आमार बाडी तोमर बाडी बस्तर बन गया नक्सलबाड़ी!

आमार बाडी तोमर बाडी
बस्तर बन गया नक्सलबाड़ी!

राजकुमार सोनी@CatchHindi |
21 September 2016, 7:29 IST

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी इलाके के एक गांव नक्सलबाड़ी-बेरुबाड़ी में 1967 के आसपास शुरू हुए आंदोलन के दौरान अमूमन हर नौजवान की जुबां पर एक स्लोगन होता था- आमार बाड़ी- तोमार बाड़ी, नक्सलबाड़ी..

. नक्सलबाड़ी. यानी हमारा आपका सबका नक्सलबाड़ी.
चारू मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल सान्थाल की अगुवाई में चले इस सशस्त्र आंदोलन को अब भले ही इतिहास और शोध का विषय मान लिया गया है, लेकिन एक तल्ख सच्चाई यह है कि इस ‘आंदोलन’ ने कई तरह के उबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरकर छत्तीसगढ़ के बस्तर में अपनी एक जमीन तैयार कर ली है. यह जमीन उर्वरा रहने वाली है या इसके बंजर होने के आसार है, इस पर बहस जारी है.

उड़ गए जुगनू बनकर

अध्ययन और शोध के सिलसिले में बस्तर में नक्सलियों के बीच काम कर चुके एक सूत्र का दावा है कि वर्ष 1984 के आसपास जब आंध्र में हिंसक गतिविधियां चरम पर थीं, तब पहली बार नक्सलियों ने सुकमा और बीजापुर को अपना आधार क्षेत्र बनाया था. यह वह समय था जब आदिवासियों को चिरौंजी के बदले नमक दिया जाता था. नक्सलियों ने सबसे पहले उन वन अफसरों को मौत के घाट उतारा जो जंगल से जलाऊ लकड़ी ले जाने वाली आदिवासी महिलाओं से आए दिन दुष्कर्म किया करते थे. आदिवादियों के पास अपनी ताकत तो थीं, लेकिन जब उन्हें इसका एहसास संविधान की बजाय नक्सलियों ने करवाया तो उन्होंने नक्सलियों को सिर आंखों पर बिठा लिया.

नब्बे के दशक में जब बस्तर को देश-दुनिया में पहचान मिल रही थी तब एक बात प्रचलित थीं- पुलिस ने गांव में छापा मारा और पूछा कि नक्सली कहां रहते हैं तो मंगलू ने जवाब दिया- जिन्हें पलकों में छिपाकर रखते हैं उन्हें हम नक्सली नहीं मानते. यही जवाब सोमारू का था और पांडू का भी.

जब सबसे यही उत्तर मिला तो पुलिस ने हवा में गोलियां दागी और सरकार को प्रतिवेदन में लिखा, ‘अंधेरे का लाभ उठाकर नक्सली जंगल की ओर भाग गए. शायद जुगनू बनकर उड़ गए.’

भारी पड़ गया अबूझमाड़ को संरक्षित घोषित करना

आमचो बस्तर के लेखक राजीव रंजन प्रसाद इस बात से असहमत है कि नक्सली बस्तर में अपने वैचारिक आंदोलन के विस्तार के लिए आए थे. वे कहते हैं, ‘नक्सली नेता कोण्डापल्ली सीता रमैय्या को जब पीपुल्सवॉर ग्रुप के बैनर तले आंध्र के मुलगु के जंगलों में पैर जमाने में सफलता नहीं मिली, तब उन्होंने जटिल भूगोल की वजह से माड़ और दक्षिण बस्तर का चयन किया था. बस्तर के अबूझमाड़ इलाके को संरक्षित क्षेत्र घोषित कर सरकार ने आंख मूंद ली तो नक्सलियों को बस्तर में पैर जमाने का मौका मिल गया.’

कश्मीर और उत्तर-पूर्व के कई संवेदनशील इलाकों में काम कर चुके बीएसएफ के पूर्व महानिदेशक ईएन राममोहन बस्तर के नक्सलियों की जड़ मजबूत होने के पीछे राज्यपाल की भूमिका को जिम्मेदार मानते हैं. वे कहते हैं, ‘संविधान की पांचवी अनुसूची में यह साफ उल्लिखित है कि आदिवासी इलाकों में राज्यपाल एक एडवायजरी कमेटी का गठन कर पंचायतों के जरिए विकास की दिशा तय करेंगे, लेकिन छत्तीसगढ़ के अमूमन हर राज्यपाल ने अपनी कुर्सी को बचाने में जोर लगाया और इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि आदिवासियों की जरूरतें क्या हैं और किस तरह से उनका विकास किया जा सकता है?’

हल्ला बोल से सलवा जुडूम तक

बस्तर में नक्सलियों के आधार इलाके को मजबूत करने के लिए हल्ला बोल और सलवा जुडूम जैसे अभियान को भी जिम्मेदार माना जाता है. सर्व आदिवासी समाज के सचिव बीएस रावटे बताते हैं, ‘जब हल्ला बोल अभियान चला तब गांव-गांव में पुलिस नाट्य प्रस्तुतियां देती थी, मगर जल्द ही आदिवासियों को यह समझ में आ गया कि उनके नाटक के पीछे की असली कहानी क्या है? उद्योगों को जमीन देने के लिए चलाए गए सलवा-जुडूम अभियान की वजह से बस्तर के छह सौ से ज्यादा गांव खाली हुए तो एक लाख लोग पलायन कर गए. पचास हजार आदिवासी राहत शिविरों में रहने को मजबूर हुए वहीं तीन लाख से ज्यादा आदिवासियों ने जंगल में रहना मंजूर किया. जिन आदिवासियों ने पुलिस का कहना नहीं माना, वे नक्सली ठहरा दिए गए. देखा जाय तो बस्तर में अब हर दूसरा आदिवासी या तो नक्सली समर्थक माना जाता है या फिर नक्सली है.’

पीयूसीएल की प्रदेश ईकाई के अध्यक्ष लाखन सिंह नक्सलवाद के पनपने के पीछे सरकार की जनविरोधी नीतियों को जिम्मेदार ठहराते हैं. वे कहते हैं, ‘सरकार ने नक्सलियों के समर्पण के लिए तो कई तरह के आकर्षक पैकेज घोषित कर रखे हैं, लेकिन आदिवासी अपनी समग्र संस्कृति के साथ विकास कैसे कर सकते हैं इस पर ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी गई. लोगों को दी जाने वाली बुनियादी सुविधाओं का आलम यह है कि बस्तर के सबसे बड़े शहर जगदलपुर मेडिकल अस्पताल के लिए ही डाक्टर नहीं मिल रहे हैं, तब नक्सली इलाकों में विशेष पैकेज का फार्मूला कितना कारगर है यह आसानी से समझा जा सकता है.’

नक्सलियों का भय!

बस्तर में नक्सलियों के भय को लेकर कई किस्से सुनने को मिलते हैं. मजे की बात यह है कि इन किस्सों का प्रचार पुलिस की तरफ से होता रहा है. कहा जाता है कि नक्सली तेंदूपत्ता व्यापारियों से वसूली करते हैं. सरकारी अधिकारियों से उगाही करते हैं. जनअदालत में फैसला सुनाते है.

सरकार की मानें तो नक्सली तीन दशक से केवल ‘भय’ का ही कारोबार कर रहे हैं. प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (नक्सल ऑपरेशन) डीएम अवस्थी कहते हैं, ‘ग्रामीणों के मन से नक्सलियों का भय दूर तो हुआ है, लेकिन अभी भी पुलिसिंग को और विश्वसनीय बनाने की जरूरत है. जिस रोज ग्रामीणों के मन में पुलिस की विश्वसनीयता कायम हो जाएगी, उस रोज प्रदेश से नक्सलवाद खत्म हो जाएगा.’

जगदलपुर लीगल एड की अधिवक्ता शालिनी गेरा की राय में नक्सलवाद एक राजनीतिक समस्या है, लेकिन सरकार इसका समाधान बातचीत के बजाय लोगों को युद्ध में झोंककर करना चाहती है. शालिनी मानती है कि जब तक नक्सलियों से बातचीत नहीं होगी तब तक शायद बस्तर के हर गांव में हम नक्सलबाड़ी देखते रहेंगे.

    फैक्ट फाइल

कुल जिले: 27
माओवाद से प्रभावित जिले: 16
कॉडर बेस माओवादियों की संख्या: 1000
महिला माओवादी: 500जन मिलिशिया: 8000
सशस्त्र पुलिस बल की 44 बटालियन के 60,000 जवान तैनात2001 से 15 सितम्बर 2016 तक माओवादी हिंसा के दर्ज मामलेहत्या: 1578हत्या का प्रयास: 3149लूट: 682मुठभेड़: 2614विस्फोट: 864मारे गए विशेष पुलिसकर्मी/ सुरक्षाकर्मी/ गोपनीय सैनिक: 1094मृत आम नागरिक (सरकारी कर्मचारियों सहित): 1615मारे गए माओवादी: 733

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