न्यायपालिका ,सरकार और कार्पोरेट के गठजोड़ ने हराया जुग्गा देवी और ग्रामसभा को 










छत्तीसगढ़ के सरगुजा में सूरजपुर जिले के प्रेमनगर क्षेत्र  सारे  गॉव   में पावर प्रोजेक्ट के खिलाफ प्रारम्भ से ही आन्दोलनरत थे , पूरा जिला पांचवी अनु सूचि के तहत पेसा  कानून  के अंतर्गत आता है ,जिसमे ग्रामसभाओं को विशेष अधिकार  हैं ,

सभी  ग्रामसभाएं जमींन  जाने और पानी की तंगी के कारण विरोध कर रहे थे ,बड़े बड़े विरोध प्रदर्शन हुए ,बीड़ी शर्मा तक कई बार आये उन्होंने सभाए ली ,कांटारोली  ग्राम आंदोलन के केंद्र में था ,पहले तो जैसे की सब जगह होता ही है ,आंदोलन को कुचलने के लिए कार्यकर्ताओ  को प्रताड़ित किया गया ,झूट मुक़दमे लादे गए और अंत में एक   प्रमुख कार्यकर्त्ता को खरीद भी लिया गए ,जो बाद में वह से वहला भी गया ,खैर ये तो होना ही था ,


छत्तीसगढ़ शाशन ने एक घटिया तरीका निकाला  , वो ये की प्रेमनगर ग्रामसभा को नगर पंचायत बनाने की घोषणा  कर दी , प्लान ये थे की इससे ग्रामसभा की स्वीकृति से पीछा छूट  जायेगा , जब की अनुसूचित क्षेत्र में प्रशाशन के ढांचे के मूल में परिवर्तन किया ही नहीं जा सकता था ,खैर , गॉव में  तो किसी को पता ही नहीं चला की कब ये कारनामा कर दिया सरकार ने.

 जुग्गा देवी और ग्राम के लोगो को जब पता चला तो इन लोगो  ग्रामभा बुला के इसका विरोध किया  ,और प्रस्ताव पास किया ,सब लोग कई बार कलेक्टर ,कमिश्नर के पास गए ,किसी ने कोई सुनवाई नहीं की ,और न ही नगर पंचायत के बारे में कोई आदेश ये अधि सूचना की जानकारी दी ,आखरी में  करी लोगो ने आरटीआई  के तहत जानकारी मांगी ,तो उन्हें 2009  में जारी प्राम्भिक अधि सूचना की प्रति दी  गई , ग्राम के लोग इसी अधिसूचना के विरोध में उच्च न्यायलय बिलासपुर गए ,   उन्होंने कहा की पांचवी अनुसूची में पेसा कानून    के तहत बिना ग्रामसभा के अनोमोदन के आप नगर पंचायत बना ही नहीं सकते , 


पीयूसीएल के महासचिव और एडवोकेट सुधा भरद्वाज ने इनकी पैरवी की , अभी एक सप्ताह पहले इस केस को ख़ारिज कर दिए गया ,मेरी उनसे [ रायगढ़ जाते समय ] चर्चा हुई तो पता  चला की  प्रकरण शुद्द तकनिकी आधार पे ख़ारिज कर दिया गया , कोर्ट ने माना  की  ग्रामवासियो ने प्राम्भिक  अधिसूचना को चेलेंज किया है न की दूसरी अधिसूचना को , विडम्बना ये है की दुसरी  सूचना कब जारी हुई ,किसी को मालूम ही नहीं था , 2009  में पहली सूचना जारी हुई और 2010  में दूसरी सूचना जारी हुई ,इसकी जानकारी तो प्रशाशन  को भी नहीं थी, नहीं तो जब  आरटीआई  में अधिसूचना की मांग की थी  तो कलेक्टर   ने एक ही सूचना ही क्यों दी ,
न्यायलय ने तो कमाल  का काम किया, क्योकि न्यायधीश ने ही सरकार के जबाब के आधार पे दूसरी सूचना के की वजह से ग्रामवासियो को  एचिका में संसोधित करने को अनुमति दी ,बाद में ठीक इसी कारन याचिका ख़ारिज का र्डि की आपने दूसरी याचिका को चुनौती क्यों नहीं दी ,कोर्ट ने ये भी कहा की 6 -7  साल का समय गुजर गया है ,काफी स्थापना का खर्च हो गया है ,तो इस को यदि दुबारा ग्रामपंचायत    बना दते है तो बहुत  जाएगी ,कमाल   है ,की लोग 6  साल से कोर्ट में खड़े है ,और न्यायलय कह रहा है की बहुत देर हो गई। 


पूरा प्रकरण लिखने का कारण  ये भी है की    हम एक बार फिर समझे की कोर्ट ,सरकार और कार्पोरेट का गठबंधन कैसे आदिवासियों के खिलाफ काम करता  है , पांचवी अनुसूची में आदिवासियों को दिए गए अधिकार कितनी आसानी से तकनिकी आदर पे कार्पोरेट के पक्ष  में खड़े दिखाई देते  हैं। 


 जुगनी  देवी से मेरी मुलाकात तीन साल पहले हुई थी ,वे कहरही थी की सारे कानून हमारे पक्ष  में है ,तो हम ही जीतेंगे ,वो अलग बात है की प्रेमनगर के पावर प्रोजेक्ट को असियो ने अपने यहाँ से भगा के ही दम      लिया ,लेकिन ये आफत दूसरे गॉव में चली गई ,वह लोग ऐसे ही विरोध का र्रहे हैं।  

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