प्रलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन में जारी किया गया वक्तव्य–राजेन्द्र राजन, महासचिव

 

ऐतिहासिक एवं अभूतपूर्व रहा प्रलेस का चंडीगढ़ में फासीवादी विरोधी लेखकों का महाजमावड़ा। 20 राज्यों के 450 प्रतिभागियों ने उसमें जमकर भागीदारी दी और राष्ट्रवाद की खोल में साम्प्रदायिक फासीवादी चेहरे को वर्तमान समय का सबसे बड़ा खतरा घोषित किया।
इस राष्ट्रीय परिसंवाद ने उम्मीद जगाई और अंधेरे से उजाले की ओर बढ़ने का हौसला दिया।

देश की बहुलतावादी संस्कृति की हिफाजत के लिए प्रगतिशील लेखक संघ ( प्रलेस) के इस अभियान में पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी , सुप्रसिद्ध इतिहासकार हरबंस मुखिया, चमनलाल, अर्थशास्त्री अरुण कुमार, अली जावेद, राजनीतिक विज्ञानी मणीन्द्र नाथ ठाकुर, साहित्यकार अशोक वाजपेयी, प्रख्यात कवि सुरजीत पातर, चर्चित कवि राजेश जोशी, कुमार अम्बुज , खगेन्द्र ठाकुर, गौहर रजा, प्रभाकर चौबे, नथमल शर्मा, प्रेमचंद गांधी, सतीश कालसेकर, दीनू कश्यप, मोहन सिंह, अवतार सिंह सादिक (लंदन ) , सुबोध मालाकार, चौथीराम यादव, हेमलता माहेश्वर, विभूति नारायण राय, मूलचंद सोनकर, इरा भास्कर, सबा दीवान सरीखे दो दर्जन से ज्यादा लोगों ने महत्वपूर्ण बौद्धिक -वैचारिक योगदान दिया । वक्ताओं ने साझा संस्कृति की रक्षा के लिए लेखनी और भौतिक रूप दोनों रूपों से मुठभेड़ करने के लिए प्रलेस महासचिव के लिखित वक्तव्य का समर्थन दिया। खतरनाक दौर में हौसलापूर्ण ढंग से लड़ाई के लिए एकसाथ चलने की जरूरत पर बल दिया।
प्रलेस, पंजाब और पंजाब के साहित्यकारों एवं बुद्धिजीवियों ने अपनी अभूतपूर्व मेजबानी से सबों का दिल जीत लिया। डॉ सुखदेव सिंह, डॉ सरबजीत सिंह, डॉ गुरुनाम कंवर एवं उनके साथ पचास युवकों ने इस आयोजन को सफल बनाने में कोई कोर -कसर बाकी न छोड़ा। उन सबों को क्रांतिकारी सलाम।
चंडीगढ़ घोषणा पत्र’ में स्पष्ट लक्ष्य घोषित किया है कि फासीवादी राष्ट्रवाद के खूंख्वार चेहरे के पीछे छिपे वैश्विक और देशी कारपोरेट पूंजी की खतरनाक चाल को हम पराजित करने के लिए हर स्तर पर पूरे देश में सघन कार्यक्रम और संयुक्त मोर्चा निर्मित कर अभियान चलाएंगे। सत्ता संरक्षित साम्प्रदायिक फासीवादी शक्तियों के मुकाबले में कुर्बानी देने से पीछे नहीं रहेंगे। पाब्लो नेरुदा और पाश की परंपरा को मजबूत बनाएंगे।
कलमवीर लेखकों को भी घर ( मांद) से बाहर आकर साथ देने की अपील की गई है। सुख स्वार्थ में डूबे रहकर क्रांतिकारी बने रहने के दिवास्वप्न से वो सब बाहर निकले जो स्वयं को प्रगतिशील मानते हैं। जनवादी लेखक संघ ( जलेस)और जन संस्कृति मंच (जसम) की भागीदारी के प्रति आभार प्रकट करता हूँ।
प्रलेस के 82 वर्षों में आज सबसे बड़ा खतरा उपस्थित है । इसके खिलाफ पहली बार एकजुट होकर देशभर के लेखकों ने सांप्रदायिक शक्तियों को चुनौती को कबूल किया है।
हां हम लड़ेंगे साथी , लड़ेंगे।

 

राजेन्द्र राजन
राष्ट्रीय महासचिव ( प्रगतिशील लेखक संघ)

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