Jul
31.8.17
खरीन्यूज़ से आभार सहित 

ज़ुलैख़ा जबीं

30 जुलाई 2017 को “मन की बात” कार्यक्रम के 34वें संस्करण में भारतीय पीएम के मुंह से 14जुलाई 2017 दक्षिणी दिल्ली के घिटोरनी में सौ फुटा रोड पर सेप्टिक टैंक की सफ़ाई के दौरान को 4 सफ़ाई कामगारों (स्वर्ण सिंह, अनिल कुमार, दीपु,बलविंदर)  की “हत्या” पर किसी तरह की श्रद्धांजलि, अफ़सोस, दुख जताना तो दूर उन ग़रीब परिवारों  को सांत्वना देने के लिये दो बोल भी नहीं फूटे.

मरना हर जीव की नियति है. जब किसी “सफ़ाई कामगार” की मौत होती है तब वो किसी एक आदमज़ाद की साधारण मौत नहीं बल्कि सभ्य कहे जाने वाले सवर्ण समाज द्वारा जानबूझकर की जाने वाली “हत्या” होती है. इस बात से भले आप सहमति न हों- लेकिन सवाल का जवाब आपको देना ही पड़ेगा कि सीवर, गटर, मेनहोल, सेप्टिक टैंक में, आपकी आंखो के सामने सफ़ाई करने के लिए ज़िंदा उतरने वाले नौजवान की, कुछ देर बाद निकाली जाने वाली मुर्दा लाश देखकर आपके अंदर कहीं कुछ टूटता बिखरता भी है ?  अगर नहीं तो आप इंसानी शक्ल मे भेड़िये हैं जिसका पेट “सड़ी  लाशों के गोश्त” से ही भरा जाता है.

अगर आपको अंदर “कुछ” बेचैन करता है तो ज़रा बताइये, बॉर्डर पर सेना के जवान का मरना शहादत है (क्यूंकी दुश्मनों से वो हमारी जान की सुरक्षा करते हैं) और आपकी पैदा की गयी गंदगी को साफ़ करते हुये दम घुट के मरना “शहादत” क्यू नहीं?  उसने भी तो आप, आपके परिवार, जान माल की सुरक्षा की है, आपका स्वास्थ्य बिगड़ने से बचाया है. वो बदबू जो बच्चों सहित आप और आपके परिवार के दिमाग़ की नसें फाड़ देती- उससे सुरक्षा की है, आपके परिवार की खुशहाली क़ायम रक्खी है.  मगर उसके अपने बच्चे, परिवार का पालन पोषण का आखिरी सहारा (वो ख़ुद) आपकी सुरक्षा पर कुर्बान हो गया है.  आपको इससे कोई फ़र्क़ पड़ा है ? क्या ज़िम्मेदारी बनती है आप या आपके सभ्य समाज की उस सफ़ाई कामगार और उसके बेसहारा परिवार के प्रति? क्या उसे अच्छी तनख्वाह पर सरकारी (पक्की) नौकरी, मकान,स्वास्थ्य सुविधाएं, यात्रा सुविधाएं (पास) नहीं दिया जाना चाहिए? उसे भी सरकारी अफसरों की तरह एरियर्स, प्रोविडेंट फंड  नहीं मिलना चाहिए? उसके काम के घंटे नहीं तय होना चाहिए? उसके लिए भी ओटी (ओवर टाइम)का विकल्प नहीं होना चाहिए? उसे भी “सवर्ण” सरकारी दामादों की तरह कई तरह “Leave with Pay” का हक़दार नहीं बनाया जाना चाहिए? आप ही की तरह उनको भी इज्ज़त और सम्मान नहीं दिया जाना चाहिए?

1,96,000 हज़ार करोड़ की भारी भरकम राशि के साथ 2019 तक भारत “देश” को एक “स्वच्छ” देश बनाने की मौजूदा पीएम की घोषणा-सुनने में तो भली मालूम पड़  सकती है मगर इसके पीछे का वीभत्स सच देखने का माद्दा कितने लोगों के पास है.? हिन्दू, हिंदी, हिन्दु-स्थान का उद्घोष करने वाले,  “हिन्दूराष्ट्र” के बाशिंदे होने का ख़ाब पाले, मनुवाद परस्त, वर्ण व्यवस्था की पैरोकार, देश की बहुसंख्यक तथाकथित हिन्दू आबादी  “जाति व्यवस्था” के फार्मेट में  स्वच्छ भारत की कल्पना कैसे कर सकती है ? अपार धनराशि की आपसी बन्दर बाट और अरबपति “बंबइया नटों” पर रुपये लुटाती सरकार, चमकते विज्ञापनों से जाति व्यवस्था और उससे उपजी बजबजाती नालियों, सीवरों, सेप्टिक टैंकों  को बग़ैर सफ़ाई कामगारों को शामिल किये पूरा कैसे करेगी? इसकी कोई योजना, रणनीति सरकार के पास आज भी नहीं हैं. झक्क सफ़ेद कपड़ों में गुलाबी रंगत लिए सवर्णों का गिरोह, साफ़ सुथरी सड़कों पर नयी नवेली झाडू लगाता फोटु में ख़ूब दिखा है मगर अपने ही घर के बजबजाते सीवर में उतर कर सफ़ाई करता हुआ कोई भी एक नेता या उसका प्रणेता  पिछले 3 बरसों में तो दिखाई नहीं दिया.

विकास की कपोल कल्पना में मस्त भारत का नाकारा युवावर्ग मदमस्त हाथी की तरह “अंधराष्ट्रप्रेम” के नशे में झूम रहा है.

इसे बेशर्मी भरा मज़ाक़ ही कहा जाएगा कि मुस्लिम, दलित बहुल राज्य यूपी का मुख्यमंत्री दलितों के गाँव में जाने से पहले साबुन, शैम्पू बंटवाता है जिससे नहाकर “दलित” उसके अस्थायी दरबार में हाज़िर किए जाएं, उसपर भी “गुर्गों” की ये कोशिश रही कि कोई अछूत “पाखंडी पुजारी” से  छू न जाए.
स्वच्छ भारत अभियान के तहत साफ़ –सफ़ाई की बात बहुत कही जा रही हैं लेकिन, सफाई कामगारों की सुरक्षा पर ध्यान देने जैसी कोई सुगबुगाहट भी देश के भीतर देखने को नहीं मिल रही है. यही वजह है कि बीते सौ दिनों में देश के अंदर 39 सफ़ाई कामगारों की “हत्या” नाले या सीवर की सफ़ाई करते हुए हो चुकी है.

मामूली से मामूली बात पर ट्वीट करने वाला भारत का पीएम इन युवा (अछूतों) की “सरकारी हत्या” पर न ट्वीट करता है, न ही “मन की बात” मे उनका कोई ज़िक्र. इस हैवानी बेहिसि को आप देश का गौरव कह सकते हैं. स्टेच्यु आफ़ यूनिटी, मेक इन इंडिया, बुलेट ट्रेन जैसे विकास की कपोल कल्पना के नशे में डूबे देश के लिए क्या ये शर्म की बात नहीं कि उनकी लाड़ली औलादों की तरह हाड़मांस का ज़िंदा शरीर उन्हीं की पैदा की हुई बजबजाती गंदगियों को साफ़ करने के लिए सीवर, सेप्टिक टैंक, मेनहोल में नंगे बदन  उतरता ही नहीं है बल्कि उसके अंदर जमी गंदगी बाहर निकाल उसके चमचमाते घरों के लिए राहत और सुकून का सामान पैदा करता है. बदले मे दी जाने वाली थोड़ी सी इज्ज़त और एहसान के बजाए हिक़ारत से कुछ रुपये उसके सामने फेंक दिये जाते हैं जो न्यूनतम मज़दूरी से भी कम होते है. हमारी गंदगी मे उतरते हुये जब वो बीमार पड़ते हैं उनके इलाज/दवाओं के लिए कोई फंड होना तो दूर (“आप” जिसकी गंदगी साफ़ करके वे बीमार होते हैं) उनकी सुध भी नहीं लेते.

आपको शायद हीं मालूम हो सालभर में क़रीब 22 हज़ार सफ़ाई कामगार सीवर, सेप्टिक् टैंक, मेनहोल मे उतारने से मरते हैं. इन्फ़ैकशेस डिसिज (ईडी) अस्पताल में संक्रामक बीमारियों के मरीज़ों में 50 फीसदी से ज़्यादा मरीज़ इसी सफ़ाई कामगार तबक़े यानि अछूत समुदाय से आते हैं फेफड़े संबंधी बीमारियाँ, माइग्रेन, कई तरह की एलर्जी, एग्ज़ीमा, अस्थमा, टीबी, त्वचा संबंधी बीमारियाँ जैसी अनेकों बीमारियाँ इस समुदाय को सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारे लिए “स्वच्छ माहौल” बनाने  की जुगत में लगती है.  मगर इनका कोई पुरसाने हाल नहीं. मनुवाद परस्त, वर्णव्यवस्था पोषक, हमारी सरकारों की नज़र में ये समुदाय अनचाही संतान की तरह है जिसका श्रम तो उन्हें चाहिए मगर उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी नहीं ली जाएगी. क्यूंकी वे अछूत हैं.

आज़ादी के बाद से तथाकथित मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों ने इस मेहनतकश समुदाय के युवाओं का ज़बरदस्त आपराधिकरण किया है. आज सभी पार्टियां उन्हें मुफ़्त के लठैत की तरह इस्तेमाल कर रही हैं. शिक्षा इनकी पहुँच से कोसो दूर की जा रही है. अच्छी नौकरी इनके लिए नहीं हैं क्यूंकी ये शिक्षित नहीं हैं. सफ़ाई कामगारों को पक्की नौकरी नहीं है. जिनकी नौकरियाँ हैं भी ठेके पर हैं. गंदगी ये उठाएँ मगर इनके सारों पर बैठे सवर्ण बगैर मेहनत किए ठेकेदार बनके इनके मेहनत की कमाई पर ऐश करें.

ये मेहनतकश अब ठेकेदारों के रहमों करम पे ज़िंदा है. क्यूंकी ये ग़रीब हैं. अपनी खुद्दारी को दांव पर लगाकर उसके सामने पैसों के लिए गीड़गिड़ाना कितना अपमानजनक और तकलीफ़ देह होता है ये इनके अलावा कोई और समझ ही नहीं सकता. इन्हें नियमित, समय पर तनख़ाह नहीं दी जाती. रिटायर होने पर पीएफ़ ज़बरदस्ती लटकाया जाता है. अगर दिल्ली के ही सफ़ाई कामगारों की बात की जाए तो इनकी मुख्य समस्याएँ हैं- इनके पास ईएसआई कार्ड का न होना. कांट्रेक्ट लेबर को न्यूनतम वेतन नहीं मिलना. एरिअर्स, डीए, में कटौती किया जाना, यात्रा के लिए बस ट्रेन का “पास” न बनाया जाना, स्वास्थ्य कार्ड न बनाया जाना, इनके बच्चों को छात्रवृत्ति न दिया जाना. सीवर, सेप्टिक टैंक, मेनहोल में उतरने वाले मज़दूरों को प्रापर कास्ट्यूम न दिया जाना. बीमार होने पर स्वास्थ्य सुविधाओं का ना मिलना, काम के दौरान दमघुट के मरने वालों के परिवार को त्वरित, समुचित मुआवज़ा न मिलना, अगर वे इंसाफ़ मांगने जाएँ तो उन्हें समय पर इंसाफ़ न दिया जाना. महिला सफ़ाई कामगारों के साथ किए जाने वाले अभद्र, मानसिक, शारीरिक, यौनिक हिंसा, शोषण, अत्याचार पर अमानवीय उपेक्षा व अपमानजनक रवैय्या जैसी  कई सारी समस्याएँ हैं जो हमारे देश में सफ़ाई कामगारों के मज़दूर, इंसान और खुद्दार नागरिक के आत्माभिमानी के साथ ज़िंदा रहने के हकों की सिर्फ़ अनदेखी नहीं की जाती बल्कि इन मज़दूरों के बच्चों सहित पूरे परिवार के बाल, किशोर व मानवीय हक़ो की अवहेलना/उपेक्षा की जाती है.

ग़ौरतलब है कि 26 फ़रवरी 2017 को 29वीं बार “मन की  बात” प्रोग्राम में ट्विनपिट टायलेट का ज़िक्र करते हुये पीएम ने एक IAS अधिकारी (परम अय्यर)के गटर साफ़ करने पर जिन शब्दों में प्रतिक्रिया दी पाठकों के लिए वो जानना ज़रूरी है उन्होने अपने उद्बोधन मे कहा कि “जब एक आईएएस अफ़सर टायलेट का गटर साफ़ करता है तो देश के लिए उसे जानना ज़रूरी है. साथ ही “उनकी” तरफ़ “ध्यान” दिलाना “हमारा” दायित्व भी है. उन्होने कहा कि टायलेट के गड्ढों से हम घृणा करते हैं हमें अपनी सोच बदलनी पड़ेगी. हम इसे “काले सोने” की नज़र से क्यों नहीं देखते हैं? और यह भी कि हमें खुले में शौच जाने की आदत बदलनी होगी”.

सफ़ाई के दौरान का फ़ोटो अपने ट्विटर पर शेयर करते हुये अय्यर ने लिखा था कि “ट्विनपिट टायलेट को साफ़ करना सुरक्षित है और यह भी कि शौचालय कि सफ़ाई से घृणा करने कि ज़रूरत नहीं है” (परम अय्यर जो पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय में सचिव हैं ने 18फ़रवरी2017 को स्वच्छ भारत मिशन के तहत वारंगल ज़िले के गंगादेवपल्ली गाँव मे टायलेट का गटर साफ़ क्या किया था साफ़ सुथरे चुना पावडर से मार्क किए हुये गड्ढे मे खड़े होकर नए चमचमाते हुये औज़ारों से सूखी मिट्टी उठाकर नए तसले में डालने का फ़ोटो खिंचवाया. गटर ऐसा धौला पोंछा हुआ जैसे किसी ग्रामीण का आँगन हो. शहर के बदबू से बजबजाते गटर जिसमें आम सफाईकर्मी गले तक डूबकर सफ़ाई करता है ऐसा कोई कर दिखाये तो कुछ बात दिखे के करके स्वच्छता का संदेश दिया था.

पीएम का ये आचरण निंदनीय है. गंदगी और बदबू से भरे गटर में नंगे बदन उतारने वाले ख़ास वर्ग से आने वाले सफ़ाई कामगारों का अपमान भी है. तब जबकि पिछले एक बरस में गटर/सीवर की सफ़ाई करते हुये 22 हज़ार 327 भारतीय नागरिक मारे गए हों (एस आनंद–द हिन्दू) सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन (SKA ) के आंकड़ों की मानें तो हर 2 दिन में एक सफ़ाई कामगार की मौत हो रही है.

आज़ादी के 71बरस बाद आज भी भारतीय समाज में एक मानववर्ग ऐसा भी है जो हाथों से मैला साफ़ करके सर पर ढोता है. इस काम मे बड़ी तादाद में औरतें लगी हुयी हैं. ये क्या कम शोचनीय पहलू है देश और राज्य सरकारें विकास का ढिंढोरा पीट रही है और इस सर्वे  रिपोर्ट की मानें तो भारत में आधी जनसँख्या के पास शौचालय  की सुविधा नहीं है आज भी हज़ारों ऐसे गांव हैं जहा सीवरेज़ सिस्टम न होने की वजह से घरों से गन्दा पानी निकलने का कोई जरिया नहीं होने के कारन ये काम हाथ से करना पड़ता है आज भी क़रीब 7 लाख शुष्क शौचालय ऐसे हैं जहां  मल निकासी की व्यवस्था नहीं है इसलिए यहाँ मल साफ़ करने के लिए लोगों की ज़रूरत होती है.

देश और राज्य सरकारों ने सर पर मैला ढ़ोने की प्रथा ख़त्म करने के लिए ढेरों जतन करने के नाटक किये हैं, लेकिन हक़ीक़त में उनकी सभी कोशिशें बेमानी ही साबित हुयी हैं. सवर्ण सरकार की कमजोर इच्छाशक्ति और ग़लत नीतियों की वजह से आज भी बड़ी संख्या में दलित समुदाय के लोग इस घृणित परंपरा से अपनी आजीविका चलाने को मजबूर हैं. दलितों में बाल्मीकि समाज और मुस्लिमों में हेला समाजके लोग सर पर मैला धोने का काम आज भी कर रहे हैं. आज भी वे परंपरागत तरीक़े से शौचालय की साफ़ सफ़ाई, मरे जानवरों को ठिकाने लगाने, नालियों, नालों की सफ़ाई, सेप्टिक टैंकों की सफ़ाई, अस्पतालों, रेल्वे स्टेशनों, सुलभ शौचालयों में साफ सफाई, मलमूत्र साफ करने के काम को करने वाले बाल्मीकि समुदाय के लोगों के आर्थिक सामाजिक हालात दूसरे लोगों की तुलना में बेहद दयनीय और अमानवीय हैं.

राजनितिक पार्टियां इन्हें सिर्फ वोटबैंक की तरह इस्तेमाल करती हैं लेकिन देश के दूसरे नागरिकों की तरह इन्हें बराबरी से हक़ देने में किसी की दिलचस्पी नहीं रही है. सफाई कामगारों के लिए बनायीं गयी योजनाओं पे सरकार खुद अमल करना नहीं चाहती. क़ीक़त ये है कि बहू धार्मिक बहू संस्कृति वाले विविधता से भरे भारत देश की बहुसंख्यक आबादी  वर्ण व्यवस्था के आखिरी पायदान पे लटका दी  गयी है, वो चाहे भी तो वहाँ से फिलहाल उबर नहीं सकती. हालांकि ये अब आबादी कसमसाते हुये पहलू भी बदल रही है जिसके कारण उनपर ब्रहमंवादियों के हमले बदले हुये स्वरूपों में बढ़े हैं…. लेकिन इसमें भी फिक्रमंद कर देने वाला पहलू ये है कि दलितों में भी महा दलित तबक़ा अभी भी गहरी नींद कि आग़ोश मे है- लेकिन जल्द ही उसे भी जागना पड़ेगा वरना बहोत देर हो चुकी होगी.

ये कहना अतिशयोक्ति नहीं कहाएगी कि भारत का स+वर्ण समाज देश कि बहुसंख्यक आबादी दलितों और आदिवासियों के मानवीय/नागरिक हकों का हत्यारा है इसपर 302 के साथ ही पोकसो जैसी IPC कि धारायें लगाकर  जेलों में ठूंस दिया जाना चाहिए या तगड़ा जुर्माना वसूला जाकर उसका उपयोग सफ़ाई कामगारों की अगली पीढ़ियों के उत्थान पर लगाया  जाना चाहिए. पिछले 70 बरसों से भारतीय स+वर्ण समाज सफ़ाई कामगारों के जीवन सुरक्षा के हको के पक्ष पर आय अदालतों के फैसले/ आदेशों और संविधान की अवमानना/उल्लंघन कर रहा है.

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जुलैखा जबीं

लेखिका सामाजिक सरोकारों खासकर महिलाओं के सवालों को लेकर मुखर सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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