सलवा जुडूम : दो साल का मानदेय मिला और न आरक्षक की नौकरी
नई दुनिया
Fri, 24 Mar 2017
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नक्सलियों की तलाश में जंगल भी भटके और कुछ मुठभेड़ में भी हिस्सा लिया लेकिन आज फाके की जिंदगी जीने मजबूर हैं।

दंतेवाड़ा। नक्सलियों के खिलाफ जनजागरण आंदोलन में शामिल होने के बाद एसपीओ बनकर समाज सेवा में जुटे। नक्सलियों की तलाश में जंगल भी भटके और कुछ मुठभेड़ में भी हिस्सा लिया लेकिन आज फाके की जिंदगी जीने मजबूर हैं। सरकार ने फंड नहीं होने की बात कहते एसपीओ की सेवा से अलग किया। फिर सहायक आरक्षक की भर्ती में बुलाया पर मापदंड का डंडा चलाकर प्रक्रिया से बाहर कर दिया। अब दो साल मुफसिली की जिंदगी जी हैं। सरकार बंदूक की नौकरी न सही पर परिवार चलाने के लिए रोजी-रोटी का जुगाड़ कर दें।

यह बातें आज सर्किट हाउस में बीजापुर जिले से आधा एक दर्जन महिला-पुरुष ग्रामीणों ने मीडिया के समक्ष कहा। समाज सेवी और आप पार्टी की नेत्री सोनी सोरी तथा सुकुलधर नाग के साथ पहुंचे युवक-युवतियों ने मीडिया के सामने अपना दर्द बयां किया। युवक-युवतियों के माने वे नक्सलियों के खिलाफ में जन जागरण अभियान में हिस्सा लिया था।

इसके बाद उन्हें सलवा जुडूम कैंप और फिर दंतेवाड़ा के कारली कैंप में लाया गया। जहां प्रशिक्षण के बाद वर्ष 2005 में विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) के रुप में बीजापुर ले जाकर फोर्स के साथ सर्चिंग से लेकर आपरेशन और अन्य ड्यूटी ली गई। जब सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया तब भी वे अपने कर्तव्य पर थे। लेकिन मार्च 2016 में फंड नहीं होने की बात कहते अधिकारियों ने कार्य से अलग कर दिया।

इसके बाद वे जिला बल और एसटीपीएफ और हाल में सीआरपीएफ की भर्ती प्रक्रिया में शामिल हुए पर मापदंड में बाहर कर दिए गए। युवक-युवतियों का कहना है कि उन्हें 2014 से मार्च 2016 के बीच करीब दो साल का मानदेय भी अब तक नहीं मिला है। भर्ती और अन्य शिकायत लेकर जब थाने और दफ्तर जाते हैं तो बाहर ही रोक दिया जाता है। अधिकारियों से मिलने तक नहीं देते। निकाले गए एसपीओ का कहना है कि उनकी जगह अधिकारियों ने मिलीभगत करते अन्य लोगों को नौकरी दे दी है।

निर्मलक्का को भागने नहीं दिया

एसपीओ पद से हटाए जाने के बाद मजदूरी कर पति और बच्चों का पेट पाल रही बत्तमा नागु ने बताया कि वह बहादुर सिपाही थी। सीजर प्रवस के बाद भी जोखिम भरे कार्य किए और अब दोबारा नौकरी के लिए दर-दर भटक रही है। पेट पालने के लिए होटल में बर्तन मांजना मजबूरी हो गया है। बत्तमा नागु ने बताया कि सन् 2000 में हार्डकोर नक्सली निर्मलक्का, पदमक्का, चंद्रशेखर आदि को पूछताछ के लिए बीजापुर लाया गया।

वहां सर्किट हाउस में फोर्स के साथ उसकी ड्यूटी भी सुरक्षा में लगी थी। जब निर्मलक्का ने यूरिन के लिए बाथरूम की बजाए बाहर जाने की बात कही तो तत्कालीन एसपी रतनलाल डांगी ने उसके साथ बाहर भेजा। इस बीच निर्मलक्का बाड़ा को कूदकर भागने की कोशिश। तब मैंने झपट्टा मारकर उसे गिराया और पकड़ा था। बत्तमा के अनुसार नक्सलियों के टारगेट में रहने की वजह से अपने मूल गांव भी बरसों से नहीं जा रही हैं।

विस्फोट में मारे गए 11 साथी तथा नागा जवान

ग्रामीण युवाओं का दर्द है कि वे एसपीओ रहते सर्चिंग और आपरेशन में हिस्सा लेता रहा है। बीजापुर के इरनवाड़ा निवासी फिलिप एक्का ने बताया कि 2005-06 में वह मुसलनार कैंप में नागा बटालियन के साथ था। एक बार गश्ती में जाने के लिए 30 जवानों की टोली कैंप से निकली और बैरियर में पहुंचने पर आधे साथी आगे बढ़ गए। हम लोग वहीं रूके थे, तभी नक्सलियों ने आगे विस्फोट कर 11 नागा जवानों सहित एसपीओ को शहीद कर दिया। इसके बाद सर्पोटिंग पार्टी के साथ उसने भी इस मुठभेड़ में फोर्स का सहयोग किया था। फिलिप के अनुसार ट्रेनिंग में उसे हथियार चलाना भी बताया गया था। कुछ ऐसी ही बातें अन्य पीड़ित ग्रामीणों ने भी मीडिया को बताई।

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