यह हमारे मित्र *विभाष उपाध्याय* हैं । विभाष प्रख्यात रंगकर्मी रंग निर्देशक हैं । बालरंग संस्था का वर्षों से संचालन कर रहे हैं । इंडियन पपेट थियेटर के अंतर्गत कठपुतली कला के प्रदर्शन के लिए भी प्रख्यात है । विभाष भाई के साथ उनकी पत्नी *अनिता उपाध्याय* और बेटियां *सिग्मा , त्रिज्या औऱ परिधि* भी रंगकर्म के प्रति समर्पित हैं । विभाष भाई , अनिता जी के साथ हम लोगों ने 25 साल पहले साक्षरता कला जत्थे के लिए भी काम किया है । इस समूह में उनके अनुभवों से हम लोग लाभान्वित होंगे ऐसी उम्मीद है ।

*शरद कोकास*

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विभाष उपाध्याय 
रंगकर्मी .

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रंगमंच सारी साहित्यिक और प्रदर्शन कलाओं का समुच्चय होता है।
बात 1986 या 87 की है। दुर्ग में मध्यप्रदेश साहित्य सम्मेलन का कविता रचना शिविर लगा था जिसमें मैं डरते डरते शामिल हुआ। वहां जीवन की पहली कविता लिखी।उस समय स्टेशन पर सिग्रेट आदि पर पाबंदी नहीं थी। तो एक घटना को मैंने लिखा।

स्टेशन
सूटबूट
व्यक्ति,
बच्चा- साहब जूता पालिश करवा लो भूख लगी है
चल भाग भिखारी कहीं का
भिखारी??
प्रश्न बच्चे की आखों में
साहब ने महंगी सिग्रेट का गहरा कश ले कर एक छल्ला बनाया
द्दल्ला जब बिगड़ा तो मुझे दिखा छल्ले में उसी बालक का चेहरा
अब भी उसकी आंखों में प्रश्न था
द्दल्ला कुछ और बिगड़ा तो वही बालक जवान हुआ
उसी द्दल्ले में बूढ़ा हुआ
और धुवां अस्तित्वहीन हो गया
साहब के मुख से निकला
एक दूसरा छल्ला

इसके बाद नाटकों के लिए अनेक गीत और कविताएं लिखीं। लेकिन स्वतंत्र कविता नहीं लिखीं। किसी विधा में अनावश्यक हस्तक्षेप ठीक भी नहीं
साथियों , मुझे कविता मंचन से बहुत प्रेम है।
मेरी मरहूम बहन निशा गौतम ने एक उर्दू नज्म का अनुवाद किया था जिसे हमने अनेक स्त्रीप्रधान नाटको में मंचन का हिस्सा बनाया।अभी अभी पूना में एक राष्ट्रीय स्पर्धा में मानसी जैन अभिनीत इस मचन को पुरस्कृत किया गया

शीर्षक — मृत बालिका की पुकार।

उस समय मैं तीन बरस की थी
चार हो सकते हैं
बड़ी हद पांच की
तीन के चार अंकल आए
पहले मेरे द्दोटे भाई को मारा
फिर बड़े को
फिर बाबा और अम्मां को
फिर मुझे मारने लगे
मैंने पूछा अंकल मुझे क्यों मारते हो
बोले तू मुखबिर है
मैंने पूछा अंकल मुखबिर क्या होता है?
जवाब में एक नहीं दो नहीं
पूरी चौदह गोलियां दाग दीं
और मुझे छलनी कर दिया
सच जानो
मुझे अब भी नहीं पता मुखबिर किसे कहते है।

झ्स नज़्म का मंचन देखने वालों की आंखों से कुछ आंसू जरूर निकाल देता है।
आदरणीय प्रभा सरस की कविता ” धरती के दो ध्रुव” पाषाण युग से आज तक की स्त्री की कहानी बताती है।
काफी लंबी कविता है और हमारे नुक्कड़ नाटकों के पहले इसका मंचन हम अक्सर करते हैं।
अपनी अगली पारी मैं इसे ज़रूर शामिल करूंगा.

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विभाष उपाध्याय

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