मोदी ने  मन  की बात में झूट  ही झूट ही कहा , किसानो को भ्रमित करने के अलावा कुछ नहीं कहा। 


































मोदी  ने अपनी मन की बात में अपनी सफाई ही देते रहे , उन्होंने किसानो की एक बात भी  नहीं कही , उन्होंने जो कहा उसके झूट इस तरह समझिए ,


1 , मोदी ने कहा किं किसान अपना नुकसान करके भी देश का भला चाहता रहा  हैं ,वाह क्या बात हैं। 


2 , आपकी भूमि अधिग्रहण  पैदावार बढ़ाने के लिए होगा ,इससे आपको को नुकसान नहीं हो सकता। इससे आपका भला ही होगा। 


3 , जो उद्योग कॉरिडोर बनेगा उसमे किसी भी निजी उद्योग के लिए जमींन  नही लेगी ,सिर्फ सरकार कॉरिडोर बनाएगी ,इसका मतलब ये हुआ की सरकार इन कॉरिडोर में    उद्योग लगाएगी ,      इससे बड़ा झूट क्या हो सकता हैं ,जबकि सब जानते है की उद्योग कॉरिडोर में उद्योगपति ही कारखाने लगाएंगे ,किसी देश की सरकार   खुद उद्योग नहीं लगाती। उन्होंने कहा की इस कॉरिडोर के लिए  सहमति की क्या जरुरत हैं।

4 , वो बार कहते है की गॉव में जो जमींन  ली जाएगी वो गॉव की सड़क ,नहर ,अस्पताल और  मकान  के लिए होगा ,जब की किसी भी गॉव में सड़क ,नहर ,अस्पताल या मकान  के लिए कभी   किसानो ने मना  नहीं किया , और कभी भी किसी सरकार ने इस कामो के लिए जमींन  नहीं ली,यदि ली गई है तो थोड़ी बहुत जमींन । 
इसका कभी किसानो ने  मना  नहीं किया , वास्तिविक अधिग्रहण तो खदानों ,उद्योग ,कॉरिडोर ,रेल ,हाइवे  के लिए होता है ,ये ऐसे कह रहे है मानो  की सिर्फ   गॉव की भलाई ले किये सारा अधिग्रहण होगा, 


5 , एक और झूट की हमने किसानो के लिए कोर्ट जाने का    अधिकार नहीं छीना  है ,जब की अद्यदेश में है की पहले किसानो को जिला स्तर में  कलेक्टर   की समिति के पास जाना होगा ,उसके निर्णय के बाद वे कोर्ट जा सकते है ,इसका मतलब भी यही ही की पहले आपको कलेक्टर की अनुमति लेनी होगी ,तब ही आप कोर्ट जा सकेंगे , 


6 ,  मोदी ने कहा की जिस जमींन  की मलिकी सरकार की है उसमे सहमति की जरुरत  नहो होगी , कोन  नहीं जानता  की जिस जमींन   अधिग्रहण सरकार करती ही उसको ही कुछ समय बाद ज्यादा कीमत पे उद्योगपतियों को बेच देती है ,उदहारण चाहते है   तो सुनिए की छत्तीसगढ़  एक खदान रजस्थान मिनिरल कार्पोरेशन को दी और उसके लिए जमींन का अधिग्रहण हुआ ,उसके बाद सरकार ने अडानी के साथजोइंट एडवेंचर बना  लिया  और उसकी मालिकी  अडानी को मिल गई ,  अब इसका क्या मतलब हुआ  ,


7 , झूट की सूचि में ये की पहले भी किसान सहमति नहीं ली जाती थी और अब भी सहमति की बात नहीं  हें। जब की पिछले कानून में सहमति की बात थी ,


8 , बार बार सिर्फ मुआब्जे की बात की गई ,एक बार भी किसानो  की मर्जी की बात नहीं की ,यदि किसान अपनी जमीं देना ही नहीं चाहते तो फिर उनका क्या होगा,   मुआवज़ा मुआवज़ा बार बार  एक ही बात ,हर विकल्प मुआवज़ा नहीं हो सकता ,


9 उन्होंने यह भी कहा की किसान परिवार में से एक व्यक्ति को रोजगार मिलेगा ,जब की अध्यादेश में खेतिहर  किसान की बात की गई है न की सब किसान की। 


1 0 , शोसल इम्पेक्ट अस्सिसमेंट को फिजूल समय की बर्बादी बताया ,  जब की ये सबसे ज्यादा जरुरी था ,जिसे की पता चल सके की आसपास के क्षेत्र में पर्यावरण और सामाजिक स्थिति का आंकलन किया जा सके,
11 ,  जो भी किसान इसका विरोध कर रहे हैं ,वो देश का विकास  नहीं चाहते ,  कमाल  हैं , 

कुल मिला के मोदी अपनी सफाई ही देते रहे ,उन्होंने एक बार भी किसानो के मन की बात नहीं की।

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