रोजगार देने में छत्तीसगढ़ फिसड्डी

रोजगार देने में छत्तीसगढ़ फिसड्डी
रायपुर. रोजगार देने के मामले में छत्तीसगढ़ के शहर देश के दूसरे शहरों से काफी पीछे हैं। देश के क्लास-2 शहरों में शामिल किए गए रायपुर और बिलासपुर जैसे शहरों में प्रति हजार व्यक्तियों पर महज 193 के पास ही अपना कोई रोजगार है। वहीं, प्रति हजार पर 309 कर्मचारी ही नियमित वेतनभोगी की श्रेणी में आते हैं।
सबसे चिंताजनक तथ्य है कि प्रदेश के इन शहरों में प्रति हजार पर 31 व्यक्तियों के पास किसी तरह का कोई काम ही नहीं है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा हाल में जारी की रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है। जुलाई-2011 से जून-2012 के बीच लिए गए सर्वे की सामान्य गतिविधि के स्टेटस में स्वरोजगार देने वाले शहरों को देखें तो छत्तीसगढ़ की हालत बेहद खस्ता है, और उसे नगालैंड जैसे राज्यों के साथ सबसे बेहद खराब स्थिति में रखा गया है।
साथी राज्यों से काफी पिछड़ा
रोजगार के मामले में छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड जैसे साथी राज्यों से काफी पिछड़ गया है। उत्तराखंड और झारखंड के बड़े शहरों को क्लास-2 में शामिल किया गया है। उत्तराखंड के शहरों में प्रति हजार व्यक्तियों पर 372 और झारखंड के शहरों में 320 के पास स्वरोजगार है। यह छत्तीसगढ़ के मुकाबले कहीं बेहतर हैं। रोजगार सूचकों पर तीनों राज्यों में उत्तराखंड के बड़े शहर बेहतर हैं, जहां प्रति हजार पर 321 कर्मचारी नियमित वेतनभोगी हैं। उत्तराखंड के इन शहरों में प्रति हजार पर महज 7 लोग ही बेकार होते हैं।
नगालैंड में सबसे अधिक बेकारी
सर्वे की सामान्य गतिविधि स्टेटस में बेकारी के पैमाने पर नगालैंड सबसे नीचे है। नगालैंड के बड़े शहरों को भी क्लास-2 में रखा गया है, जहां प्रति हजार व्यक्तियों पर 169 के पास किसी तरह का कोई काम नहीं है, जबकि प्रति हजार पर 843 के पास अपना कोई ध्ंाधा भी नहीं है। वहीं, त्रिपुरा में प्रति हजार व्यक्तियों पर 100 और मणिपुर में 70 पूरी तरह से बेकार होते हैं।
कोई स्वरोजगार, कोई नियमित रोजगार में आगे : सर्वे के अनुसार असम के बड़े शहरों में प्रति हजार में 405 और बिहार के बड़े शहरों में 400 के पास स्वरोजगार है। वहीं नियमित वेतनभोगी की श्रेणी में हिमाचल प्रदेश के बड़े शहरों में प्रति हजार पर 478 कर्मचारी हैं। इसी श्रेणी में दिल्ली में प्रति हजार पर 402 नियमित कर्मचारी हैं।
बेकारी जांचने का 68वां राउंड
केंद्र द्वारा देश में बेरोजगारी की स्थिति भांपने के लिए कराए गए सर्वे का यह 68वां राउंड था। यह सर्वे देश के एक लाख से ज्यादा परिवारों के बीच किया गया था। यह परिवार 7,469 गांवों और 5,268 शहरी ब्लॉक में निवास कर रहे हैं। सर्वे में 4 लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए।
सिर्फ सुर्खियों में मेक इन इंडिया
न्यूयॉर्क ा.� प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली राजग सरकार का मंगलवार को एक वर्ष पूरा हो गया। इस मौके पर अमरीकी मीडिया ने मोदी सरकार की उपलब्धियों पर आलोचनात्मक रुख जाहिर किया है। उन्होंने लिखा कि मोदी का महत्वाकांक्षी� ‘मेक इन इंडियाÓ अभियान अब तक ज्यादातर सुर्खियों में ही रहा है और भारी अपेक्षाओं के बीच रोजगार में वृद्धि धीमी बनी हुई है।
औद्योगिकीकरण पर्याप्त नहीं
राज्य में औद्योगिकीकरण पर्याप्त नहीं हुआ है।� यहां ज्यादा रोजगार वन और कृषि क्षेत्र में हैं। लेकिन शहरों में आजीविका पर आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने से निकट भविष्य में शहरी बेरोजगारी की समस्या में सुधार लाया जा सकता है।
प्रेम प्रकाश पांडेय, मंत्री जनशक्ति नियोजन
-शिरीष खरे

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