भारत के संघीय ढांचे को लगातार झकरोरा जा रहा है  – नन्द कश्यप

भारत के संघीय ढांचे को लगातार झकरोरा जा रहा है – नन्द कश्यप

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संघीय ढाँचे की वकालत करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालने के बाद के बाद सहकारी संघवाद की वकालत की, लेकिन व्यवहार में ठीक उल्टा ही हो रहा है. त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों ने कई बार संघीय ढांचे को कमजोर करने की शिकायत खुलकर की है. इतना ही नहीं, अतिकेद्रीकृत व्यवस्था की तरफ केंद्र सरकार लगातार कदम बढ़ाती जा रही है.

भाजपा और खासकर मोदी ने खुलकर आधार, जीएसटी का विरोध किया था. राज्यों की स्वायत्तता की बात की थी. परन्तु इन तीन वर्षों में मोदी सरकार ने उन्ही चीजों को लागू किया. इतना ही विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों के प्रभुत्व को कम करने या उन्हें अधीन करने की प्रवृत्ति ने जोर पकड़ी है. ताजे घटनाक्रम के रूप में बिहार में भाजपा का जदयू का साथ जाना और गुजरात में विधायकों से इस्तीफे दिलाना, बंगलुरु तक जाकर छापे के जरिये घेरने की कवायद भी शामिल है. विरोधी राजनीतिक दलों द्वारा शासित राज्यों में अराजक तत्वों को सरक्षण देकर उनको अस्थिर करने का प्रयास, जिसके बंगाल और त्रिपुरा उदाहरण हैं.
संघवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर गौर करें तो पाएंगे कि 18 वीं सदी में आधुनिक दुनिया के लोकतांत्रिक व्यवहार के केंद्र में अमेरिकी स्वतंत्रता का घोषणा पत्र है जो सभी नागरिक समान घोषित करता है.

फ्रांस की क्रांति से निकले आजादी, समानता, बंधुत्व जैसे मूल्य और नस्लीय गुलामी के खिलाफ अमेरिकी गृह युद्ध के बाद अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र की परिभाषा ‘जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए’ दी. उन्होंने कहा था कि इसे पृथ्वी से मिटाया नहीं जा सकेगा. इन्हीं नारों के इर्दगिर्द औद्यगिक दुनिया में लोकतांत्रिक संघर्ष और जन मुक्ति के आंदोलन खड़े हुए. चूंकि पूंजीवाद और औद्योगीकरण की प्रवृत्ति केन्द्रीकरण की है, इसलिए इन आंदोलनों से ही प्रशासन और व्यवस्था के विकेंद्रीकरण की बात निकली, सहकारिता का नारा निकला. मजदूरों की पहली क्रान्ति से निकले रूस ने भी 1917 में अपने देश को सहकारिताओं का समाजवादी संघ कहा था. अमेरिका और रूस के संविधान में राज्यों को पूर्ण स्वायत्तता दी गई है. उन्हें संघ से अलग होने के लिए अपने विधान बनाने अधिकार मिले हैं. यहाँ तक कि ग्रेट ब्रिटेन को भी अपने अधीन राज्यों के लिए स्वायत्तता की घोषणा करनी पड़ी और आज के दौर में स्काट्लैंड में यूके से अलग होना है या नहीं के लिए जनमत संग्रह होता है.

स्मार्ट शहर, नोटबंदी, जीएसटी और आधार, ये तमाम कदम हमारे संघीय ढांचे को कमजोर करते अति केंद्रीकृत व्यवस्था की ओर ले जा रहे हैं. हमारे समक्ष स्थानीय नगर निकायों के उदाहरण हैं जब से उनकी वित्तीय स्वायत्तता और कराधान के व्यापक अधिकार छीने गए हैं, अधिकाश कर्ज मंल डूबे हुए हैं. उनके पास अपने कर्मचारियों के वेतन या बिजली के बिल पटाने पैसे नहीं होते. जीएसटी के बाद राज्य सरकारों की हालत एेसी नहीं होगी, इसकी गारंटी नहीं है.

भारत में संघीय ढांचे को झकझोरने और कमजोर करने का प्रयास नया नहीं है. लेकिन अब यह सब पहले से ज्यादा आक्रामक ढंग से किया जा रहा है. राज्यों के पुनर्गठन के बावजूद उनके अधिकारों और आर्थिक श्रोतों की उपलब्धता के सवालों पर केंद्र और राज्यों के बीच विवाद जारी है. खासकर आपातकाल के बाद जब जनता पार्टी की सरकार बनी जब जनता पार्टी के कई घटक क्षेत्रीय राजनीति के धुरी बने. वहीं बंगाल में ज्योति बसु के नेतृत्व में वाम मोर्चा सरकार अस्तित्व में आई, तब राज्यों को और अधिकार देने, सत्ता का विकेंद्रीकरण करने के लिए एक सहमति बनी, लेकिन जब श्रीमती गांधी 1980 में दोबारा सत्ता में आईं और राज्यों में चल रहे विपक्षी दलों की सरकारों पर हमले शुरू हुए. कुछ को धारा 356 के तहत भंग किया गया. तब ज्योति बसु ने धारा 356 के दुरूपयोग के खिलाफ तमाम मुख्यमंत्रियों से बात कर, संविधान में उल्लेखित संघीय ढांचे को बचाने और राज्यों के अधिकारों की बात पर एक समन्वय बनाने का आह्वान किया. तभी एक घटना आंध्रप्रदेश में हुई, तत्कालीन कांग्रेस महासचिव राजीव गांधी जब हैदराबाद के बेगमपेट हवाई अड्डे पर उतरे तो मुख्यमंत्री पर नाराजगी जताई और ऊंची आवाज में बात की. राजनैतिक क्षेत्रों में इसे तेलगु अपमान के तौर पर देखा गया, फिर राज्यसभा के लिए कांग्रेस से टिकट न मिलने पर तेलगू देशम पार्टी बनाई और 83के चुनाव में तेलगू सम्मान के नारे के साथ प्रचंड बहुमत से चुनाव जीता. इस जीत ने केन्द्र राज्य संबंधों पर बहस को और तेज कर दिया.

इस पृष्ठभूमि में ही जून 1983 में न्यायमूर्ति आर एस सरकारिया की अध्यक्षता में बी शिवरतन और डॉ. एस आर सेन की तीन सदस्यीय आयोग का गठन हुआ. न्यायमूर्ति सरकारिया ने केंद्र-राज्य संबंधों और राज्यों में संवैधानिक मशीनरी ठप हो जाने की स्थितियों की व्यापक समीक्षा की और 1988 में सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में उन्होंने इस संदर्भ में समग्र दिशा-निर्देश सामने रखे. उन्होंने कहा कि राज्यपालों की नियुक्ति में मुख्यमंत्रियों से सलाह ली जानी चाहिए. राज्यपालों के पक्षपातपूर्ण आचरण पर अंकुश लगाने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए. यदि चुनाव में किसी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो राज्यपाल को सबसे बड़े चुनाव पूर्व गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना चाहिए.

राज्यपालों को राजभवन के लाने में विधायकों की गिनती कर किसी दल या गठबंधन के बहुमत के बारे में निर्णय नहीं लेना चाहिए. बहुमत का परीक्षण राज्य विधानसभा में ही होना चाहिए. इन सिफारिशों के अतिरिक्त सरकारिया आयोग ने संघीय सरकार के सञ्चालन के लिए तमाम सिफारिशें की. इन सिफारिशों में राज्यों को श्रोतों के बंटवारे और कराधान के अधिकार में उनकी राय का केंद्र सम्मान करे, आपात स्थिति में राज्य नए कर लगा सकते हैं आदि भी हैं.

भले ही सरकारिया आयोग की शिफारिशे पूरी तरह से लागू नही हुई, परन्तु देश में क्षेत्रीय राजनैतिक ताकतों के उदय ने संघीय ढाँचे को और मजबूत किया. आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू होने के साथ ही केंद्र राज्य समीकरण सत्ता के समीकरणों में बदलने लगे, जो क्षेत्रीय ताकतें कभी अपनी जनता की आकांक्षा और संघीय ढांचे को मजबूत करने राज्यों में समन्वय कर केंद्र के समक्ष साझा मांग रखते लोक कल्याणकारी योजनाओं के लिए दबाव बनाते लोकतंत्र के लिए एक वैचारिक प्रतिबद्धता रखते हैं. उन्हें बाजार हित में कदम उठाने लोक कल्याणकारी योजनाओं से हटने दबाव आने लगे. 2004 में जब यूपीए की सरकार आई तो न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाते समय ये सारी बातें आई और उसमे राज्यों के वित्तीय अधिकार, पारदर्शिता, रोजगार के अधिकार, आदिवासियों को जंगल का अधिकार और किसानों के लिए भूमि अधिग्रहण आदि के लिए कानून बने. ये सारी बातें वैश्वीकरण की अतिकेंद्रीकृत व्यवस्था के विपरीत थी.
तब सरकार पर सब्सिडी कम करने दबाव, एक राष्ट्रीय कर प्रणाली विकसित करने, सभी नागरिकों को एक नंबर दे उनका बायोमीट्रिक पहचान बनाने और सार्वजनिक क्षेत्रों के निजीकरण का दबाव आया और 2014 के चुनावों में ये मुद्दा बना.

भाजपा ने और खासकर मोदी ने खुलकर आधार, जीएसटी का विरोध किया था. राज्यों की स्वायत्तता की बात की. परन्तु इन तीन वर्षों में मोदी सरकार ने उन्ही चीजों को लागू किया. उस पर तुर्रा ये कि स्वच्छता अभियान के तहत खुले में शौच के खिलाफ एक तरह से तुगलकी फरमान जारी कर दिया. यह सोचे जाने बिना कि उसे लागू करने के लिए पानी कहाँ से आयेगा? राज्यों की दिक्कतों जनता की दिक्कतों पर कोई संवाद नही हुआ, सीधे सीधे कुछ सेलीब्रिटीज को मैदान में उतार दिया गया.
देश में जगह जगह उठ रहे असंतोष इस ओर इंगित कर रहे हैं कि यदि असहमतियों को दबाया गया है, क्षेत्रीय आकांक्षाओं को सम्मान नहीं मिलेगा तो ये असंतोष देश में एक बेहद अराजक स्थिति पैदा कर देगी. यद्यपि हम आज यह नहीं कह रहे की संघीय ढांचा टूट गया है, लेकिन वह हिंडोले सा झूल रहा. उसे लोकतात्रिक स्पेस से ही स्थिर किया जा सकता है. सरकारिया आयोग की सिफारिशों पर अमल करने और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय बनाने की आज भी जरूरत है.

नन्द कश्यप अगस्त 17

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