जन स्वास्थ्य  पर अमरीकी गिद्ध दृष्टि –जेके कर

3.11.2017

नव भारत मे प्रकाशित लेख

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यदि कहा जाये कि भारत के जनस्वास्थ्य पर अमरीकी व्यापारियों की गिद्ध दृष्टि लगी हुई तो गलत न होगा. उसी के साथ यदि यह भी जोड़ दिया जाये कि अमरीकी प्रशासन अपने कॉर्पोरेट हित के लिये भारत की नीतियों को प्रभावित करने की चेष्टा चला रहा है तो वह भी गलत नहीं होगा. हाल ही में अमरीकी कॉर्पोरेट घरानों ने भारत में केन्द्र सरकार द्वारा हृदयरोग के ईलाज में लगने वाले कॉरोनरी स्टेंट तथा घुटना बदलने में लगने वाले नी-इम्प्लांट के दाम नियंत्रित किये जाने के विरोध में अमरीका के ट्रेड रिप्रेजेन्टेटिव्स के पास अपना विरोध दर्ज कराया है तथा भारत पर कुछ व्यापार प्रतिबंध लगाने की गुजारिश की है. जिसमें मांग की गई है कि Generalized System of Preferences के तहत भारत को ड्यूटी में जो छूट मिलती है उसे या तो कम कर दिया जाये या पूरी तरह से खत्म कर दिया जाये.

इस तरह से भारत से अमरीका निर्यात होने वाले उत्पादों के दाम बढ़ जायेंगे तथा वे प्रतियोगिता में टिक नहीं सकेंगे. जाहिर है कि अमरीकी व्यापारियों की यह कारगुजारी भारत के किसी भी आजादी पसंद बाशिंदों को रास नहीं आने वाली है. शीत युद्ध के समय से ही अमरीकी पर आरोप लगते रहे हैं कि वह तीसरी दुनिया तथा विकासशील देशों के नीतियों में अपने मनमाफिक परिवर्तन कराता रहा है तथा अपने हित में सत्ता परिवर्तन करवाने से भी उसे गुरेज नहीं है.

दरअसल, भारत सरकार ने पिछले साल देश में बिकने वाले कॉरोनरी स्टेंट तथा नी-इम्प्लांट के अधिकतम खुदरा मूल्य तय कर दिये थे. उसके बाद इस साल 17 अक्टूबर को अमरीका के एडवांस मेडिकल टेकनालॉजी एसोसियेशन ने अमरीका के ट्रेड रिप्रेजेन्टेटिव्स के पास अपना विरोध दर्ज करवाया है. अमरीका के मेडिकल डिवाइस बनाने वाली 350 कंपनियों के इस संगठन के द्वारा अमरीकी व्यापार प्रतिनिधि के समक्ष अपना विरोध दर्ज तब करवाया गया जब करीब 10 दिन बाद ही भारत तथा अमरीका के यूएस-इंडिया ट्रेड पॉलिसी फोरम की बैठक होने वाली थी. सबसे हैरत की बात यह है कि अमरीकी ट्रेड रिप्रेजेंटिव्स रॉबर्ट लाइथीजर ने भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री सुरेश प्रभु के साथ बैठक के बाद जारी व्यक्त्व में कहा है कि अमरीका ने नये नियामक तथा तकनीकी बाधाओं के बारें में मजबूत परिणामों के लिये दबाव बनाया है. इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि वहां के कॉर्पोरेट संगठन अमरीकी नीतियों को किस तरह से प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं.

बता दें कि 19 जुलाई 2016 को भारत के स्वास्थ्य तथा परिवार कल्याण मंत्रालय ने कॉरोनरी स्टेंट को आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची में शामिल करने का नोटिफिकेशन जारी कर दिया. इसके बाद 21 दिसंबर 2016 को नेशनल फॉर्मास्युटिकल्स प्राइसिंग ऑथारिटी ने कॉरोनरी स्टेंट को मूल्य नियंत्रण के तहत लेते हुये उनके अधिकतम खुदरा मूल्य तय कर दिये गये. इसके तहत साधारण कॉरोनरी स्टेंट का मूल्य 7,260 रुपये तथा दवायुक्त घुलनशील कॉरोनरी स्टेंट का मूल्य 29,600 रुपये तय कर दिये गये. बकौल इस अमरीकी संगठन के इससे पहले तक दवायुक्त घुलनशील कॉरोनरी स्टेंट जो अमरीका से भारत के बाजारों में बेचा जाता था उसका भारत में लैंडिंग कॉस्ट ही 15,193 रुपये से लेकर 1,01,000 तक पड़ता था. इस तरह से भारत में कॉरोनरी स्टेंट को मूल्य नियंत्रण के तहत लेकर उसके दाम कम करने का अमरीकी व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा तथा वे चाहते हैं कि भारत सरकार इस कदम को वापस ले ले!

कॉरोनरी स्टेंट के बाद भारत सरकार ने घुटना बदलने के समय उपयोग में लाये जाने वाले नी-इम्प्लांट का मूल्य 16 अगस्त 2017 को करीब 70 फीसदी कम कर दिया है. उल्लेखनीय है कि भारत के नी-इम्प्लांट बाजार के 85 फीसदी से लेकर 90 फीसदी पर विदेशी कंपनियों का दबदबा रहा है. इस तरह से भारत सरकार द्वारा अपने देश में ईंलाज को सस्ते दाम में उपलब्ध कराने की कोशिश से अमरीकी कंपनियों के सीने पर सांप रेंगने लगे हैं. उन्हें भारतीय मरीजों से जो अकूत मुनाफा मिलता है उससे वे किसी तरह से समझौता नहीं करना चाहते हैं.

अमरीका के एडवांस मेडिकल टेकनालॉजी एसोसियेशन ने वहां के ट्रेड रिप्रेजेन्टेटिव्स को दिये गये ज्ञापन में कहा है कि इस तरह से भारत में एक नये प्रवृत्ति की शुरुआत हो रही है. आगे चलकर यदि दूसरे मेडिकल डिवाइस या इम्प्लांट पर भी मूल्य नियंत्रण लागू किया गया तो अमरीका से भारत प्रतिवर्ष इस तरह से उत्पाद जो करीब 700 मिलियन अमरीकी डॉलर के निर्यात होते हैं वे कम हो जायेंगे. इतना ही नहीं इस संगठन ने अपने ज्ञापन में आशंका व्यक्त की है कि भारत द्वारा अमरीका से आने वाले मेडिकल डिवाइस के मूल्यों को नियंत्रित किये जाने का असर इंडोनेशिया, बाग्लादेश तथा पाकिस्तान पर भी पड़ सकता है. चीन ने हाल ही में राष्ट्रीय मूल्य नीति जारी की है जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि इन उत्पादों के भारत में क्या दाम हैं उसे बताया जाये. जाहिर है कि अमरीका के एडवांस मेडिकल टेकनालॉजी एसोसियेशन को यह डर सता रहा है कि आने वाले समय में उसके द्वारा मेडिकल डिवाइस के क्षेत्र में जो मुनाफा कमाया जाता है उस पर पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव अन्य देशों तक फैल सकता है.

गौरतलब है कि ज्यादातर स्टेंट बनाने वाली विदेशी कंपनियां इन्हें बाजार में उपलब्ध नहीं कराती हैं तथा इन्हें भारत स्थित डिस्ट्रीब्यूटर के माध्यम से सीधे निजी तथी नैगम अस्पतालों को सप्लाई कर दिया जाता है. जहां पर इनके दाम 200 से 300 फीसदी बढ़ाकर मरीजों से वसूला जाता रहा है. कॉरोनरी स्टेंट का अधिकतम खुदरा मूल्य तय करने के पहले केन्द्र सरकार ने इस पर सर्वे कराया था. जिसके नतीजें चौकाने वाले निकले थे. एक विदेशी कंपनी एबॉट द्वारा जिस मूल्य पर कॉरोनरी स्टेंट को आयात किया जाता है उसमें 68 से 140 फीसदी का मुनाफा जोड़कर उसे डिस्ट्रीब्यूटर को सप्लाई कर दिया जाता था. जिसे मरीजों को 72 से 400 फीसदी मुनाफे पर बेच दिया जाता था. अंतिम रूप में विदेशों से स्टेंट को जिस दाम पर आयात किया जाता था उससे 294 से 740 फीसदी मुनाफे पर मरीजों को दिया जाता था. इसी तरह से बोस्टन साइंटिफिक कंपनी द्वारा अपने कॉरोनरी स्टेंट को 464 से 1200 फीसदी मुनाफे पर मरीजों को दिया जाता रहा है.

इस तरह से अमरीकी कॉर्पोरेट घरानों भारत जैसे एक आजाद देश की सरकार को चिकित्सा को कम दाम पर सुनिश्चित कराने की कोशिश में अड़ंगा लगाना चाहते हैं. क्या अमरीकी कॉर्पोरेट घरानों के इस जनविरोधी कदम का विरोध नहीं किया जाना चाहिये?

 

 

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