विद्या गुप्ता आज दस्तक में  

जन्म 1953 उज्जैन म.प्र.

कृति दो काव्य संग्रह

1. और कितनी दूर
2. पारदर्शी होते हुए
3. दो संकलित संग्रह

संपर्क श्री सदन 160., आर्य नगर, दुर्ग छ.ग.
फोन 0788-5011534

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मृत्यु

हे मृत्यु !
हाथ में तक्षक लेकर
हमेशा डराती रही मुझे
डरता रहा मैं
पराजित होता रहा तुमसे

हे मृत्यु !
तुम सत्य हो
शाश्वत है तुम्हारा आना
किसी कारण के साथ

मैं करना चाहता हूं
परीक्षित की तरह
मृत्युंजयी होकर
तुम्हारा स्वागत

जंजीरों से मुक्त कर लूंगा
देह के बंधन
छोड दूंगा, छुड़ाने से पहले
घर देहरी दीवार
खोल दूंगा द्वार

मृत्यु तुम देखोगी
मैं मुस्कुरा कर
सौंप दूंगा स्वयं, तुम्हे
अपनी देह
चला जाउंगा उस पार
तुम्हे लांघते हुए

 

बोने और काटने के बीच

तुम्हारे अभिमन्यु
सीख रहे हैं गर्भ में
चक्रव्यूहों के सारे दांव-पंेच
जो रच रहे हो तुम !
उसकी स्मृतियां
सहेज रही है, तुम्हारे पगचिन्ह
धन, ऋण गुणा भाग
वह सीख रहा है, तुम्हारे गणित के सारे रहस्य

घर के अंधेरे कोनों में
सिसकती पीढ़ियां
नकारी गई संवेदना के दंश
दायित्वों से मुंहजोरी करते
तुम्हारे तर्क
तुम्हारे विचार रात दिन है जाल
जिसमें
पतंगे की तरह फंस जाते है तुम्हारे अपने
कागजी गुलदस्तों में
बसंत के भ्रम
फसल बोने और काटने के
अलग-अलग समीकरण
तुम्हारे पगचिन्हों पर
कदम-कदम जमाते चलते वह
लौटायेगा तुम्हें
तुम्हारे बबूल

अभी भी समय है
जीवन के उर्वरा खेत में बो दो
खुशियों के बीज
सहवेदना के अंकुर
सहज हंसी की, सौंधी की खुशबू और
थोड़ा सा सुख औरों के लिये

सीख लेगा
तुम्हारा अभिमन्यु
कैसे बोई जाती है, प्यार की फसलें

कैसे हस्तांतरित की जाती है
जीने की कला
कैसे बांटी जाती है, सुख की सौगातें

सच,
फिर नहीं होगा
कोई अंधेरा कोना
तुम्हारे लिये

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विद्या गुप्ता

प्रस्तुति: sharad kokas

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