पर्यावरण और वन कानून को रौंदकर हो रहा कनहर बांध का निर्माण

पर्यावरण और वन कानून को रौंदकर हो रहा कनहर बांध का निर्माण

हर बांध का निर्माण रुका, 400 अज्ञात लोगों पर मुकदमा दर्ज
आवेश तिवारी/रायपुर। उत्तर प्रदेश ने छत्तीसगढ़ सीमा पर स्थित दुद्धी में बनाए जा रहे कनहर बांध के निर्माण के लिए बिना छत्तीसगढ़ को विश्वास में लिए 35 साल पुराने अनापत्ति प्रमाण पत्र के आधार पर निर्माण जारी रखा, जबकि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने नवीनतम अनापत्ति प्रमाण पत्रों के बिना बांध का निर्माण तत्काल रोकने को कह रखा था। सिर्फ इतना ही नहीं, ज्ञात डूब क्षेत्रों की जानकारी के बावजूद छत्तीसगढ़ में सरकारी मशीनरियों ने उन इलाकों में विकास कार्यों में करोड़ों रुपए खर्च कर दिए, जो इलाके कनहर के डूब क्षेत्र में आते हैं। नईदुनिया के पास मौजूद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के कुछ दिनों पूर्व जारी किए गए आदेश में उत्तर प्रदेश सरकार को स्पष्ट तौर पर कहा गया था कि बिना पर्यावरणीय और वन कानून का पालन किए बांध के निर्माण की इजाजत नहीं दी जा सकती। गौरतलब है कि 2008 में पर्यावरण मंत्रालय ने एक सर्कुलर जारी करके सभी राज्यों को कहा था कि 2006 के पर्यावरणीय कानून और मौजूदा वन कानून के अंतर्गत अनापत्ति प्रमाणपत्र हासिल किए कोई भी निर्माण नहीं किया किया जा सकता है। दिलचस्प यह है कि उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार इस बांध के निर्माण के लिए अप्रैल, 1980 में लिए गए अनापत्ति प्रमाण पत्र का हवाला दे रही है, जबकि विगत 35 सालों में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा पर बसे इस इलाके में लगभग 20 हजार मेगावाट के पावर प्लांट अस्तित्व में आ गए हैं। काबिलेगौर यह भी है कि मध्य प्रदेश के विभाजन के बाद बने नए छत्तीसगढ़ में सामाजिक पर्यावरणीय परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। आज से 38 वर्ष पूर्व जब कनहर निर्माण का खाका खींचा गया था, उस वक्त का जंगल आज के छत्तीसगढ़ का बलरामपुर जिला है। उक्त इलाके में आबादी भी बढ़ी है, विकास भी हुआ है।
इस बीच छत्तीसगढ़ के जल संसाधन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने एक बार पुनः कहा है कि हमने उत्तर प्रदेश सरकार को विगत 17 अप्रैल को पत्र लिखकर उनसे बांध के निर्माण से सम्बंधित सम्पूर्ण जानकारी मांगी है। हमने उन्हें कह दिया है कि बांध से जुड़ा कोई भी निर्माण छत्तीसगढ़ की ओर नहीं होना चाहिए ।बृजमोहन ने कहा कि हम सभी परिस्थितियों का अध्ययन विशेषज्ञों की टीम के माध्यम से कराएंगे, हमारे लिए छत्तीसगढ़ के जन, वन और पर्यावरण तीनों का महत्त्व है। दरअसल कनहर प्रोजेक्ट से 4131.5 हेक्टेयर भूमि के जलविलीन होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। दुखद यह है कि इनमें से जो भूमि छत्तीसगढ़ के हिस्से में आ रही है, उसमे यूपी की अपेक्षा ज्यादातर भूमि वन और रिहायशी क्षेत्र में स्थित है। इस बांध के निर्माण से कुल 2500 हेक्टेयर भूमि सघन वन क्षेत्र में है। इस बांध के निर्माण के दौरान तकरीबन 9 लाख पेड़ काटे जाएंगे।
छत्तीसगढ़ के लिए कनहर को लेकर चिंता करने का सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि बांध का अपस्ट्रीम छत्तीसगढ़ की ओर होगा यानी बलरामपुर से लेकर जशपुर तक जहां से कनहर नदी निकलती है, वर्षाकालीन समय में बाढ़ की सी स्थिति पैदा हो सकती है। दूसरा और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बाढ़ के नियंत्रण के लिए भी छत्तीसगढ़ को पूरी तरह से उत्तर प्रदेश सरकार पर निर्भर रहना होगा। यूपी जब चाहेगा बांध का फाटक अपनी जरूरतों के हिसाब से खोलेगा, जब चाहेगा बंद कर देगा।
प्रस्तावित कनहर बांध का कुल कैचमेंट एरिया 5000 वर्ग किमी है। इस क्षेत्र में सैकड़ों स्कूल कच्चे पक्के, हजारों मकान और बेहद उपजाऊ जमीन जल समाधि की स्थिति में हैं। बरसात के बाद सरगुजा से लेकर झारखंड के गढ़वा तक कनहर अक्सर सूख जाती है। इसकी एक बड़ी वजह नदी क्षेत्र में हो रहा बालू का अवैध खनन भी है। काबिलेगौर है कि उत्तर प्रदेश सरकार अब तक कनहर पर बालू के पट्टे देती रही है। त्रिशूली के शिवव्रत कहते हैं कि बालू के बड़े-बड़े ट्रक तो कनहर को लूट ही रहे थे। बांध पूरी नदी ले जाएगा। इस समय उत्तर प्रदेश जबरदस्त बिजली संकट से जूझ रहा है। रिहंद बांध पर अति निर्भरता से संकट बाधा है। ऐसे में उत्तर प्रदेश बिजली क्षमता में वृद्धि हेतु कनहर को ही एकमात्र विकल्प समझ रहा है। कनहर का पानी निजी क्षेत्रों के कारखानों के अलावा बिजलीघरों और रिहंद बांध को भी दिया जाना है। छत्तीसगढ़ में झारा के एक युवा शिवेंद्र कहते हैं कि विस्थापन का कोई विकल्प नहीं है और न ही इसकी क्षतिपूर्ति संभव है। योजनाकारों को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए कि हम गांव के बदले गांव, जंगल के बदले जंगल, स्कूल के बदले स्कूल मांग रहे हैं। अगर यूपी सरकार बदले में हमें वैसे ही गांव विकसित करके दे दें, हम जमीन छोड़कर चले जाएं

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