सरकार और जनताना सरकार की लड़ाई में आम आदिवासी ही शिकार हो रहा है
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(  तामेश्वर सिन्हा )

 आदिवासी के ऊपर सरकार के द्वारा बनाई गई सलवा जुडूम से क्या कम विनाश हुआ था जो उसने हाल ही में सलवा जुडूम की तर्ज पर अनेक मंच, संघठन  खड़ा कर रखा है | जिसका  एक सूत्रीय काम है हत्याओ पर जश्न, धमकी और लूटपाट | जिसकी शिकार बस्तर के आम बस्तरिया आदिवासी तो हो ही रहे थे लेकिन उनके संविधानिक आधिकारो, लोकतान्त्रिक अधिकारों पर बोलने,लिखने वाले पत्रकार, समाजिक कार्यकर्त्ता भी होने लगे |

यह सब सिर्फ इसलिए किया जा रहा है ताकि बस्तर की प्राकृतिक सम्पदा खनिज, जल, जंगल, जमीन की कार्पोरेट लूट सुनिश्चित की जा सके
 बस्तर में हर 50 नागरिक पर एक हथियारबंद सुरक्षाकर्मी तैनात किया गया है. 20 लाख की आबादी पर सशस्त्र बल के 40 हजार जवान तैनात है. ये सुरक्षाबल किसी नागरिक की रक्षा के लिए नही बल्कि प्रशासनिक संरक्षण में लूटमार और मानवाधिकार को अपने बूटों तले रौदने में लगे है.
· प्रशासनिक दमन के खिलाफ लड़ने वाले लोगों, सामाजिक-राजनैतिक संगठनों और पत्रकारों के लोकतान्त्रिक अधिकार सुरक्षित नहीं रह गये है.
प्रायोजित ढंग से इन्होने निरीह आदिवासियों का दमन चालु किया, जो आदिवासी नक्सलवाद से परेशान था उन्हें ही नक्सलवाद का झूठा आरोप थोप दिया गया, लुटे गए आम आदिवासी ही ,मारे गए आम आदिवासी ही | स्वाभिमान के साथ खिलवाड़ हुआ आम आदिवासियों का ही | लोकतंत्र की हत्या तो उस दिन हो गई जब आम आदिवासी आवाज उठाना चाहे तो उसे भी छीन लिया गया उनका मौलिक अधिकार भी खत्म कर दिया गया |अादिवासियों को नक्सलियों के नाम पर फर्जी मुठभेड़ों में मारा जा रहा है। इसके अलावा फर्जी समर्पण व पुलिस फोर्स पर महिलाओं के साथ दुष्कर्म करने के कई मामले भी लंबित है लेकिन एक भी मामले में दोषी पुलिस कर्मियों व फोर्स के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाई है।
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों को नक्सली समर्थक मानकर दोयम दर्जे का व्यवहार किया जा रहा है।

सलवा जुडूम के शुरू होने के बाद अकेले सुकमा जिले से 15,000 से ज्यादा लोग पलायन कर आंध्र प्रदेश के चित्तूर, चेरला आदि जंगलों में पनाह लिए हुए हैं. हिंसक दौर शुरू होने के बाद से 644 गांवों के दो लाख से ज्यादा लोग सीधे प्रभावित हुए और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पचास हजार से ज्यादा लोगों ने जान बचाने के लिए बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा जिलों में बने 21 राहत शिविरों में पनाह ली थी| . बस्तर समेत राज्य की जेलें निर्दोष आदिवासियों से भरी पड़ी है. सिर्फ 2015-16 में ही 778 आदिवासियों को गिरफ्तार किया गया. इनमें से 662 लोग तो पिछले 6 महीनों में ही गिरफ्तार किये गये.आत्मसमर्पण के नाम पर 377 लोगो का समर्पण कराया गया, जिनमे से 270 लोगों का कोई माओवादी रिकार्ड ही कभी नही लीलग एड संस्था के शोध के अनुसार पुरे बस्तर के जेलों में आदिवासी विचारधीन कैदियों का क्षमता से आधिक संख्या है, जो कई सालो से न्यायलय में पेश भी नही हुए है , तात्पर्य यह है कि सरकार नक्सल उन्मूलन के नाम पर जितना बहार आदिवासियों को मार रही है,ठीक विपरीत उन्हें जेलों में ठूसा जा रहा है| बस्तर के गांवों में रहने वाले कई निर्दोष आदिवासियों को पुलिस नक्सली बताकर जेल में डाल देती है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि 90 प्रतिशत से अधिक लोग निचली अदालत में ही बेकसूर साबित होते हैं, लेकिन जब तक ये लोग छूटते हैं तब तक इनकी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा जेल में बरबाद हो चुका होता। इसकी सबसे बड़ी शिकार हैं आदिवासी महिलाएं।
वही केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं कि देश के नक्सल प्रभावित 10 राज्यों में छत्तीसगढ़ ऐसा प्रदेश है, जहां पिछले पांच साल में नक्सली हिंसा में 924 की मौत हुई है। दूसरा नंबर झारखंड का आता है, जहां इसी अवधि में 779 लोग मारे गए।  जनवरी से अप्रैल 2015 तक 10 राज्यों में 79 लोग नक्सली वारदात का शिकार बने हैं, जिनमें से 46 लोग सिर्फ छत्तीसगढ़ में मारे गए हैं।
  छत्तीसगढ़ में वर्ष 2010 में 343, 2011 में 204, 2012 में 109, 2013 में 111, 2014 में 111 तथा 2015 में अप्रैल तक 46 लोगों की मौत हुई है। कहा गया है कि वर्ष 2010 में सलवा जुडूम आंदोलन के खिलाफ 343 लोगों की हत्या हुई थी।क्सलियों ने सुरक्षाबलों पर 52 हमले किए, जिसमें सर्वाधिक 45 हमले छत्तीसगढ़ में तैनात सुरक्षा बलों पर हुए। यही नहीं, पिछले चार महीनों के दौरान प्रभावित राज्यों में नक्सली हिंसा में सुरक्षा बल के 34 जवान शहीद हो गए, जिनमें अकेले छत्तीसगढ़ के 28 जवान शामिल हैं।

छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में 2001 -2011 के दशक में आबादी दर में गिरावट के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. जनगणना 2011 के अंतरिम आंकड़ों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ की आबादी पिछले एक दशक में 4.32 फीसदी बढ़ी है, जबकि नक्सल प्रभावित आदिवासी इलाकों की आबादी दर तेजी से घटी है. सर्वाधिक प्रभावित जिला बीजापुर है, जहां से सलवा जुडूम अभियान का आगाज हुआ था. 2001 की जनगणना में आबादी वृद्धि दर 19.30 फीसदी थी जो 2011 में घटकर महज 8.76 फीसदी रह गई.

आदिवासी पहचान एवं संस्कृति का हिंदूकरण कर समाप्त किया जा रहा है। जल-जंगल और जमीन से उन्हें बेदखल किया जा रहा है, हर 8 आदिवासी में से एक आदिवासी आज पहले ही विस्थापित हो चुके हैं। यह सब सोची समझी साजिश के तहत किया जा रहा है। जो उन्हें गैर आदिवासी बनाने की साजिश है। इस प्रकार आदिवासियों को संविधान में प्रदत्त 5 वीं एवं 6 वीं अनुसूची के तहत जल-जमीन व जंगल पर मालिकाना हक एवं संस्कृति का संरक्षण प्रदान करता है से वंचित किया जा सके। आदिवासियों के संविधानिक, सांस्कृतिक, आर्थिक व राजनीतिक अस्मिता को मिटाने की कोशिश हो रही है।
*तामेश्वर सिन्हा*

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