ग़ज़लें प्रदीप कांत की : दस्तक़ में प्रस्तुत अमिताभ मिश्र

दोस्तों आज समूह के साथी प्रदीप कांत की कुछ ग़ज़लें पेश कर रहा हूं। प्रदीप छोटी बहर में जो बड़ा कमाल करते हैं उसका मैं कायल हूं तो आप भी पढ़ें ये ग़ज़लें और इन पर बात करें।   फिर से पत्थर, फिर से पानी फिर से पत्थर, फिर से पानी कब तक कहिए, वही
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  24.09.2018 कल्‍पना लाजमी का जाना हिंदी फिल्‍म जगत का एक बड़ा नुकसान है। बहुत बरस पहले एक सीरियल आया था ‘लोहित किनारे’। ये दूरदर्शन का ज़माना था। मुमकिन है आपको ये सीरियल याद भी हो। इसका शीर्षक गीत शायद भूपेन हजारिका ने गाया था। असम की कहानियों पर केंद्रित ये धारावाहिक बनाया था कल्‍पना
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दोस्तों आज मैं दस्तक के साथी कवि और हिन्दी के जाने माने अध्येता कवि शरद कोकास की कविताएं साझा कर रहा हूं। शरद वैज्ञानिक चेतना से सराबोर कवि हैं। वे अपनी कविताओं और अपने लेखों में भी विज्ञान को तरजीह देते हैं जो एक बेहद जरूरी काम है। पुरातत्ववेत्ता और देह दो लंबी कविताएं बहुपठित,
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🎥 🎥 ० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले मैंने ‘मुल्‍क’ नहीं देखी है अभी। अनुभव सिन्‍हा की इस फिल्‍म का बेसब्री से इंतज़ार था क्‍योंकि पता था कि ये फिल्‍म क्‍या कहने जा रही है। ये भी पता था कि मुल्‍क बहुत ज्‍यादा चर्चा का विषय बनेगी। असल में भारत में ऐसी बेबाक फिल्‍में
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🎥🎥 ० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले मैंने ‘मुल्‍क’ नहीं देखी है अभी। अनुभव सिन्‍हा की इस फिल्‍म का बेसब्री से इंतज़ार था क्‍योंकि पता था कि ये फिल्‍म क्‍या कहने जा रही है। ये भी पता था कि मुल्‍क बहुत ज्‍यादा चर्चा का विषय बनेगी। असल में भारत में ऐसी बेबाक फिल्‍में
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दस्तक की सदस्या रेणु मिश्रा सक्रिय युवा कवयित्री हैं। वे कहानियाँ भी लिख रही हैं। आजकल उनकी रिहाइश अलीगढ़ में हैं। आइये आज पढ़ते हैं रेणु की कुछ कविताएं। कविताओं पर आप सभी की प्रतिक्रिया की अपेक्षा रहेगी….. अनिल करमेले . रेणु मिश्रा || स्त्रियां, मन से लड़कियाँ || हमनें माँओं को देखा अपनी पुरानी
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दोस्तों आज मैं शहनाज़ इमरानी की कविताएं प्रस्तुत कर रहा हूं। शहनाज़ इमरानी की कविताएं हमारे सामने जो परिदृश्य रखतीं हैं उससे उनकी चिंताओं के दायरे का विस्तार दिखता है वो एकदम हमारे नज़दीक का भी है, दोस्तों का भी है और दूर का भी। स्मार्ट सिटी पर पहली सटीक कविता उनकी देखने में आई।
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⭕ || अस्वीकार की अनन्य || इन्द्र, आप यहाँ से जाएँ तो पानी बरसे मारुत, आप यहाँ से कूच करें तो हवा चले बृहस्पति, आप यहाँ से हटें  तो बुद्धि कुछ काम करना शुरू करे अदिति, आप यहाँ से चलें तो कुछ ढंग की संततियाँ जन्म लें रूद्र, आप यहाँ से दफ़ा हों तो कुछ
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20.07.2018 बड़ी मुद्दत, बड़ी मिन्नत, बहुत तगादे, बहुत संकोच के साथ जिस शख्स ने मुझे कविताएं दीं वो हैं अनिल करमेले. अनिल करमेले की कविताएं हमारे आसपास की दुनिया की कविताएं हैं, हमारी ही कविताएं हैं ये। एक शेर याद आ रहा है “मेरी दास्तां को ज़रा सा बदल कर मुझे ही सुनाया सवेरे सवेरे”
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⭕ दोस्तो, आज प्रस्तुत हैं  वीरेन डंगवाल की कविताएँ. कविताओं पर चर्चा ज़रूर करें.   ✍🏻 वीरेन डंगवाल ० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले || माँ की याद || क्या देह बनाती है माँओं को ? क्या समय ? या प्रतीक्षा ? या वह खुरदरी राख जिससे हम बीन निकालते हैं अस्थियाँ ?
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