आज प्रस्तुत दस्तक में  कवि अफ़ज़ाल अहमद सय्यद की कुछ नज़्में….

आज प्रस्तुत दस्तक में  कवि अफ़ज़ाल अहमद सय्यद की कुछ नज़्में….

दस्तक के लिए प्रस्तुति : अंजू शर्मा

|ज़िंदगी हमारे लिए कितना आसान कर दी गई ही |

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ज़िंदगी हमारे लिए कितना आसान कर दी गई ही
किताबें
कपड़े जूते
हासिल कर सकते हैं
जैसा कि गंदुम हमें इम्दादी क़ीमत पर मुहय्या की जाती है
अगर हम चाहें
किसी भी कारख़ाने के दरवाज़े से
बच्चों के लिए
रद करदा बिस्कुट ख़रीद सकते हैं
तमाम तय्यारों रेल गाड़ियों बसों में हमारे लिए
सस्ती नाशिश्तें रखी जाती हैं

अगर हम चाहें
मामूली ज़रूरत की क़ीमत पर
थिएटर में आख़िरी क़तार में बैठ सकते हैं
हम किसी को भी याद आ सकते हैं
जब उसे कोई याद न आ रहा हो

2⃣

|| आख़िरी दलील ||

 

तुम्हारी मोहब्बत
अब पहले से ज़्यादा इंसाफ़ चाहती है
सुब्ह बारिश हो रही थी
जो तुम्हें उदास कर देती
इस मंज़र को ला-ज़वाल बन ने का हक़ था

इस खिड़की को सब्ज़े की तरफ़ खोलते हुए
तुम्हें एक मुहासरे में आए दिल की याद नहीं आई

एक गुम-नाम पुल पर
तुम ने अपने आप से मज़बूत लहजे में कहा
मुझ अकेले रहना है

मोहब्बत को तुम ने
हैरत-ज़दा कर देने वाली ख़ुश क़िस्मती नहीं समझा

मेरी क़िस्मत जहाज़-रानी के कारख़ाने में नहीं बनी
फिर भी मैं ने समंदर के फ़ासले तय किए
पुर-असरार तौर पर ख़ुद को ज़िंदा रक्खा
और बे-रहमी से शाएरी की

मेरे पास एक मोहब्बत करने वाले की
तमाम ख़ामियाँ
और आख़िरी दलील है

3⃣

 

|| अगर उन्हें मालूम हो जाए ||

 

वो ज़िंदगी को डराते हैं
मौत को रिश्वत देते हैं
और उस की आँख पर पट्टी बाँध देते हैं

वो हमें तोहफ़े में ख़ंजर भेजते हैं
और उम्मीद रखते हैं
हम ख़ुद को हलाक कर लेंगे

वो चिड़िया-घर में
शेर के पिंजरे की जाली को कमज़ोर रखते हैं
और जब हम वहाँ सैर करने जाते हैं
उस दिन वो शेर का रातिब बंद कर देते हैं

जब चाँद टूटा फूटा नहीं होता
वो हमें एक जज़ीरे की सैर को बुलाते हैं
जहाँ न मारे जाने की ज़मानत का काग़ज़
वो कश्ती में इधर उधर कर देते हैं
अगर उन्हें मालूम हो जाए वो अच्छे क़ातिल नहीं
तो वो काँपने लगें
और उन की नौकरियाँ छिन जाएँ

वो हमारे मारे जाने का ख़्वाब देखते हैं
और ताबीर की किताबों को जला देते हैं

वो हमारे नाम की क़ब्र खोदते हैं
और उस में लूट का माल छुपा देते हैं

अगर उन्हें मालूम भी हो जाए
कि हमें कैसे मारा जा सकता है

फिर भी वो हमें नहीं मार सकते

4⃣

|| मैं डरता हूँ ||

 

मैं डरता हूँ
अपने पास की चीजों को
छू कर शाएरी बना देते हैं

रोटी को मैं ने छुआ
और भूक शाएरी बन गई

उँगली चाकू से कट गई
और ख़ून शाएरी बन गई

गिलास हाथ से गिर कर टूट गया
और बहुत सी नज़में बन गईं

मैं डरता हूँ
अपने से थोड़ी दूर की चीजों को
देख कर शाएरी बना देने से
दरख़्त को मैंने देखा
और छाँव शाएरी बन गई

छत से मैंने झाँका
और सीढ़ियाँ शाएरी बन गईं

इबादत-ख़ाने पर मैंने निगाह डाली
और ख़ुदा शाएरी बन गया

मैं डरता हूँ
अपने से दूर की चीजों को
सोच कर शाएरी बना देने से

मैं डरता हूँ
तुम्हें सोच कर
देख कर
छू कर
शाएरी बना देने से

 

अफ़ज़ाल अहमद सय्यद

साभार कविता कोश से

⭕ *दस्तक के लिए प्रस्तुति : अंजू शर्मा*

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