अक्टूम्बर क्राँति जारी है -,जेके कर

इन दिनों रूस में हुये बोल्शेविक क्रांति की 100वीं वर्षगाठ मनाई जा रही है.
इस वर्षगाठ में उल्लास कम उपहास ज्यादा है. जहां उपहास नहीं है वहां सवाल है कि आखिर 100 साल तक पहुंचने से पहले ही वह टूट क्यों गई? यह सच्चाई है कि सोवियत रूस 20वीं शताब्दी के आखिर तक पहुंचते-पहुंचते बिखर गया. बोल्शेविक क्रांति को नेतृत्व देने वाले लेनिन ने कहा था कि एक देश में समाजवाद सफल हो सकता है बर्शते सैनिक हस्तक्षेप करके उसका गला न घोंट दिया जाये. सोवियत रूस ने अमरीका के नेतृत्व में सैनिक गठजोड़ नाटो का तो सफलतापूर्व मुकाबला करते हुये अपने को बचाये रखा था परन्तु देश के भीतर से उठ रहे पेरेस्त्रोइका तथा ग्लास्नोस्त के सिद्धांत ने न केवल उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये बल्कि वहां के राज्यसत्ता का चरित्र भी बदल दिया.

क्या सोवियत संघ के बिखर जाने तथा दुनियाभर में समाजवादी आंदोलन के कमजोर पड़ जाने का अर्थ यह है कि अक्टूबर क्रांति व्यर्थ साबित हुई है. हमारी चर्चा का यही विषय है. अक्टूबर क्रांति पर चर्चा करने से पहले 19वीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स तथा एंगेल्स के द्वारा जिन दो प्रमुख सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया था उसे समझना जरूरी है. दोनों ने अपनी कालजयी रचना पूंजी के माध्यम से दुनिया को बताया था कि जब कामगार से काम कराया जाता है तो उससे कुछ अतिरिक्त श्रम पैदा होता है. दरअसल, अतिरिक्त श्रम वह श्रम होता है जिसके बदले में कामगार को मेहताना नहीं दिया जाता है. कामगार को तो उसके मेहनत के एक अंश का ही मेहताने का भुगतान किया जाता है. यह अतिरिक्त श्रम ही वह शोषण होता है जिसकी बुनियाद पर वर्तमान व्यवस्था खड़ी हुई है.

 

मार्क्स तथा एंगेल्स के द्वारा जो दूसरा महत्वपूर्ण सिद्धांत दिया गया था वह है कि कामगार वर्ग जब तक सत्ता पर कब्जा नहीं कर लेता है तब तक उसे इस शोषण से मुक्ति नहीं मिल सकती है. लेनिन ने रूस में 20वीं सदी में उसे ही संभव कर दिखाया था अक्टूबर क्रांति के रूप में. परन्तु जिस तरह से मार्क्स तथा एंगेल्स को उनकी कृतियों के कारण जाना जाता है तथा उन्हें इसका पूरा-पूरा श्रेय दिया जाता है उस तरह से लेनिन को अकेले अक्टूबर क्रांति का श्रेय नहीं दिया जा सकता है. बेशक, उन्होंने रूसी परिस्थिति में इसे लागू किया तथा मार्क्स एवं एंगेल्स के सिद्धांत को वास्तविक कर दिखाया, परन्तु उसका पूरा श्रेय रूसी बोल्शेविक पार्टी तथा उसके सामूहिक नेतृत्व को जाता है. इस परंपरा को स्टालिन के नेतृत्व में सोवियत जनता ने जारी रखा तथा एडोल्फ हिटलर को पछाड़कर दुनिया को दूसरे विश्व-युद्ध से छुटकारा दिलाया था.

स्टालिन के बहुत बाद में आये मिखाइल गोर्बाचौफ के द्वारा 1985 में शुरु किये गये इन दोनों कोशिशों के बदौलत खुलेपन के नाम पर कामगार वर्ग को सत्ता से शनैः शनैः हटाने का काम किया गया. सोवियत संघ की साम्यवादी पार्टी के माध्यम से उत्पादन के साधन पर कामगार वर्ग का जो नियंत्रण था उसे कम किया जाने लगा. फलस्वरूप, जिस तरह से सोवियत संघ का विखंडन हुआ तथा दुनिया के कई देशों ने समाजवाद का झंडा त्यागकर जनतंत्र का झंडा थाम लिया उससे शोषण के खिलाफ जो मजबूत राज्यसत्ता अस्तित्व में आया था वह ढह गया. इसका बड़े जोर-शोर से जश्न मनाया गया. अब इससे लाख टके का सवाल यह उभरकर आता है कि क्या अक्टूबर क्रांति जिस सिद्धांत के आधार पर हुई थी वह गलत साबित हुई या यह साबित हुआ कि राज्यसत्ता से कामगार वर्ग की पकड़ को कमजोर करने के कारण फिर से वह वर्ग हावी हो गया जो अतिरिक्त श्रम को हड़पकर अपने पूंजी का विस्तार करता है.

अक्टूबर क्रांति को यदि केवल सोवियत संघ तक सीमित माना जाये तो हम एक भीषण गलती कर बैठेंगे. अक्टूबर क्रांति के बाद चीन में भी उन्हीं सिद्धांतों के आधार पर पुरानी सत्ता को पलटकर सत्ता पर जिस तरह से कामगार वर्ग तथा किसानों के नुमाइंदे सत्तासीन हुये उस चीनी क्रांति को अक्टूबर क्रांति की निरंतरता माना जाना चाहिये. अक्टूबर क्रांति की निरंतरता तो चेकोस्लोवाकिया, हंगरी, अल्बानिया, बुल्गारिया, उत्तरी कोरिया एवं युगोस्लोवाकिया में समाजवादी सरकार के स्थापना को भी माना जाना चाहिये. वियतनाम में हुई क्रांति भी तो अक्टूबर क्रांति के निरंतरता को ही साबित करती है. क्यूबा में आज भी समाजवादी सरकार है. हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि रूस में हुई अक्टूबर क्रांति ने जिस ज्वाला को जलाया था उसकी रोशनी के नीचे एक समय कई देश आ गये थे.

हां, सोवियत संघ के टूट जाने के बाद कई देशों ने अपना झंडा बदल लिया है. आज भी दुनिया के नक्शे पर चीन, उत्तरी कोरिया, वियतनाम, क्यूबा जैसे समाजवादी देश अस्तित्व में हैं. बेशक, समाजवाद के लक्ष्य को पूरी तरह से प्राप्त नहीं किया जा सका है. आज भी इन देशों के अंदर में असमानता बनी हुई है. लेकिन क्या इससे बोल्शेविक क्रांति जिसे अक्टूबर क्रांति कहा जाता है सैद्धांतिक तौर पर गलत साबित होती है. हमारा मानना है कि बिल्कुल भी नहीं. अक्टूबर क्रांति की 100वीं सालगिरह के मौके पर इस बात को याद किया जाना चाहिये कि इसने ही मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को खत्म करने वाले राज्य की स्थापना की जा सकती है सही साबित किया है. आगे चलकर भी किसी देश में अक्टूबर क्रांति जैसा बदलाव नहीं होगा इसे कैसे पत्थर की लकीर माना जा सकता है जबकि मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण आज भी जारी है.

अंत में, वर्तमान व्यवस्था की विवशता पर भी चर्चा कर लेनी चाहिये. यह व्यवस्था रोजगार देने में, खाना देने में, शिक्षा देने में, चिकित्सा देने में, कानून-व्यवस्था बनाये रखने में, पर्यावरण की रक्षा करने में नाकारा साबित हो रहा है. चाहे आप अमरीका का उदाहरण देख लें या भारत का उदाहरण लें सभी देश इस समस्या से ग्रसित हैं तथा इनके पास इस समस्या को हल करने का कोई मार्ग नहीं है. इन समस्याओं का हल एकमात्र समाजवादी शासन व्यवस्था में ही संभव है.

हां, यह फौरी तौर पर संभव नहीं दिख रहा है और फिलहाल समाजवादी आंदोलन अपने सबसे कमजोर अवस्था में है परन्तु मार्क्स तथा एंगेल्स ने भी कभी कल्पना नहीं की थी कि रूस जैसे पिछड़े देश में कामगार वर्ग का शासन स्थापित हो सकेगा. इस कारण से अक्टूबर क्रांति तो वह रास्ता है जो यथास्थिति को बदलने की क्षमता रखता है. ज्यादातर लोग इस विचार से इंकार कर सकते हैं परन्तु अल्पमत में होने के कारण विज्ञान को झूठा तो साबित नहीं किया जा सकता. विज्ञान का फैसला अल्पमत या बहुमत के आधार पर नहीं उसके ठोस निष्कर्ष के आधार किया जाता है. दुनिया के इतिहास ने बार-बार साबित कर दिया है कि अक्टूबर क्रांति एक वास्तविकता है.

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