भारतः पुलिस हिरासत में हत्याओं के दोषी कानूनी गिरफ्त से बाहर -ह्यूमन राईट वाच

( ह्यूमन राईट वाच की रिपोर्ट , कल विमोचन न्यूयार्क में हुआ , रिपोर्ट 122 पेज की है .
हिन्दी अनुवाद किया है राजेन्द्र सायल ने )

** प्रेस विज्ञप्ति
* दिसंबर 19, 2016

भारतः पुलिस हिरासत में हत्याओं के दोषी कानूनी गिरफ्त से बाहर

हवालात में मौत की रोकथाम के लिए कानून लागू करें
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(न्यूयॉर्क) – भारत में पुलिस गिरफ्तारी की प्रक्रिया को अक्सर नजरअंदाज करती है, और हिरासत में अभियुक्तों को यातना देकर मौत के घाट उतार देती है, ह्यूमन राइट्स वाच द्वारा आज जारी एक नई रिपोर्ट में यह बात सामने आई है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2010 से 2015 बीच भारत में पुलिस हिरासत में कम-से-कम 591 लोगों की मौत हुई है. अधिकारियों ने इसके लिए पुलिस को जिम्मेदार ठहराने के बजाए अधिकारों का सम्मान करने वाले पुलिस बल के निर्माण के लिए जरूरी सुधारों को रोकने का काम किया है.

“भाईचारे में बंधे: ‘‘पुलिस हिरासत में हत्याएं रोकने में भारत असफल’’
नामक 121 पृष्ठों की रिपोर्ट में गिरफ्तारी संबंधित नियमों की पुलिस द्वारा अवहेलना, यातना देकर हिरासत में मौत, और इनके लिए जिम्मेदार लोगों को बरी किए जाने जैसे मसलों को पड़ताल की गई है. 2009 से 2015 के बीच हिरासत में हुई मौतों में से 17 मौतों की गहराई से जांच की गई है. इस रिपोर्ट में पीड़ितों के परिजनों, गवाहों, न्याय विशेषज्ञों और पुलिस अफसरों के 70 से अधिक साक्षात्कार शामिल हैं. इन 17 मामलों में से किसी में भी पुलिस ने गिरफ्तारी संबंधित नियमों का सही पालन नहीं किया, जिससे संदिग्धों को दुर्व्यवहार का और भी अधिक शिकार होना पड़ा.

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नयी दिल्ली, भारत में पुलिस अधिकारी, जनवरी 2016  भारत में पुलिस पर अक्सर उत्पीड़न की जवाबदेही से अपने साथियों को बचाने का इल्जाम लगाया जाता है.
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ह्यूमन राइट्स वाच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली के अनुसारः
‘‘यातना देने के लिए जब तक अफसरों पर मुकदमा न चलाया जाए तब तक भारत में पुलिस यह नहीं सीखेगी कि संदिग्धों से मार-पीट कर अपराध कबूल करवाने का तरीका अस्वीकार्य है. हमारे शोध से यह पता चलता है कि जो पुलिस अफसर हिरासत में मौतों की जांच कर रहे होते हैं, वे अक्सर अपने सहकर्मियों को बचाने की फिराक रहते हैं न कि इन मौतों के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा दिलाने में.”

हालाँकि भारतीय पुलिस हिरासत में मौतों के लिए आम तौर से आत्महत्या, बीमारी या और कोई प्राकृतिक कारणों पर दोष मढ़ देती है लेकिन पीड़ित के परिजन अक्सर यह आरोप लगाते हैं कि मौत का कारण यातना या अन्य तरीके के दुर्व्यवहार हैं. भारतीय कानून में और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पुलिस कार्यों से संबंधित विभिन्न पहलुओं जैसे मुकदमा दर्ज करने, गिरफ्तार व्यक्तियों के साथ व्यवहार और पूछ-ताछ के के तौर-तरीकों से संबंधित प्रक्रियाओं का निर्धारण किया गया है. हालांकि उचित ट्रेनिंग और निगरानी और सबूत जमा करने के संसाधनों के अभाव के कारण थानों में अक्सर जानकारी लेने या अपराध कबूल करवाने के लिए पुलिस आपराधिक संदिग्धों के साथ दुर्व्यवहार करती है. यातना के तरीकों में जूतों और बेल्ट से बेरहमी से मार-पीट करना, कभी-कभी लोगों को लटका देना शामिल है. ह्यूमन राइट्स वाच द्वारा जांच की गई शव-परीक्षण रिपोर्ट्स में भोथरे औजार से बने चोटों और खून-जमने के निशान पाए गए हैं.

ह्यूमन राइट्स वाच ने प्राथमिक तौर पर ऐसे मामलों का विवरण दिया है जहाँ वकीलों या मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की मदद से परिजनों ने न्यायिक राहत की मांग की है, और जिन मामलों में पुलिस और मेडिकल रिकार्ड्स और अन्य प्रासंगिक दस्तावेज सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध थे. इनमें से अधिकांश मामले अभी भी न्यायालयों में लंबित हैं. जिन मामलों में न्यायालय द्वारा स्वतंत्र जांच के आदेश जारी किये गए, इनमें से कई मामलों में निर्धारित प्रक्रिया में गंभीर स्तर के उल्लंघन और शारीरिक दुर्व्यवहार के ठोस सबूत पाए गए हैं. उदाहरण के लिए, मुंबई में एक पुलिसकर्मी ने हिरासत में एक बंदी की मौत की जांच के दौरान बताया कि मार-पीट इसलिए करनी पड़ी क्योंकि अभियुक्त “एक दुर्दांत अपराधी था, और उसने जानकारी देने से इनकार कर दिया था.”

यातना देने के लिए जब तक अफसरों पर मुकदमा न चलाया जाए तब तक भारत में पुलिस यह नहीं सीखेगी कि संदिग्धों से मार-पीट कर अपराध कबूल करवाने का तरीका अस्वीकार्य है.

पुलिस ने उन नियमों का अनुपालन नहीं किया जिसे 1997 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा डी.के. बासु बनाम पश्चिम बंगाल के मामले में हिरासत में दुर्व्यवहार की रोक-थाम के लिए बनाया गया था और ये नियम तभी से दंड प्रक्रिया संहिता में शामिल कर लिए गए हैं. किसी को भी हिरासत में लेते समय पुलिस को नियमानुसार अपनी पहचान बतानी होगी, मेमो बनाना होगा जिसमें गिरफ्तारी की तारीख और समय दर्शाना होगा, जिस पर एक स्वतंत्र गवाह के हस्तारक्षर के साथ-साथ गिरफ्तार व्यक्ति का प्रति-हस्ताक्षर होना जरूरी है और पुलिस को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि हिरासत में लिए जाने वाले व्यक्ति के निकट संबंधी को गिरफ्तारी की सूचना और हिरासत की जगह की जानकारी दे दी गई है.

हिरासत में लेने के बाद गिरफ्तार व्यक्तियों का नियमानुसार मेडिकल परीक्षण करवाना होगा, डॉक्टर को पहले से लगी चोटों का विवरण देना होगा – ताकि कोई भी नई चोट से यह पता लग सके कि पुलिस ने हिरासत में दुर्व्यवहार किया है या नहीं. कानून में यह प्रावधान है कि हर गिरफ्तार व्यक्ति को अगले 24 घंटों के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाए.

ह्यूमन राइट्स वाच का मानना है कि इस नियमावली की अवहेलना के कारण ही हिरासत में दुर्व्यवहार होते हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2015 में हिरासत में हुए 97 मौतों में से 67 मामलों में संदिग्धों को कानून के अनुसार पुलिस या तो 24 घंटों के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने में विफल रही या गिरफ्तारी के बाद 24 घंटों के भीतर ही संदिग्ध की मौत हो गई. तमिलनाडु के एक मजिस्ट्रेट ने ह्यूमन राइट्स वाच को बताया, “पुलिस की अपनी ही प्रक्रिया संहिता है. वे आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता का पालन नहीं करते हैं.’’

पुलिस दुर्व्यवहार के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए भारतीय कानून के तहत पुलिस हिरासत में हुई हरेक मौत की जांच एक न्यायिक दंडाधिकारी (ज्यूडिसियल मजिस्ट्रेट) से कराया जाना अनिवार्य है. पुलिस को एक प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करना होता है, और इस तरह की मौतों की जांच ऐसे पुलिस स्टेशन या एजेंसी द्वारा कराई जाती है जो इसमें संलिप्त न हो. हिरासत में मौत के हर मामले की रिपोर्ट राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी दी जाती है. आयोग के नियमानुसार हर एक शव-परीक्षण की वीडियोग्राफी करानी है और शव-परीक्षण की रिपोर्ट एक मॉडल प्रपत्र में तैयार करना होता है.

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