कवियों के कवि शमशेर* की ग़ज़लें पढ़ेंगे.-दस्तक में आज प्रस्तुत

कवियों के कवि शमशेर* की ग़ज़लें पढ़ेंगे.-दस्तक में आज प्रस्तुत

आज हम कवियों के *कवियों के कवि शमशेर* की ग़ज़लें पढ़ेंगे. उम्मीद है कि चाकचौबंद होकर मौके पर मोर्चा सँभालने वाले मेरे प्रिय प्रिय मित्र भी पढ़ेंगे भी.

*वक़्त सबसे हिसाब माँगेगा, अभी जो जैसा चाहे गा बजा ले*

*हम तो ईमान लेके चलते हैं, जो जब जैसा चाहे आजमा ले.*

वक़्त वो आ गया है कि हर कोई कहे-

*तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की*

*ये एहतियात ज़रूरी है इस दहर के लिए.*

पढ़ें और अपनी बात कहें.
_________________________

*|| अपने दिल का हाल यारो हम किसी से क्या कहें ||*

अपने दिल का हाल यारो हम किसी से क्या कहें
कोई भी ऐसा नहीं मिलता जिसे अपना कहें

हो चुकी जब ख़त्म अपनी ज़िंदगी की दास्ताँ
उन की फ़रमाइश हुई है इस को दोबारा कहें

आज इक ख़ामोश मातम सा हमारे दिल में है
ख़्वाब के से दिन हैं वर्ना हम इसे जीना कहें

यास दिल को बाँध सर पर जल्द साया कर जुनूँ
दम नहीं इतना जो तुम से साँस का धोका कहें

देख कर के आख़िर-ए-वक़्त उन की मोहब्बत की नज़र
हम को याद आया वो कुछ कहना जिसे शिकवा कहें

उस की पुर-हसरत निगाहें देख कर रहम आ गया
वर्ना जी में था कि हम भी हँस के दीवाना कहें

क़ाफ़िले वालो कहाँ जाते हो सहरा की तरफ़
आओ बैठो तुम से हम मजनूँ का अफ़्साना कहें

मुश्क-बू-ए-ज़ुल्फ़ उस की घेर ले जिस जा हमें
दिल ये कहता है उसी को अपना काशना कहें.


*|| चुपके से कोई कहता है शाएर नहीं हूँ
मैं ||*

चुपके से कोई कहता है शाएर नहीं हूँ में
क्यूँ अस्ल में हूँ जो वो ब-ज़ाहिर नहीं हूँ मैं

भटका हुआ सा फिरता है दिल किस ख़याल में
क्या जादा-ए-वफ़ा का मुसाफ़िर नहीं हूँ मैं

क्या वसवसा है पा के भी तुम को यक़ीं नहीं
मैं हूँ जहाँ कहीं भी तो आख़िर नहीं हूँ मैं

सौ बार उम्र पाऊँ तो सौ बार जान दूँ
सदक़े हूँ अपनी मौत पे काफ़िर नहीं हूँ मैं.

*|| फिर किसी को इक दिल-ए-काफ़िर-अदा देता हूँ मैं ||*

फिर किसी को इक दिल-ए-काफ़िर-अदा देता हूँ मैं
ज़िंदा हूँ और अपने ख़ालिक़ को दुआ देता हूँ मैं

बे-ख़ुदी में दर्द की दौलत लुटा देता हूँ मैं
जब ज़ियादा होती है मय तो लड़ा देता हूँ मैं

अपने ही क़द्र-ए-ख़ुदी की पुर-तकल्लुफ़ लज़्ज़तें
आप क्या लेते हैं मुझ से और क्या देता हूँ मैं

इश्क़ की मजबूरियाँ हैं हुस्न की बेचारगी
रू-ए-आलम देखिएगा आईना देता हूँ मैं

आरज़ुओं की बयाबानी है और ख़ामोशियाँ
ज़िंदगी को क्यूँ सबात-ए-नक़्श-ए-पा देता हूँ मैं.


*|| यहाँ कुछ रहा हो तो हम मुँह दिखाएँ
||*

यहाँ कुछ रहा हो तो हम मुँह दिखाएँ
उन्हों ने बुलाया है क्या ले के जाएँ

कुछ आपस में जैसे बदल सी गई है
हमारी दुआएँ तुम्हारी बलाएँ

तुम एक ख़्वाब थे जिस में ख़ुद खो गए हम
तुम्हीं याद आएँ तो क्या याद आएँ

वो इक बात जो ज़िंदगी बन गई है
जो तुम भूल जाओ तो हम भूल जाएँ

वो ख़ामोशियाँ जिन में तुम हो न हम हैं
मगर हैं हमारी तुम्हारी सदाएँ

बहुत नाम हैं एक ‘शमशेर’ भी है
किसे पूछते हो किसे हम बताएँ.


जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद
|

जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद
वही शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद

आज फिर काम से लौटा हूँ बड़ी रात गए
ताक़ पर ही मेरे हिस्से की धरी है शायद

मेरी बातें भी तुझे ख़ाबे-जवानी-सी हैं
तेरी आँखों में अभी नींद भरी है शायद!

***

✍🏻 *शमशेर बहादुर सिंह*

*दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले*

CG Basket

Related Posts

Leave a Reply

Create Account



Log In Your Account



%d bloggers like this: