14. आज मसाला चाय कार्यक्रम में सुनिए नजीर अकबराबादी की कविता “आदमीनामा” अनुज.

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ‘नज़ीर ग्रंथावली’ में ज़िक्र है कि नज़ीर सरल स्वभाव के थे. जब घर से निकलते तो अक्सर लोग रास्ता रोककर खड़े हो जाते. उनकी घोड़ी ऐसी सध गयी थी कि जहां लोगों ने सलाम किया वहीं खड़ी हो जाती. सब कहते मियां पहले कविता सुनाएं, Continue Reading

रूब़रू में इस्लाम और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में जुलैख़ा जबीं से चर्चा . तीन एपीसोड़ .

दुनिया के सभी प्रचलित धर्म अपने अंदर कई रूढ़ियाँ और ग़ैरज़रूरी परम्पराएं लिए हुए हैं, और जब मैं “सभी धर्म” कह रहा हूं तो ज़ाहिर है इसमें इस्लाम भी शामिल है. किसी भी स्थापित व्यवस्था को समय समय पर व्याख्या और सुधार की ज़रुरत होती है. यही बात धार्मिक व्यवस्था Continue Reading

पब्लिक स्पेस : अगर हमने अपनी सोच नहीं बदली तो भारत लोकतंत्र से हाथ धो बैठेगा…

हिमांशु कुमार ,गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हमारी एक परिचित महिला हैं। बड़ी जाति की हैं अमीर हैं एक गांधीवादी संस्था की प्रमुख हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें बड़ी समस्या हो रही है। मैंने पूछा क्या समस्या है? तो वो बोलीं कि मैं शुरू से ही सुबह सुबह गांधी समाधी राजघाट घूमने Continue Reading

इतिहास . कैसे पड़े लोकतांत्रिक संविधान के बीज .1215 ईसवी में जारी मैग्ना कार्टा को आधुनिक संविधान का जनक माना जाता है ,

भागीरथ www.downtoearth.org.in भारत समेत दुनियाभर के लोकतांत्रिक देश आज संविधान के अनुसार चल रहे हैं । ऐसे में यह जानना दिलचस्प हो जाता है कि आखिर संविधान की नींव कब , कैसे और किन परिस्थितियों में गड़ी । आधुनिक संविधान की अवधारणा 1215 ईसवीं में ब्रिटिश राजतंत्र के दौर जारी Continue Reading

11.वे अंधश्रद्धा / बाबागिरी का विरोध क्यों करते हैं ? संदर्भ :, धर्म और जाति संबंधी दृष्टिकोण पर पुनर्विचार .

बाबा क्या कहते हैं , पता है ? वे एक ही वाक्य कहते हैं – वत्स , तुम्हारा कल्याण किसमें है , यह मैं जानता हूँ । उनके ऐसा कहने पर मुझे आपत्ति नहीं है । मेरी माँ भी यही कहती है । मगर मुझे इसके बाद कहे जाने वाले Continue Reading

2. ” एक छलांग पीछे की ओर” भारतीय वन अधिनियम , 1927 में प्रस्तावित संशोधन .

एक छलांग पीछे की ओर भारतीय वन अधिनियम , 1927 में प्रस्तावित संशोधन पिछले दशकों में जड़ें जमा चुके समुदाय – संचालित वन प्रबंधन के मूल सिद्धांतों को बदल डालेगा . ग्लैडसन डुंगडुंग औपनिवेशिक कालीन भारतीय वन अधिनियम , 1927 में प्रस्तावित संशोधन पीढ़ियों से जनजातियों के स्वामित्व वाले प्राकृतिक Continue Reading

पैसे की सनक सबकी दुश्मन है ,पेड़-पौधे, पानी, पहाड़ और प्रकृति सबकी .

कबीर संजय ,जंगल कथा से पैसे की सनक सबकी दुश्मन है। पेड़-पौधे, पानी, पहाड़ और प्रकृति। उसके लिए सब बस उसकी इच्छा पूर्ति के साधन है। वो सबकुछ खरीद सकता है। औली ने हाल ही में इसकी एक झलक देखी है। यहां पर होने वाली सिर्फ एक शादी के बाद Continue Reading

प्रकृति के संकेतों को नहीं समझने वाली सभ्यताएं नष्ट हो जाती हैं.

कबीर संजय जी की वॉल से साभार प्रकृति के संकेतों को नहीं समझने वाली सभ्यताएं नष्ट हो जाती हैं। लग तो ऐसा ही रहा है कि हमारी पीढ़ी भी इन चेतावनियों को नजरअंदाज करने वाली पीढ़ी के तौर पर ही गिनी जाएगी। नीचे दो तस्वीरें है। सेटेलाइट से ली गई Continue Reading

सुधा भारद्वाज की रिहाई की मांग और गिरफ्तारी के विरोध में शहीद दिवस के दिन भिलाई में 700 मजदूरों ने दी गिरफ्तारी .

भिलाई . छत्तीसगढ़ के 15 जिलों से लोग आए और सुधा भारद्वाज के रिहाई के लिए मांग किए सभी मजदूर किसान सुधा जी के गिरफ्तारी के विरोध में गिरफ्तारी दिए ..किसान,मजदूर के बीच रहकर काम करने वाली सुधा भारद्वाज को जानबुझ कर फँसाय गया है वही राम रहीम जो बलात्कारी Continue Reading

भिलाई जनसंहार.

उत्तम कुमार, संपादक दक्षिण कोसल. वर्षों गुजरने के बाद भिलाई जनसंहार (मजदूर आंदोलन के दौरान गोलीकांड) को दुबारा याद करने का समय है। हजारों की संख्या में मजदूर, मजदूर नेताओं के साथ अन्य सामाजिक संगठनों के लोग अपने बुनियादी मांगों के लिए न्योछावर हो चुके मजदूरों को याद करेंगे। छत्तीसगढ़ Continue Reading