चरक के देश में जनस्वास्थ्य उपेक्षित-  जेके कर

चरक के देश में जनस्वास्थ्य उपेक्षित- जेके कर

14.8.17

# जे सी कर

गोरखपुर में ऑक्सीजन की कमी के कारण इंसेफ़ेलाइटिस से पीड़ित 60 बच्चें जिंदगी से हाथ धो बैठे हैं. इस मौसम में गोरखपुर में यह बीमारी आम है तथा एक बार इंसेफ़ेलाइटिस से याने दिमागी बुखार हो जाने के बाद मरीज को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है ताकि मरीज की सांस चलती रहे. फौरी तौर पर ऑक्सीजन न होने के कारण बच्चे काल के ग्रास में चले गये. इससे भी भयानक सवाल है जिस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है कि आखिरकार क्यों इतनी ज्यादा संख्या में बच्चें इस इंसेफ़ेलाइटिस का शिकार हुये. दरअसल यह मच्छरों के कारण फैलने वाली बीमारी है. इस कारण यदि साफ-सफाई का ध्यान रखा जाये, मच्छरों को पनपने न दिया जाये तथा उनके लार्वा को कंट्रोल किया जाये तो इंसेफ़ेलाइटिस की बीमारी से बचा जा सकता है. आज लोग बच्चों के मरने पर चिल्ला तो जरूर रहें हैं परन्तु यह सवाल कितने लोगों ने उठाया है कि गोरखपुर तथा उसके आस-पास मच्छरों को कंट्रोल करने के लिये सरकार के द्वारा कोई उपाय क्यों नहीं किया गया.

हमारे देश में महर्षि चरक ने रोग से निदान के लिये आयुर्वेद का सहारा लिया था. उन्होंने इस पर एक किताब चरक संहिता भी लिखी थी जिसका उदेश्य जनस्वास्थ्य के लिये जागरूकता फैलाना तथा बीमार पड़ने पर उसका ईलाज दिया गया था. यह पुरानी बात है लेकिन अंग्रेजों के शासनकाल में सर जोसेफ भोरे ने 1946 को स्वास्थ्य पर दिये रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया था कि रोग-निवारण के साथ-साथ रोगों से बचाव के लिये भी उपाय किये जाये तथा पैसे के अभाव में कोई चिकित्सा से वंचित न रह जाये. उन्होंने अपनी अनुशंसा में कहा था कि इसकी जिम्मेदारी सरकार को लेनी पड़ेगी. जाहिर है कि रोगों से बचाव तथा रोगों से लड़ने के लिये खर्च करने पड़ते हैं.

साल 2013-14 के आंकड़ों के अनुसार उत्तरप्रदेश में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर खर्च मात्र 492 रुपये साल में किया गया. इसकी तुलना में उत्तराखंड ने 1270 रुपये, असम ने 855 रुपये, बिहार ने 385 रुपये, छत्तीसगढ़ ने 802 रुपये, झारखंड ने 461 रुपये, मध्यप्रदेश में 540 रुपये, ओडिशा ने 543 रुपये, राजस्थान ने 760 रुपये खर्च किये गये. इसी दौरान आंध्रप्रदेश ने प्रति व्यक्ति 1030 रुपये, दिल्ली ने 1635 रुपये, गोवा ने 2723 रुपये, गुजरात ने 848 रुपये, हरियाणा ने 858 रुपये, हिमाचल प्रदेश ने 1876 रुपये, जम्मू-कश्मीर ने 1549 रुपये, कर्नाटक ने 829 रुपये, केरल ने 1033 रुपये, महाराष्ट्र ने 681 रुपये, पंजाब ने 1015 रुपये, तमिलनाडु ने 935 रुपये, पश्चिम बंगाल ने 630 रुपये खर्च किये.

इस आंकड़ें के अनुसार उत्तरप्रदेश में सकल घरेलू उत्पादन का मात्र 1.20 फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च किये गये थे. इसकी तुलना में उत्तर-पूर्व के राज्यों में से अरुणाचल प्रदेश ने 2.83, मणिपुर ने 2.92, मेघालय ने 2.02, मिजोरम ने 2.71, नगालैंड ने 2.23, सिक्किम ने 2.11 तथा त्रिपुरा ने 2.53 फीसदी अपने राज्य के सकल घरेलू उत्पादन के हिसाब से प्रति व्यक्ति खर्च किये.

जनता के स्वास्थ्य पर सरकार द्वारा (राज्य+केन्द्र) साल 2009-10 में 72,536 करोड़, 2010-11 में 83,101 करोड़, 2011-12 में 96,221 करोड़, 2012-13 में 1,08,236 करोड़, 2013-14 में 1,12,270 करोड़, 2014-15 (RE) में 1,40,152 करोड़ तथा 2015-16 (BE) में 1,52,267 करोड़ रुपये खर्च किये गये.

यदि इसे प्रति व्यक्ति खर्च के रूप में देखा जाये तो यह प्रतिवर्ष क्रमशः 621 रुपये, 701 रुपये, 802 रुपये, 890 रुपये, 913 रुपये, 1121 रुपये तथा 1211 रुपये का रहा. इसी को जब सकल घरेलू उत्पादन के लिहाज से देखेंगे तो पायेंगे कि यह प्रतिवर्ष यह क्रमशः 1.12%, 1.07%, 1.09%, 1.08%, 1.12% तथा 1.12% का ही रहा है.

इसे यदि केन्द्र और राज्य सरकारों के खर्चे के रूप में देखा जाये तो प्रतिवर्ष यह क्रमशः 36:64, 35:65, 35:65, 33:67, 34:66, 29:71 तथा 28:72 के अनुपात में रहा. इस तरह से केन्द्र सरकार वस्तुतः स्वास्थ्य पर किये जा रहे खर्चे में कटौती करती जा रही है जबकि राज्य सरकारें इसे बढ़ा रहीं हैं. जाहिर है कि राज्य सरकारों द्वारा स्वास्थ्य पर खर्चों में की जा रही बढ़ोतरी के बावजूद भी भारत में अन्य देशों की तुलना में स्वास्थ्य पर कम ही खर्च किया जा रहा है.

भारत की तुलना में अन्य देशों द्वारा स्वास्थ्य पर अपने सकल घरेलू उत्पादन का कितना फीसदी खर्च किया जाता है यह देखना भी दिलचस्प होगा. साल 2013 में इन देशों में से मालदीप की सरकार ने स्वास्थ्य पर अपने सकल घरेलू उत्पादन का 6.2 फीसदी खर्च किया. इसी तरह से थाईलैंड ने 3.7 फीसदी, भूटान ने 2.7 फीसदी, नेपाल ने 2.6 फीसदी, श्रीलंका ने 1.4 फीसदी, बांग्लादेश ने 1.3 फीसदी, इंडोनेशिया ने 1.2 फीसदी, तिमोर-लेस्टे ने 1.2 फीसदी, भारत ने 1.1 फीसदी तथा म्यमार ने 0.5 फीसदी खर्च किये थे.

यदि स्वास्थ्य पर विकसित देशों द्वारा किये जा रहे खर्चो को देखा जाये तो साल 2013 में ही जर्मन सरकार ने 8.7 फीसदी, इग्लैंड ने 7.6 फीसदी, कनाडा ने 7.6 फीसदी, रवांडा ने 6.5 फीसदी, आस्ट्रेलिया ने 6.3 फीसदी, कोलंबिया ने 5.2 फीसदी, ब्राजील ने 4.7 फीसदी, दक्षिण अफ्रीका ने 4.3 फीसदी, तुर्की ने 4.3 फीसदी, थाईलैंड ने 3.7 फीसदी, घाना ने 3.3 फीसदी, रूसी फेडेरेशन ने 3.1 फीसदी, मेक्सिको ने 3.2 फीसदी, चीन ने 3.1 फीसदी, फिलीपींस ने 1.4 फीसदी खर्च किये थे.

कुल मिलाकर मामला जनता के स्वास्थ्य पर खर्च करने का है. भारत हथियारों के बड़े आयातकर्ता देश के रूप में जाना जाता है. हथियारों पर दिल खोलकर खर्च किये जाते हैं. भारत को डिजीटल बनाने के लिये, स्वच्छ बनाने के लिये तथा और कई योजनाओं पर भारी-भरकम रकम खर्च की जाती है परन्तु जहां पर बात साफ-सफाई तथा मच्छरों की आती है वहां पर किये गये खर्च का कोई फायदा होता नहीं दिखता. मच्छरों के कारण ही डेंगू, चिकनगुनिया जैसे जानलेवा रोग फैलते हैं.

कुछ समय पहले मोदी सरकार ने जन-स्वास्थ्य पर एक योजना पेश की थी. जिसमें सदइच्छा जाहिर की गई है कि स्वास्थ्य पर खर्च को सकल घरेलू उत्पादन के 3 फीसदी के बराबर किया जायेगा. क्या गोरखपुर में ऑक्सीजन की कमी के कारण जो मूलतः सप्लाइकर्ता कंपनी को पैसे चुकता न किये जाने के कारण हुई है तथा 60 बच्चों की जान चली गई है देश के नीति-निर्धारकों की नींद खुलेगी कि जनता को स्वस्थ्य रखने के लिये राज्य तथा केन्द्र सरकार को अपनी जेब से और ज्यादा खर्च करना पड़ेगा.

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