कमजोर तबकों पर जुल्म वाला यह कैसा विकसित लोकतंत्र है? — सुनील कुमार ,संपादकीय छत्तीसगढ़

*’छत्तीसगढ़’ का संपादकीय*
4 नवंबर 2016
*कमजोर तबकों पर जुल्म वाला यह कैसा विकसित लोकतंत्र है?*
केरल से कल समाचार आया कि वहां गैंगरैप की शिकार एक महिला से पूछताछ करते हुए पुलिस ने यह जानना चाहा कि कई बलात्कारियों में से किसके साथ उसे सबसे अधिक मजा आया। यह बात भारत की पुलिस और अदालतों के बारे में पहले से जानी जाती है कि बलात्कार की शिकार महिला के साथ पूरी न्याय प्रक्रिया के चलते और कई बार जुबानी बलात्कार होता है। देश के कई हिस्से ऐसे हैं जहां पर शिकायत लेकर थाने पहुंची महिला के साथ पुलिस सचमुच ही शारीरिक बलात्कार करने में जुट जाती है। अब इससे परे की एक खबर अभी महाराष्ट्र से आई है कि एक आदिवासी इलाके में स्कूल की छोटी बच्चियों के साथ हेडमास्टर और शिक्षक बलात्कार करते थे, और अब वे गिरफ्तार हुए हैं। दूसरी तरफ भोपाल से लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं कि वहां की जेल से फरार सिमी के सदस्य, आतंक के आरोपी लोगों को पुलिस ने जिस तरह मुठभेड़ में मार गिराया, उसके पीछे पुलिस का मारने का पक्का इरादा दिखता है, और किसी को जिंदा पकडऩे की जहमत नहीं उठाई गई। मुंबई फिल्म उद्योग के एक कुख्यात साम्प्रदायिक और हिंसक बयान देने वाले गायक अभिजीत का बयान आया है कि आतंकियों के लिए अदालतों का समय बर्बाद करना ठीक नहीं है, वे जहां दिखें उन्हें ठोंक देना चाहिए। एक आखिरी खबर छत्तीसगढ़ के रायगढ़ की है जहां शव वाहन न मिलने पर एक गरीब परिवार अपने मृतक को कंधों पर ढोकर कई किलोमीटर ले जा रहा है।
इन सबमें एक बात एक सरीखी है कि ये सबके सब अलग-अलग किस्म के कमजोर तबकों के लोग हैं। भारत में महिला एक कमजोर तबका है, आदिवासी एक दूसरा कमजोर तबका है, अल्पसंख्यक भी कमजोर हैं, और गरीब भी कमजोर हैं। इसलिए इन सबके साथ जितने किस्म के जुल्म हो सकते हैं, उन्हें सामाजिक और राजनीतिक मंजूरी सी मिली हुई है। और भारत के धर्मालु बहुसंख्यक लोगों का यह भी मानना रहता है कि अगर ईश्वर इन्हें सजा देना नहीं चाहता, तो ये इस जन्म में गरीब क्यों होते, कमजोर तबके के क्यों होते, लड़की बनकर क्यों पैदा होते, या फिर विकलांग (दिव्यांग) क्यों होते? धर्म ने लोगों की सोच को इंसाफ से बहुत दूर धकेल दिया है, और जाति व्यवस्था ने, समाज की आर्थिक असमानता ने लोगों को और अधिक जुल्म करने के लिए तैयार भी कर दिया है और वे इसे बेइंसाफी भी नहीं मानते। भारतीय लोकतंत्र में न्याय प्रक्रिया से लेकर सरकारी व्यवस्था तक, और निजी क्षेत्र से लेकर समाज-मोहल्ले तक हर किस्म के कमजोर तबके ज्यादती झेलने के आदी हो गए हैं, और ताकतवर तबके ज्यादती करने के।
अधिकतर लोग ऐसे हैं जो भारत में चुनाव प्रणाली के पुख्ता होते जाने को लोकतंत्र का विकास मानने की गलती करते हैं। चुनाव प्रणाली से गड़बडिय़ों का खत्म होना एक वक्ती बात थी, मशीनें आईं, आयोग के हक बढ़े, और गड़बडिय़ां घट गईं। लेकिन ये गड़बडिय़ां भी सिर्फ प्रक्रिया में घटी हैं, असल चुनाव तो भ्रष्ट पैसों से, धर्म और जाति के भड़कावे से ही जीता जाता है। इसलिए भारत में लोकतंत्र के विकसित होने का धोखा या झांसा जिनको होता है, उनको अपने आपको दलितों और वंचितों, आदिवासियों और महिलाओं की जगह रखकर देखना चाहिए कि लोकतंत्र है कहां? लोकतंत्र शहरी सड़कों और पुलों का नाम नहीं हो सकता, लोकतंत्र एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें लोग अपनी जिम्मेदारी का एहसास करते हैं, और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करते हैं। आज इस लोकतंत्र में लोग यह तय करने लगे हैं कि दूसरे लोग क्या खाएं, क्या नहीं? यह भी तय करने लगे हैं कि उनका पसंदीदा कौन सा नारा न लगाने वाले लोग मुल्क के लिए गद्दार हैं, और उन्हें पाकिस्तान भेज देना चाहिए।
लोकतंत्र बहुमत से चुने गए बुरे लोगों की संसद और विधानसभा को नहीं कहा जा सकता, जहां तक पहुंचने के लिए लोकतंत्र की आत्मा को कुचलते हुए ही पहुंचना एक आम बात है। भारत में आज कदम-कदम पर कमजोर तबकों के साथ जिस परले दर्जे की बेइंसाफी दिखती है, उससे लगता है कि यहां का लोकतंत्र कमजोर ही होते चल रहा है, और मजे की बात यह है कि न इसकी चर्चा होती है, और न ही अधिकतर लोगों को इसका कोई एहसास ही है।
*-सुनील कुमार*

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