फर्जी आत्मसमर्पण पर प्रभात सिंह की विशेष रिपोर्ट

*मैं तो किसान का बेटा हूँ… खेती करता हूँ… नक्सली बताकर सरकार ने क्यों सरेंडर कराया ???*
August 27, 2016 Bhumkal

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फर्जी आत्मसमर्पण पर प्रभात सिंह की विशेष रिपोर्ट

हम बण्डा गाँव की हकीकत से आपको रूबरू करवाते हैं…

तिरंगा यात्रा से लौटते वक्त मेरी मोटरसाइकिल में कुछ खराबी आ गई थी | जिसे ठीक करते करते रात हो गई | काफी रात होता देख किसी अनहोनी की आशंका में मेरे साथियों ने बण्डा गाँव में ही रुकने का विचार किया | पास के घर में परिवार के मुखिया से एक रात अपने घर में पनाह देने की गुजारिश की और उसने हमारी गुजारिश सहर्ष स्वीकार की | हम जिसके घर में रुके वह पीसम पेंटा का घर था | काफी थके-हारे होने के बावजूद बातचीत करते-करते उसने जो अपनी कहानी सुनाई और उसके बाद गाँव की जो असलियत सामने आई वह दिल दहला देने वाली है | बण्डा गाँव के कूल पाँच लोगों का पुलिस ने कथित रूप से आत्मसमर्पण कराया | जबकि सारे लोग गाँव के खेती करने वाले किसान थे | आज भी वे खेती कर अपना परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं | इनमें से पहली कहानी है पिसम पेंटा कि…

तीन भाइयों में सबसे छोटा पिसम पेंटा के परिवार को सलवा जुडूम कथित जन आन्दोलन शुरू होते ही गाँव छोड़कर भागना पड़ा | परिवार आंध्रप्रदेश (वर्तमान में तेलंगाना का हिस्सा) कमाने चला गया | सलवा जुडूम का असर थमने के बाद दोनों बड़े भाई पिसम राजा एवं पिसम एंका घर लौट आये | गाँव आकर देखा तो पता चला सलवा जुडूम कार्यकर्ताओं ने उसका घर जला दिया था | घर का सारा सामान जिसमें बर्तन, सोने चाँदी के गहने, कपड़े आदि सभी लूट लिया गया था | टूटे और जले हुए घर की दीवारों के अलावा कुछ भी लूटेरों ने नहीं छोड़ा था | भाइयों ने गाँव में छोटी सी झोपड़ी बनाई और नए जीवन की शुरुआत की | सलवा जुडूम प्रारंभ होने से पहले उसके घर में 40 बकरियाँ, 20 भैसें, 20 गायें थी जो लूट लिए गए | तेलंगाना से पिसम पेंटा घर नहीं लौटा वह वहाँ से बेंगलोर कूली (मजदूरी) करने चला गया | बेंगलोर से लौटकर कोंटा सलवा जुडूम कैम्प में आकर रहने लगा | वहाँ से बैलाडीला मजदूरी करने चला गया जहाँ उसे 11 बी खदान में काम मिल गया | एक माह बाद जब वह घर लौटा तब उसे पता चला की घर परिवार पूरा तबाह बर्बाद हो चूका है |

भाईयों के बिमारी की खबर मिलते ही पिसम पेंटा अपने गाँव बण्डा लौट आया | माँ पिसम आदि खाँसी से और पिता पिसम मुच्चा की मौत पेट फूलने की बिमारी से पहले ही मौत हो चुकी थी | भाई राजा बीमार पड़ा तो मंदिर में पूजा, वड्डे (बैगा गुनिया) से झाड़-फूँक से लेकर भद्राचलम के अस्पताल तक ईलाज करवाया | अंत में पैसे ख़त्म हो जाने के कारण घर लेकर आ गया | राजा का हाथ सुज (फूल) गया और शरीर पूरा सुख गया था | उसने गाँव में अंतिम साँसे ली | दुसरे भाई पिसम एंका की मौत खाँसी से हुई, मूँह से खून निकलता था | कोंटा से लेकर चिंतूर (तेलंगाना), भद्राचलम तक ईलाज करवाया | भद्राचल से डाक्टरों ने उसे खम्मम ले जाने को कहा सरकारी अस्पताल में भी ईलाज करवाने के लिए पैसे नहीं थे इसलिए पेंटा घर वापस लेकर आ गया | कुछ दिन बाद कोंटा में भर्ती करवा दिया और अंत में उसकी भी मृत्य हो गई | दो सालों में दोनों भाइयों की मौत हो गई | गाँव में पीसम पेंटा का परिवार देवी देवताओं की आदिवासी रीति रिवाज से पूजा करता था | पीसम पेंटा बताता है कि कुछ दिनों के बाद मेरे दोनों भाइयों की मृत्यु इसलिए हो गई क्योंकि हम लोगों का पूजा पाठ करना छुट गया था |

पिसम पेंटा के पास करीब 25 एकड़ भूमि है जिसमें से 10 एकड़ में वह खेती करता है | सनातन से यह मूल निवासी परिवार कृषि कार्यों के सहारे जीवन यापन कर रहा है | दोनों भाइयों में राजा की शादी हो चुकी थी; उसके बच्चे नहीं थे तो उसकी पत्नी मायके लौट गई अब वो वही बण्डा गाँव के पुली पारा में अपने माता पिता के साथ रहती है |

साथ में मजदूरी करने वाली मुर्राम राजे से पेंटा की जान-पहचान थी | मुर्राम राजे ग्राम डोंडरा (कोंटा) की रहने वाली थी दोनों ने विचार किया कि पहले घर बनायेंगे फिर विवाह रचाएंगे; दोनों ने अपना घर बनाया और आदिवासी रीति रिवाज से विवाह किया | पेंटा को शादी का दिन महिना तो याद नहीं पर साल याद है | वह बताता है कि उसकी शादी 2009 में गर्मी के मौसम में हुई | पेंटा और राजे को 17 अगस्त 2015 को लड़की हुई | घर लौटने के बाद उसने अपनी मेहनत और लगन से कूल 10 भैसें, 15 गायें, और 11 मुर्गे-मुर्गियाँ जुटा ली हैं | सुबह शाम असली दूध की चाय पिसम को उसकी पत्नी बना कर देती है | वह दही भी जमा लेता है; जिसे वह दोपहर या शाम के भोजन के रूप में दही भात का सेवन करता है |

पीसम पेंटा बताता है कि उसके साथ गाँव के और चार लोगों बसंत कोर्राम, तेलम मुत्ता, पोड़ियम देसा, पुल्ली रातैया का भी पुलिस ने सरेंडर करवाया | कोंटा में दो दिन रखने के बाद दोरनापाल में 3 दिन रखे और सरकारी जलसे में सभी का सरेंडर करवाया गया | लेकिन सरेंडर की परिभाषा इनमें से कई लोगों को मालुम भी नहीं हैं | बसंत कोर्राम जेल एक बार जेल जा चूका है तो वहीं पुल्ली रातैया सलवा जुडूम के बाद से कोंटा में रहकर ड्राइवरी सीख लिया है, तब से वह कोंटा में ही रह रहा है | पोड़ियम देसा गाँव में नहीं रहता वह काम की तलाश में तेलंगाना ही ज्यादातर रहता है | जिसे सरकार के लोग पलायन कहते हैं |

कोर्राम बसंत फर्जी मामले में जेल गया बाहर निकला तो सरकार ने सरेंडर करवा दिया…

कोर्राम बसंत (28) के साथ जो हुआ उसे सुनकर किसी का भी दिल दहल जाए | चार भाइयों में बसंत तीसरे क्रम पर था उसका जन्म एक आदिवासी किसान परिवार में हुआ था | बसंत का बड़ा भाई कोर्राम विनोद 2002 में उचित ईलाज नहीं मिलने से दम तोड़ दिया | महज दो दिन ही हुए थे बुखार को कोत्तागुड़ा तेलंगाना ले जाते समय रास्ते में मौत हो गई | दुसरे भाई कोर्राम महेश की दो लडकियां हुई एक की मौत बिमारी की वजह से हो गई | बसंत का एक पुत्र हैं जबकि उसके एक पुत्र की मौत डिलीवरी के समय हो गई | सबसे छोटे भाई रमेश की शादी एक साल पहले हुई है किन्तु बच्चा नहीं हो रहा है |

बसंत बताता है; सलवा जुडूम आन्दोलन की तबाही से घबराए पूरा परिवार जोगगुड़ा तेलंगाना चला गया था | सलवा जुडूम का डर कुछ कम हुआ तो परिवार आंध्रप्रदेश से 2007 में लौटकर कोंटा आया और कोंटा राहत शिविर (कैम्प) में रहने लगा | बसंत ने आगे बताया कि एक साल कैम्प में रहते हुए बीते ही थे कि 2008 में राहत शिविर (कैम्प) से पुलिस वाले कोंटा थाना बुलाये | थाने में एक दिन रखे फिर वहाँ से जेल भेज दिए | बसंत को जेल भेजने से पहले पुलिस ने उसका जुर्म तक उसे नहीं बताया | बसंत के मुताबिक़ उसे तीन माह दंतेवाड़ा जेल में रखा गया फिर जगदलपुर जेल भेज दिया गया | पुलिस ने उसके उपर कूल 8 फर्जी केस लगाए थे | आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण सभी केस विधिक सहायता प्रदान करने वाले वकीलों ने लड़ा | जगदलपुर से दंतेवाड़ा अधिकाँश पेशी में नहीं लाये जाने कारण ट्रायल में उसे 4 साल लगे | दंतेवाड़ा अदालत में आठों केसों का ट्रायल चला और कोर्राम बसंत सभी केस में दोषमुक्त होकर बाहर आया | बसंत को दिन महिना तो याद नहीं पर इतना जरुर याद है की जब वह रिहा हुआ उस वक्त गर्मी का मौसम था और साल 2011 |

बसंत आगे बताता है कि, सलवा जुडूम शुरू होने के बाद एक भाई रमेश राहत शिविर (सलवा जुडूम कैम्प) में रहता था | वही से वह आंध्रा (वर्तमान तेलंगाना) कमाने गया था | वह वहाँ कुली (मजदूरी) काम करता था | आंध्रा से पुलिस पकड़कर 2010 में कोंटा ले आई | जब बसंत जेल में था तब रमेश को थाने में कुछ दिन बिठाकर रखा गया और बाद में रमेश का सरेंडर कराया गया | बसंत के जेल से छुटने के बाद से वह 2011 में एसपीओ (वर्तमान सहायक आरक्षक) बन गया | परिवार में वह सबसे अधिक पढ़ा लिखा था | छत्तीसगढ़ सरकार की मेहरबानी से वह छठवीं कक्षा पास हो गया था | उसे पुलिस ने कहा था “नौकरी नहीं करोगे तो जेल भेज देंगे |” इस डर से वह पुलिस की नौकरी कर रहा है | वह अब गाँव नहीं आता; पुलिस बनने के बाद से वह कोंटा में रहता है | जब बसंत या उसका परिवार कोंटा बाजार सामान खरीदने-बेचने जाता है तो रमेश से यदा-कदा मुलाकात हो जाती है |

बसंत कहता है मुझे भी कोंटा पुलिस ने ऐसा ही कहा था | मैंने पुलिस बनने से इनकार कर दिया तो मुझे नक्सली बोलकर जेल भेज दिए | जब उससे केस के बारे में हमने पुछा तो वह बताता है कि मुझे कुछ भी नहीं मालुम और अंत में वह जेल से सभी मामलों में बरी हुआ | जेल से लौटने के बाद फिर राहत शिविर में पुलिस के संरक्षण में रहने लगा | गाँव का माहौल ठीक हुआ तो 2012 में सारा परिवार गाँव लौटा और खेती कार्य शुरू किया | सभी भाइयों की शादी सलवा-जुडूम शुरू होने से पहले हो चुकी थी | गाँव आने के बाद बसंत ने शादी की और उसका परिवार खुशी से जीवन यापन कर रहा था |

बसंत बताता है कि “इस साल गर्मी में मुझे पुलिस ने सरेंडर कराया | पुलिस वाले बुलाकर ले गए थे और बोले कि “सरेंडर करोगे तो थाना में नाम रहेगा, पुलिस वाले नहीं मारेंगे कहीं रात में पकड़ेंगे भी तो थाना में लाकार छोड़ देंगे | नाम लिखकर वे रख लिए, सरेंडर कराने से पहले दो दिन कोंटा पुलिस थाने में और 3 दिन दोरनापाल ले जाकर रखे थे | हमसे नक्सलियों के बारे में पुलिस ने किसी प्रकार की पुछताछ भी नहीं की गई | सरेंडर करने के बाद पुलिस वाले नहीं मारेंगे ऐसा एसपी साहब बोले |” सरेंडर के बाद हम लोगों को दोरनापाल से कोंटा थाना लेकर आये और बोले कि “यहीं रहो, पुलिस बनो” | लेकिन हम किसान थे खेती बाड़ी करना था और पुलिस बनने के बाद हमें माओवादियों से भी खतरा था | इसलिए पुलिस के डराने के बाद भी हम लोग गाँव लौट आये, तब से मैं खेती कर रहा हूँ |” आत्मसमर्पण क्या होता है यह इन्हें पता ही नहीं और ना ही बस्तर पुलिस को; शायद इसलिए इन्हें पुलिस पकडती है साथ रखती है फिर आत्मसमर्पण का खेल किया जाता है | नक्सलियों का साथ देने के सवाल पर बसंत कहता है पानी चावल जो माँगते हैं वो देते हैं गाँव में जो आता है उसे देना पड़ता है | कभी बन्दुक नहीं पकड़े, कभी नक्सलियों के साथ घूमें भी नहीं हैं | पुलिस वाले हमारे गाँव आते हैं तो नाश्ता ले कर आते हैं | पुलिस वाले हमसे कुछ नहीं माँगते हैं | नक्सलियों या पुलिस द्वारा मुर्गा-बकरा लूटने की बात पर उसने बताया कि नक्सली कभी मुर्गा बकरा नहीं माँगे, पुलिस वाले सरपंच और पटेल से माँगते हैं तो वो लोग देते हैं |

पाँचवी पास तेलम मुत्ता कथित सरेंडर के बाद भी कर रहा खेती…

तेलम मुत्ता सलवा जुडूम के खौफ से कोंटा राहत शिविर (बेस कैम्प) 2006 में अपने परिवार के साथ चला गया | जुडूम का असर कुछ कम हुआ तो 2008-09 में गाँव वापस लौटा आया | घर लौटा तो घर जलाया जा चूका था | गहने जेवरात बर्तन कपड़े सब लूट लिए गए थे |

गाँव में सबसे सफल किसानों में से एक मुत्ता के घर में 15 बकरी, 20 गाय, 15 भैस, बैल 05 जोड़ी, मुर्गी 20 आदि सभी लूट लिया गया था | अपने गाँव बण्डा वापस आने के बाद खेती के बल पर उसने पक्का खपरैल का मकान बनाया | अभी उसके पास लगभग इतने ही पालतू जानवर हैं; जो उसने अपनी मेहनत के बल पर जुटाए हैं | लेकिन हाल ही में अज्ञात बिमारी से उसकी काफी सारे मुर्गे मुर्गियाँ मर रहे हैं | उसके पास 05 एकड़ खेत हैं जिसमें 10 बोरा धान, 50 किलो तील और 10 क्विंटल मिर्ची की पैदावार होती है | जिसे तेलंगाना के चिंतूर ले जाकर बेचते हैं | जिससे उसे सालान लाख डेढ़ लाख रुपयों की आमदनी हो जाती है | चिंतूर गाँव से मात्र 05 किलोमीटर की दुरी पर है, कोंटा कुछ ज्यादा दूर है और वहाँ सही दाम भी नहीं मिलता है | साल में करीब तीन हजार की सब्जियाँ भी तेलम मुत्ता अपनी खेती से शहर ले जाकर बेच लेता है |

सरकार से पहले धान मिलता था पर इस साल नहीं मिला है | वह बताता है कि हर साल ऐसा होता है कि किसी ना किसी को छोड़कर धान के बीज दिए जाते हैं | यानी आधे लोगों को बीज दिए जाते हैं आधे को नहीं दिए जाते हैं | सिविक एक्शन प्लान के तहत केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल की तरफ से कपड़ा (टावेल) और सोलर लाईट मिला था | गाँव में जिसे सोलर लाईट नहीं मिला उसे कम्बल दिया गया | लेकिन पता नहीं क्यों इस साल के अप्रेल माह में नक्सली बताकर गाँव के 05 लोगों के साथ मुझे पुलिस ले गई | गुरुवार को ले गए और सोमवार को छोड़ दिए | पहले कोंटा थाना ले जाकर रखे वहाँ से दोरनापाल ले गए | हम लोगों को यह बोलकर ले गये कि “तुम लोग संघम में थे” | उसे सही आंकड़ा तो याद नहीं पर वह बताता है कि वहाँ 124 या 126 लोगों के साथ फोटो खिंचा गया था | वहाँ मुरलीगुड़ा, चिंताकोंटा, सोन्नमगुड़ा, मलालबण्डा जैसे गाँव से लोगों को लाया गया था | फोटो खिंचाने के वक्त एसपी और आईजी साहब भी मौजूद थे | किन्तु उसे उन अधिकारियों के नाम नहीं पता हैं |

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