|| सुन रही हो श्यामली || आरती तिवारी की कविता -दस्तक में

आज प्रस्तुत है समूह की साथी *आरती तिवारी* की लंबी कविता. यह कविता *पचमढ़ी* पर केन्द्रित है और बीते बरसों में समाज और पर्यटन स्थलों के बदलते जाने की एक भावुक दास्तान.

पढ़ें और इस पर चर्चा ज़रूर करें.

*आरती तिवारी*

⭕ *दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले*

*|| सुन रही हो श्यामली ||*

तुम तो वही बेबाक बिंदास पारदर्शी लड़की हो न
जिसे खरी बात मुंह पर कह देने से
कोई रोक नहीं पाता था
और सलीके से कही तुम्हारी बात
खारिज़ न कर पाने का मलाल
तुम्हारी निंदा से गलाता था
तब तुम कितनी नाज़ुक सी
एक साँवले चाँद की फाँक हुआ करती थी
आज आँखें तुम्हारी प्रोफाइल पिक देख
खुद चकित सी निहारे जा रही
तुम्हारा अर्धवर्तुल-चाप से पूरे चाँद में बदल जाना

एक भरी-पूरी स्त्री सचमुच
एक पूरा चाँद ही होती है

सुनो श्यामली, तुम्हारे वो रेशमी लम्बे बालों के घनेरे साये
जो इनायत थे
जटामासी की जड़ों से होकर सतत बहते झरने के पानी के
शिकाकाई और रीठे के वो झाड़
जिन्हें छूकर गुजरीं हवाएँ
रेशमी लच्छियों सा कोमल स्पर्श देती थीं
जिन्हें तुम खुला छोड़ के बनाती थी भ्रम
सुरमई बादलों का
सिमटे हुए एक छोटे क्लचर में
मुंह चिढ़ा रहे हैं हम सबकी उम्र को

तुम नहीं जानतीं श्यामली
वो झरना अब अपनी फेनिल धारा
दूधिया न रह पाने का दुःख मनाते
दुबला हो चला है
उसकी धाराओं के साथ बह गईं
हमारी रुठने मान जाने की
कितनी ही रुलाइयाँ
अब अपनी ही रुलाई रोके नहला रहा
पर्यटकों के झुण्ड के झुण्ड
अब नहीं गाता कल-कल के उस नाद को
जिसे सुनते सुनते हम
उसके साथ साथ नहाया करते
भर-भर लेते थे उसका दूधिया पानी
अपने अंक में
कानों में फंसे इअर फोन
चीखकर बातें करते लोग
काँखता संगीत कर चुका विस्थापित
हमारे गाये फ़िल्मी गीत
तुम्हें क्या मालूम गुज़िश्ता सालों में
बह गया कितना पानी
बीफॉल से और बीडेम कितना सूख गया अंदर ही अंदर

सर्पीली सड़कों पर रुक
झाँकते ग्रीन वैली हम सब
इतिहास हो चुके
सतपुड़ा की रानी हमारी पचमढ़ी
अब नहीं रही मोहताज़ गर्मियों के मौसम की
कभी भी किसी भी मौसम में
कहीं से भी टपक पड़ने वाले सैलानी
गुलज़ार रखते हैं

हमारा छोटा सा बाज़ार
अब हम सबके घर, बन गए हैं होटल
और हर पहचाना चेहरा बन गया है बस होटल
हमारे अपने जब मैडम कहकर पुकारते हैं
एक चाबुक सा पड़ता है ज़ेहन में ये सम्बोधन
अब मुनिया, गुड़िया, बिट्टो, लाड़ो कोई नहीं कहता
किसी की बेटियों बहनों को
एक सहमी अजनबियत डराती है,बाज़ारों में
दीदी और बुआ की ज़गह मैडम और आंटी ने ली है
अब हम किसी के न रहे न कोई हमारा

तुम्हारा भी वो किराये का घर
अब एक भव्य होटल बन चुका
वही घर जिसमें तुम
चहका करती थीं भोर की गौरैया सी
तुम्हारे पिता के मन्त्रोच्चार और शंख ध्वनि से तुम्हारा मोहल्ला गूंजता था
जहाँ तुम्हारा भाई घर के सामने खेलता था कंचे
और कंचे के खेल देखने के बहाने
उसकी हमउम्र गोरी चिट्टी छोरियाँ
कनखियों से देखतीं तुम्हारे कान्हा को
जो उनमें से किसी की छोटी खींच
किसी को धौल जमा
तुम्हारी डाँट खाता था
अब वहाँ बिकता है,पैसों में आराम
तुम्हारा हवादार घर अब
वातानुकूलित होटल है
जिसमें पंखो के बिना ही
मचलती थी हरियाली में नहा कर आई हवा

सब कुछ बदल गया है श्यामली

खड़ी चढ़ाई के वो रास्ते जिनपे तुम
दौड़ के चढ़ जाती थीं
और सबसे पहले पहुँच मंदिर में घंटी बजाने की होड़ में
हमेशा अव्वल रहतीं थीं
महादेव, चौरागढ़ के वो पहाड़
जिनपे टिकी तुम एक खूबसूरत पेंटिंग सी लगती थी
और तुम्हारा मृदुल स्मित,खिले चेहरे पे
थकान का नामोनिशान तक नदारद पा
सैलानी मंत्रमुग्ध चकित भाव से
तुम्हे देखते रह जाते… और तुम
ये जा, वो जा दौड़ के धूपगढ़ की सबसे ऊंची चोटी पे पहुंच किसी झाड़ की नीचे झुकी शाखाओं पे
लटूमती मिलती.सबके भय को धता बता के
अब तूफानी रफ़्तार से दौड़ती गाड़ियाँ आड़ी तिरछी हो
सर्र से निकल जाती है
मोड़ों पर असावधानी से बैठे पर्यटक
औंधे औंधे जाते एक दूसरे पर
कितनी गाड़ियाँ कितने ड्राइवर
कितने गाइड कितने पर्यटक
भीड़ ही भीड़
कितने उजड़े कितने बसे
सुना है होटलों की भीड़ में मारामारी में
खो गए हैं आदमी
मालिक हैं, नौकर हैं बस
आदमी कोई नहीं कहीं नहीं

न छदामी लालाजी न जैनू भाई की
गरमागरम जलेबियाँ
न तोतू की पान की दुकान
जिसके पान से होंठ ही नहीं
मन तक रंग जाता था
न मुंशी जी की चूरन की पुड़िया
न काली बरौनी की लबदो
जिसे खाकर हम रोज़ डाँट भी खाते रहे
और चढ़ते रहे चढ़ाइयाँ
उतरते रहे घने जंगलों की पगडंडियों से
पहुँचते रहे झरनों के
शफ्फाफ़ पानी तक

अप्सरा-विहार में ऊँचे पहाड़ से
झरने में कूद तुम जलपरी सी तैरती तो
पर्यटक दांतों-तले उँगली दबा
तुम्हे कौतुहल से निहारा करते
तुम्हारे साथ एक दृढ़ विश्वाश लिपटा रहता
पैरहन की मानिंद और तुम डट के खड़ी रहती
सर्द हवाओं के ख़िलाफ़ पूरे जोशो-खरोश से
तुम हर वक़्त थामे रहती
उजाले का एक सिरा और तनिक सा अँधेरा होते ही मशाल सा थामे
उसे आगे रख चलती रहतीं
हम सदा सुरक्षित घर लौटा करते जंगल से
रीछ, भालू, शरारती बंदरों और नील गायों से बचके
अब आ गईं हैं बन्दरों की टोलियाँ
बाजार में,घरों में घुस रहीं धड़ल्ले से
नहीं बच पा रहे कच्चे पक्के घर
इनके आक्रमण से

होटल मालिकों का फेंका खाना खा खा
बन्दर बनमानुष से क़द्दावर और ढीठ हो चले
फूलकर कुप्पा हुए बन्दरों से डरती हैं
तुम्हारी और मेरी भतीजी चारु और मौली
स्कूल में भी बन्दर टिफिन छीन रहे
अब बच्चे अंदर हैं बाहर हैं बन्दर
कई बार जंगलों में खदेड़ी गई वानर सेना
बार बार लौटती है कौनसे राम किस सुग्रीव को सौंपेंगे इन्हें
कोई नहीं जानता

घरों में टीवी के सामने चिपके बच्चे
मोबाइल में आँखे गड़ाये
हर हलचल से बेखबर है
बाख़बर है बाज़ार
नए गेम नए डिवाइज सब नया
घरों में पहुँचाने को बेताब

झील में कितनी नावें थीं
जैजैवंती संजीवनी मल्हार भैरवी और मालकोश
याद हैं न उनके नाम
हम नाव ही कहते थे और अब
तुम्हारी और मेरी भतीजियां उन्हें बोट कहती हैं
कैसे हम
झील में पैसे उधार कर बोटिंग करके
मल्लाह की नज़र बचा,चुपके से भाग आया करते थे
हमारी कुंआरी गन्ध, सृष्टि की तरह लगती
हम पूरे झरनों पहाड़ों और मंदिरों के सत्व को
अपने साथ लिए फिरते
धूप और छाँह के गुदगुदे बिछौनों से
एकाकार हो जाते हमारे जिस्म और
कोई अड़चन,कोई खलल हमें न रोक पाता
पहाड़ों को जीतने से
तुम्हारे या मेरे घर आये मेहमान
हमारे साझा होते थे
हम दोनों गाइड बन सबको सैर कराते
वे हमें सतपुड़ा की रानियां कहते
सब्ज़ी पूरी बाँध हम खोजी राहगीरों से निकल पड़ते
अब कोक और चिप्स हैं
हरियाली के पहरेदार सो गए
लालच और लालसायें हो चलीं स्थूल
थकी हाँफती समृद्ध नई संस्कृति
उगाह रही दाम नींद और सपनों के
हमारे सपने अब अप्रासंगिक हो चले
कभी हमने भी चाहा था
हमारी चिकनी सड़कों पर
फर्राटे से दौड़ेंगी अनेक मोटरें
पर क्या ऐसा ही दृश्य था?
हमारे सपनों में
हम भी मोटर में बैठे कोक मुंह से लगाये चिप्स चबाते
उच्च रक्तचाप को गोलियों से नियंत्रित कर देख आये हैं एक ही दिन में
दस पॉइंट तुम्हें याद करते हुए
तुम्हारा दिया वो वचन भी
कि कभी नहीं बिछड़ेगा हमारा झुण्ड सखी

फिर कैसे छिन्न-भिन्न हो गया
हमारा झुण्ड… जैसे नीलगायों को
तितर-बितर कर दिया किसी ने
हाका करके
हम तरंगमयी लहरें क्यों कर विवश हो गईं
अलग-अलग प्रदेश अलग अलग परिवेश
अलग-अलग सभ्यताएँ हमे मानो किसी
बड़ी लहर की मानिंद पटक गईं
अलग-अलग तटों पे फिर से विकसित होने के
अभिशाप के साथ
अब हमे फिर से खिलना होगा/किसी अदि-पुष्प सा
एक नई सुरभि से सुवासित हो
… शायद हम दोबारा कभी मिल भी न सकें श्यामली
पर वचन दो हम स्वप्नों के आकाश में ही सही
आकाशगंगाओं से फिर मिलेंगे
फिर से हरियायेंगे हमारे झुण्ड
पहाड़ों के सिरों पे खनकेगी हमारी परिपक्व हंसी
उस अल्हड़ हंसी की याद में हम मनाएंगे स्मृतियों का उत्सव
इतिहास बनाने को
पहले जैसे ही.

✍? *आरती तिवारी*

⭕ *दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले*

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