब भी अपने बचपन में लौटते हुए और बूंदी का स्वाद याद करते हुए इन प्यारे बच्चों को थोड़ा थके लेकिन खिलखिलाते हुए लौटते देखते हैं । रात को ये माखन – मिश्री खाएंगे।

कुछ ऐसा ही माहौल है देश में । घर-घर में माँ बना रही है माखन और धनिया की पंजेरी भी। जो नहीं बना पाई उसने भी रख दिया है दही फ्रीज़ में । अच्छा ठंडा हो जाए तो बनाएंगी माखन । घर-घर सज रहे हैं झूले । बरसों से जन्में लड्डू गोपाल आज फिर जन्मेंगे। आजादी के जश्न और जन्मदिन की खुशियाँ । ऐसे ही माहौल में उत्तर प्रदेश के कई गांवों में अंधेरा है । 65 मांएं याद कर रही है अपने कान्हा को। पिछली जन्माष्टमी को कितना तंग किया था माखन के लिए । और दही लूट में जाने मचल भी रहा था । समझाई थी कि अभी छोटे हो बेटे । बड़े होकर जाना । इन पैंसठ घरों में बहुत ही अंधेरा है । हालांकि इनकी जिंदगी में आज तक रौशनी नहीं आई। आती तो सरकारी अस्पताल में इलाज कराने के लिए अभिशप्त क्यों होते ? हमारे देश में सरकारी स्कूलों में पढ़ना,सरकारी अस्पतालों में इलाज करवाना,सरकारी दूकानों से राशन लेना । ये सब अभिशप्त लोगों की श्रेणी वालों की ही मजबूरी है ।

इन सरकारी संस्थानों को चलाने में बहुत रूपये खर्च होते हैं । करोड़ों-अरबों रूपये । हम सब अपने मेहनत-पसीने की कमाई से जोड़ – जोड़ कर देते हैं सरकार को। रूपयों की कोई कमी नहीं है । हमने अपने तंत्र को ही इतना सड़ा दिया है कि उसकी बदबू में सारी खुशबू छिप जाती है । एक प्रधानमंत्री ने बरसों पहले कहा था कि दिल्ली से एक रूपया निकलता है लेकिन गांवों तक सिर्फ पंद्रह पैसे ही पहुँच पाते हैं । इसकी खूब चर्चा हुई थी । लेकिन हमें ना उस समय शर्म आई और ना ही आज ही आती है । आज उन पैंसठ निर्दोष बच्चों की मौत पर हम कहते हैं – होता है,हर साल ही अगस्त में बच्चे मरते हैं । ऐसा कहने वाले सरकार चला रहे हैं । सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के दामाद हैं । इतना ही नहीं जब बहुत ज्यादा हल्ला होने लगता है तब हम कह देते हैं कि – इतना बड़ा देश है ये । ऐसे हादसे तो होते ही रहते हैं । ऐसा कहने वाले भी हमारे ही समान या हमसे बहुत ज्यादा जिम्मेदारी सम्हाल रहे हैं । हमारे जनप्रतिनिधि है और सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के मुखिया । ऐसा सुनकर हमें तो गुस्सा नहीं आया । क्योंकि हमारे लिए सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं । हम बहुत कमा रहे हैं । बहुत बचा रहे हैं । शाम को चाय की चुस्कियां लेते हुए बीवी के साथ टीवी पर भ्रष्टाचार की खबरें सुनकर, पूरे तंत्र को गालियाँ देकर अपना कर्तव्य निभा रहे हैं । कभी – कभी सब्जी में नमक कम होने पर अपना गुस्सा बीवी पर निकाल रहे हैं । टीवी देखते हुए अपने बच्चों को ईमानदारी और नैतिकता का पाठ पढ़ा रहे हैं ।

 

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के हम कमजोर लोग और कर भी क्या सकते हैं भला । हम चुप समाज के डरे हुए लोग हैं । बोलना सचमुच खतरनाक है । हमें अपनी जिंदगी से बहुत प्यार है । हममें से ज्यादातर लोग अपना बिजली,पानी सबका पूरा बिल भरते हैं । टैक्स पटाते हैं । बैंक से लिए कर्ज की किश्तें पटाते हैं । फिर भी हम डरे हुए लोग हैं । हम कहते हैं भगतसिंह का जमाना गया । गांधी नेहरू का भी । हम इस निर्मम समय के डरे हुए नागरिक है जो जानते हैं कि बोलने वाले नरेन्द्र दाभोलकर मार दिए जाते हैं । मरने पर कहीं कुछ फर्क भी नहीं पड़ता । पहले हम पत्रकारों से थोड़ी उम्मीद करते थे । एक नेता लालकृष्ण आडवाणी की बात- कि इमरजेन्सी में पत्रकारों को धीरे चलने कहा गया था पर वे तो रेंगने लगे। इसका सबसे भयावह रूप ही देख रहे हैं हम । अब रेंगने की जरूरत ही नहीं क्योंकि कोई धीरे चलने के लिए भी नहीं कह रहा है । सत्ता के अहंकार और ताकत ने ज्यादातर कलमों की स्याही में सोना मिला दिया है । ऐसी स्याही अब बहुत सुनहरा लिखती है । स्याह नहीं । इसलिए उत्तर प्रदेश के गावों में रो रही पैंसठ माँ के आंसू नहीं दिखते सुनहरी स्याही को। इसलिए कि इतने बड़े देश का यह एक हादसा ही तो है ।

आजादी के जश्न में बहुत अच्छी और देशभक्ति की बातें होनी चाहिए । ईमानदारी की क़समें खानी चाहिए । कम से कम एक दिन तो ऐसा होना ही चाहिए । फिर अगले दिन या अगले क्षण से ही हम अपने भ्रष्ट तंत्र को मजबूत करने में जुट जाएं। अपने बहुत प्यारे छत्तीसगढ़ में उस दिन ऐसा ही तो हुआ । रक्षा बंधन जैसे पवित्र त्यौहार में बहनों ने अपने स्कूल में बुलाया सेना के जवानों को। भैया तुम्हारी बहनें यहाँ नहीं तो क्या । हम तो हैं, लेकिन जवानों ने उसी समारोह में नन्ही – नन्ही बहनों के साथ शर्मनाक हरकत कर दी। समाज से नैतिकता के क्षरण का इससे बड़ा और क्या उदाहरण होगा ।

देशभक्ति के गाने उन पैंसठ माओं को सुनाई नहीं दे रहे हैं । उन्हें अपने रोते बच्चे की याद आ रही है । पहली बार जब वो नन्हा या नन्ही हंसी थी वह चेहरा याद आ रहा होगा । किसी दिन का जोर से खिलखिलाना भी याद आ रहा होगा । और ये सब याद करके बहुत रो रही होंगी । उनके आंसू पोंछने कोई नहीं गया होगा । दिन में आजादी का जश्न और रात को कान्हा का जन्मदिन ।

*हाथी दीना घोड़ा दीना*
*और दीना पालकी*
*नंद के आनंद भयो*
*जै कन्हैया लाल की*
कुछ इसी तर्ज पर आनंद मनाते जन्माष्टमी भी बीत जाएगी । रोती रहेंगी वे पैंसठ मांएं । इन सभी माँ के लाल /लालियां सिर्फ 69 लाख रूपयों के लिए मर गए या मार दिए गए । गोरखपुर में बाबा राघव दास के नाम पर सरकारी अस्पताल है। इस अस्पताल को हर बरस करोड़ों रूपये दिए जाते हैं ताकि मुफ्त में इलाज हो । यह देना कोई खैरात नहीं है । हमारा संवैधानिक अधिकार है । गोरखपुर तो अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का शहर है । इस शहर के सरकारी अस्पताल में आक्सीजन की कमी के कारण पैंसठ बच्चे मर गए। इसलिए कि आक्सीजन की आपूर्ति जो कंपनी कर रही थी कई महीनों से उसे भुगतान नहीं मिला था । यह रकम बढ़ते – बढ़ते पैंसठ लाख हो गई । कंपनी ने कई बार कहा । गोरखपुर से लखनऊ तक सबसे कहा । लेकिन भुगतान नहीं हुआ । घटना के दो दिन पहले मुख्यमंत्री भी आए थे इसी अस्पताल में । समस्याओं को जानने । पता नहीं उन्हें ये उन्हत्तर लाख वाली बात किसी ने बताई या नहीं । और इसी कारण पैंसठ बच्चों की जान चली गई । अब मामलेकी जांच होगी । अफसर बताएंगे मौत का सही कारण । हादसों के बाद अफसर जांच करते हैं और सही कारण बता देते हैं । जाहिर है इसमें भी आक्सीजन की कोई कमी नहीं थी ,यह तो लिखा ही जाएगा । सरकारी कलमें अक्सर ऐसा ही तो करती हैं क्योंकि उनमें स्याही तो राजनेताओं की कुर्सी के पायों से भरी जाती है ।
बहरहाल वे पैंसठ मांएं बहुत दुखी हैं । नंद के आनंद को जरूर मनाएं हम सब लेकिन उनके दुख को भी तो महसूस करें । उन्हें उनके बच्चे तो लौटा नहीं सकते पर अब किसी माँ की गोद इस तरह सूनी ना हो इसकी कोशिश तो कर ही सकते हैं । अपने गाँव,शहर के अस्पतालों के साथ ही नदियों,तालाबों को बचाने के लिए,सरकारी स्कूलों और बाकी संस्थानों को भी बचाने के लिए अपनी भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं । सब कुछ सरकार के भरोसे छोड़ देने से कुछ नहीं होना – जाना । सरकार नहीं पहुंची है उन बिलखती माओं के आंसू पोंछने । ऐसा कहने वाले हम भी तो तैयार नहीं है अब किसी के आंसू पोंछने के लिए । हमारी प्यास छीन कर जो लोग बिसलेरी पी रहे हैं उनके खिलाफ भी बोलने के लिए हम तैयार नहीं है और ना ही जिन नदियों को सुखाकर बिसलेरी की बोतलें भरी जा रही है उन नदियों को ही बचाने हम आगे आ रहे हैं । विडंबना यह भी कि हम सरकार पर और सरकार हमारे पर भरोसा ही नहीं करती। हमारे काले धन को बाहर लाने के लिए सरकार नोटबंदी करती है । हम बहुत परेशान होते हैं लेकिन चलन से ज्यादा नोट बदलवा लेते हैं बैंकों से। सरकार कालाधन ढूंढते रहती है । हम तो साफ सफाई भी नहीं रख सकते । इसके लिए अभियान चलाना पड़ता है । टायलेट एक प्रेम कथा फिल्म बनानी पड़ती है । हमारे खेत खलिहान सब विकास की चकाचौंध चक्की में पीस दिए जा रहे हैं । हम चमचमाते माॅल में विकास की रौशनी से खुद को चमकाए रखने का भ्रम पाले रौशन हुए जा रहे हैं । इस चकाचौंध में पैंसठ घरों का अंधेरा नहीं देख रहे । देखने के लिए तैयार भी नहीं है । शायद इसलिए कि हमारे साथ तो ऐसा हुआ नहीं। और होगा भी नहीं । इसलिए हम आजादी के जश्न और नंद के आनंद में मगन है । गोरखपुर (और हर शहर ) में रो रहीं हैं माँ । भारत माँ की जय बोलते हुए हम उसके आंसू देखने और पोंछने (फिलहाल ) तैयार नहीं है । इसलिए स्वतंत्रता दिवस अमर रहे …जय कन्हैया लाल की भी।

-नथमल शर्मा
*(ईवनिंग टाइम्स में प्रकाशित आज शाम की बात )*

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