मेधा पाटेकर – कवि एकान्त श्रीवास्तव

मेधापाटेकर

# एकांत श्रीवास्तव
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समुद्र है तो बादल है
बादल है तो पानी हैं
पानी है तो नदी है ,
नदी है तो बची हुई है , मेधापाटेकर
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नदी है तो घर हैं
उनके किनारे बसे हुए
घर हैं तो गाँव हैं ,
गाँव है मगर डूबान पर
डुबान में एक द्वीप है
स्वप्न का झिलमिल , मेधापाटेकर
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वह जंगल की हरियाली है
चिडियों का गीत
फूलों के रंग और गंध के लिये लडती
जडोँ की अदम्य इच्छा हैं वह , मेधापाटेकर
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वह नर्मदा की आँख है
जल से भरी हुई ,
जहाँ कश्तियाँ डूबने से बची हुई है
सत्ता के सीने में तनी हुई बंदूक है
धरती की मांग का
दिप दिप सिन्दुर है , मेधापाटेकर.
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कविता एकांत श्रीवास्तव
पाठ किया आज शाकिर अली ने

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