छत्तीसगढ़ में मूल निवासियों और दलित समुदायों को जबरन बेदखल करने का ख़तरा।

छत्तीसगढ़ में मूल निवासियों और दलित समुदायों को जबरन बेदखल करने का ख़तरा।

ऐमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
बैंगलोर/नई दिल्ली
4 सितंबर 2004
भारत : छत्तीसगढ़ में मूल निवासियों और दलित समुदायों को जबरन बेदखल करने का ख़तरा।
ऐमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया टुडे ने कहा, छत्तीसगढ़ में राज्य के स्वामित्व वाली कोयले की खान के पास रहने वाले अधिकारहीन समुदाय के हज़ारों लोगों पर जबरन बेदखल करने का खतरा मंडरा रहा है।
28 अगस्त 2014 को अधिकारियों ने कोर्बा छत्तीसगढ़ के पूर्णी गांव में घर गिराने का काम शुरू किया। ये प्रक्रिया दुनिया की सबसे बड़ी कोयला खनन कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) की सहायक कंपनी साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) द्वारा गेवड़ा की खदान के विस्तार के लिए किए जा रहे प्रयासों का हिस्सा है। 28 अगस्त को दो घर गिरा दिए गए, और आगे और लोगों को बेदखल किए जाने की संभावना है।
अधिकारियों ने एसईसीएल को कोर्बा स्थित उसकी कोयले की खान में उत्पादन 35 एमटीपीए (मेट्रिक टन प्रति वर्ष) से 40 एमटीपीए बढ़ाने तक के लिए स्वीकृति दे दी है, जिससे कोर्बा के 18 से अधिक गांवों में 5000 से अधिक लोगों को उनके घरों व ज़मीनों से बेदखल किया जा सकता है। जो लोग बेदखल किए जा सकते हैं उनमें कंवर, गोंड, कोर्वा आदिवासी (मूल लोग) और दलित परिवार शामिल हैं।
ऐमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया की व्यापार एवं मानव अधिकार शोधकर्ता अरुणा चंद्रशेखर ने कहा, “28 अगस्त को जो लोगों को बेदखल किया गया है, वो ईमानदार परामर्श, पर्याप्त नोटिस या मुआवज़े, या पर्याप्त वैकल्पिक आवास की व्यवस्था के बिना किया गया है। उन्होंने ज़बरन लोगों को बेदखल किया जो कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत निषिद्ध है।”
चश्मदीद गवाहों ने ऐमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया को बताया कि एसईसीएल के सुरक्षा कर्मियों और अर्धसैनिक कर्मियों ने 28 अगस्त को लोगों को सामान निकालने का पर्याप्त समय दिए बिना ही उनके घरों से ज़बरन बेदखल कर दिया। राज्य और एसईसीएल के अधिकारी, पुलिस समेत मौके पर मौजूद थे।
एक 27 वर्षीय महिला बबीता अबिने, जिसका घर गिरा दिया गया, ने कहा, “हम अपने रिश्तेदारों के साथ तीज (एक स्थानीय त्यौहार) मना रहे थे। जब मैं बाहर निकली मैंने देखा कि बहुत सारे पुलिसवालों ने मेरा घर घेर लिया है। मुझे एक दिन का नोटिस भी नहीं दिया गया। जब मैंने विरोध किया और बेदखल करने का नोटिस दिखाने के लिए कहा तो पुलिस ने मुझे घसीटकर एक तरफ कर दिया। घर के अंदर रखी हमारी कुछ चीज़ें नष्ट हो गई।”
उनके पड़ोस में रहने वाला राम प्रसाद, जिसका घर भी गिरा दिया गया, ने कहा, “जब बबीता को पीटा जा रहा था और पुलिस उसके घर में घुस रही थी, तब हम डर गए। हम अपना जो भी सामान उठा सकते थे, हमने उठाया और अपने घर से बाहर भागे।”दूसरे गांववालों ने भी कहा कि उन्हें बेदखली का कोई नोटिस नहीं मिला। स्थानीय सरकारी अधिकारियों ने ऐमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया को बताया कि उन्हें नहीं मालूम कि बेदखली से संबंधित कोई ख़ास नोटिस भेजा गया था या नहीं।
भारत की सबसे बड़ी खुली खुदाई वाली कोयला खानों में से एक गेवड़ा खान का विस्तार, आगे हज़ारों परिवारों को प्रभावित करेगा, जो पहले से ही वायु प्रदूषण, अपने जल संसाधनों की कमी और सार्वजनिक ज़मीन की क्षति से प्रभावित हैं। भारत के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कोर्बा को देश के सबसे गंभीर प्रदूषित क्षेत्रों में स्थान दिया हुआ है।
कोर्बा ज़िले को भारतीय संविधान के अंतर्गत ‘अनुसूचित क्षेत्र’के रूप में संरक्षित किया गया है, जहां आदिवासी समुदाय रहते हैं। पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विस्तार) अधिनियम के अंतर्गत, इन क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के पास विकास परियोजनाओं हेतु जमीन के अधिग्रहण या लोगों के पुनर्वास से पहले परामर्श करने का अधिकार प्राप्त है। राज्य के अधिकारियों ने इस तरह का परामर्श नहीं किया।
अधिकारी यह सुनिश्चित करने में भी असफल रहे कि खान के विस्तार के लिए निकासी से पहले सार्वजनिक ज़मीन पर स्थानीय समुदायों के वैध दावे स्वीकृत किए गए थे या गैर वन उद्देश्यों के लिए वन का इस्तेमाल करने से पहले समुदायों की सहमति मांगी गई या नहीं, जैसा कि भारतीय वन अधिकार अधिनियम के लिए आवश्यक है।
एक स्थानीय पर्यावरणीय कार्यकर्ता लक्ष्मी चौहान ने ऐमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया को बताया “कोर्बा के एक संरक्षित क्षेत्र होने के बावजूद, समुदायों के अधिकारों का सम्मान किए बिना ही उन्हें बेदखल किया जा रहा है। कानून का पालन करने की बजाय एसईसीएल ये दावा कर रहा है कि पेसा ऐक्ट उन पर लागू नहीं होता।”
अरुणा चंद्रशेखन ने कहा, “छत्तीसगढ़ सरकार को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन्हें जबरन बेदखल किया गया है, उन्हें प्रभावी उपचार मिले और उनकी हानिपूर्ति हो। सरकार को ज़बरदस्ती बेदखली करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कारवाई करनी चाहिए। जब तक कि समुदायों के परामर्श के अधिकार और मुफ्त, पूर्व व सूचित सहमति का सम्मान न किया जाए, तब तक और बेदखली नहीं होनी चाहिए।”
पृष्ठभूमि
भारतीय पर्यावरणीय कानून के अंतर्गत, कुछ विकास परियोजनाओं के लिए उनकी पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया के हिस्से के रूप में, जन सुनवाई आयोजित करने की आवश्यकता होती है जिसमें अधिकारी स्थानीय लोगों के साथ परामर्श कर उनकी चिंताओं को दूर करते हैं। जन सुनवाई उन रास्तों में से हैं जो इन समुदायों की किसी परियोजना के उनके जीवन और आजीविका पर पड़ने वाले प्रभावों से संबंधित चिंताओं को ज़ाहिर करने के लिए उपलब्ध हैं।
भारत के पर्यावरण व वन मंत्रालय ने जनवरी 2014 में गेवड़ा खान के विस्तार के लिए मंज़ूरी दी थी। अधिकारियों ने परियोजना को इस विस्तार के प्रभावों के बारे में समुदायों को जानकारी देने और उनसे परामर्श करने के लिए पर्यावरणीय जन सुनवाई करने से मुक्त कर दिया। मंत्रालय ने हाल ही में नीति ज्ञापनों की एक श्रृंखला भेजी है जिसमें कोयला खनन परियोजनाओं को जन सुनवाई से मुक्त करने की बात कही है। इनमें से सबसे हाल में 2 सितंबर 2014 को भेजा गया ज्ञापन है जो कि कोयला खानों को बिना जन सुनवाई किये कोयले के 20 एमटीपीए उत्पाद में 6 एमटीपीए का और विस्तार करने की स्वीकृति दी है।
अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार कानूनों के अंतर्गत, भारतीय सरकार का यह कर्तव्य है कि वह व्यक्ति के उस अधिकार का सम्मान और उसकी सुरक्षा करे जिसके तहत वह उस निर्णय में हिस्सा ले सकता है जिससे वह प्रभावित होगा। पर्यावरणीय नीतियों मे वह परिवर्तन जो परामर्शीय प्रक्रियाओं को कमज़ोर करते हैं, वे इन परियोजनाओं से प्रभावित समुदायों के अधिकारों को दुर्बल कर सकते हैं।
हमारे बारे में:
ऐमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ऐमनेस्टी इंटरनेशनल वैश्विक मानव अधिकार आंदोलन का एक हिस्सा है। हम किसी भी सरकार, राजनैतिक विचारधारा, आर्थिक लाभ या धर्म से मुक्त हैं और हमें मुख्य रूप से व्यक्तिगत समर्थकों द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त होती है। ऐमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया का मानव अधिकार शिक्षा कार्यक्रम भारत के स्कूलों के साथ काम करता है। इसका उद्देश्य मानव अधिकारों का स्कूलों के पाठ्यक्रम, संबंधों, पर्यावरण और शासन में एकीकरण करना है। हमारा स्वप्न है कि भारत में प्रत्येक व्यक्ति उन सभी अधिकारों का आनंद ले, जो मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा, अन्य अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार मानकों और भारतीय संविधान में में प्रतिष्ठापित किए गए हैं।

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