आज करीब 100 सामाजिक कार्यकर्ता, मज़दूर ने प्रदर्शन विधान।सभा के सामने किया।

 

जन विरोधी कानून को प्रवर समिति में भेजना एक छलावा है, नीयत साफ है कि अभी भी वे एजेंडा को खुला रखना चाहती हैं, नही तो जन आक्रोश को देखते हुए विधेयक वापस ले लेती।

और अध्यादेश तो 4 नवंबर तक कानून है, इसे वापस लेने मांग की। क्योंकि अभी भी मजिस्ट्रट के अनुसंधान और प्रसंज्ञान का अधिकार लोक सेवक के मसली में तो अभी भी सरकार के पास है, अभी पत्रकार पर तलवार लटकी हुई है, जेल की सज़ा बाकी है।

पूर्ण रूप से इस अध्यादेश व विधेयक की मांग को लेकर प्रदर्शन किया और ग्रह मंत्री से शिष्टमंडल ने मुलाकात के लिए गया। जिसमे, रेणुका पामेचा, निखिल डे, सवाई सिंह, प्रो सलीम, महावीर व कुसुम saiwal थी, लेकिन गरज मंत्री नही मिले.

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दिनांक  25.10.2017

श्रीमती वसुंधरा राजे,

मुख्यमंत्री,

राजस्थान सरकार,जयपुर।

 

विषय –तुरन्त प्रभाव से दण्ड विधियां (राजस्थान संशोधन अध्यादेश, 2017) (संख्या 3) 2017 को वापस लिया जाये। अभी भी 6 हफ्ते के लिए जारी रहेगा।

दण्ड विधियां (राजस्थान सरकार को) विधान सभा में पूनः प्रस्ताव लेकर वापस लिया जाये, न कि प्रवर समिति में इस पर विचार हो।

 

महोदया,

बहुत अफसोस की बात है कि आपकी सरकार ने 7 सितम्बर 2017 को एक गैर लोकतांत्रिक अध्यादेश, दण्ड विधियां (राजस्थान संशोधन अध्यादेश, 2017) को जनता से चर्चा किये बगैर ऐसा  गैरलोकतांत्रिक कानून बनवा लिया। उद्देश्य तो सिर्फ एक था कि सिर्फ और सिर्फ लोक सेवकों को (साथ में जजो, मजिस्ट्रेट आदि) को बचाना। जिससे कि सभी लोक सेवक, सरपंच से मुख्यमंत्री पद तकव ग्राम सेवक से मुख्य सचिव के पद पर बैठे व्यक्तियों द्वारा किये गये अपराधों पर पर्दा डाला जा सके। चिन्ताजनक बात है कि लोक सेवकों व अन्य की करतूतों को छिपाने वाला इस कानून का आधारभी हास्यापद था, ईमानदार लोक सेवको को न्यायालय व पुलिस जांचों एवं प्रक्रियाओं से सुरक्षा प्रदान करना।

 

इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए इतनी झुझारू हो गई आपकी सरकार कि अध्यादेश में  कार्यपालिका व न्यायपालिका की बीच की सीमा को उल्लांघते हुये आपने दण्ड संहिता प्रक्रिया की धारा156(3) व धारा 190 को संशोधित कर न्यायपालिका की स्वतंत्रता को ध्वस्त कर दिया। न्यायपालिका की सबसे महत्वपूर्ण कडी एक मजिस्ट्रेट को, जांच के आदेश व प्रसंज्ञान के लेने के ही अधिकारछीन लिये, अगर मसला लोक सेवक का हो। मजिस्टेªट को आपकी सरकार की पूर्व मंजूरी का इंतजार करने का प्रावधान डाल दिया।

 

साथ ही आपने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 228 (ख) जोड़कर यह भी कह दिया कि कोई भी पत्रकार आदि किसी लोक सेवक, मजिस्टेªट, जिसके विरूद्ध कोई कार्यवाही लम्बित है का नाम, पता, फोटो, अन्य पहचान नहीं प्रकाशित कर सकते जब तक कि आपकी सरकार से उस मामले में अभियोजन की मंजूरी न दी जाये। भा.दं.सं. 228(ए), 35 वर्ष पहले बलात्कार व यौनिक हिंसा की शिकारपिडि़ता की पहचान को उजागर न करने को लेकर बनाया गया था। यह बिल्कुल समझ के बाहर हैं कि कैसे पीडि़त के लिए बना हुआ कानून एक अपराधी के संरक्षण के लिए बनाया जा सकता है।लेकिन सबसे अफसोस जनक बात यह रही कि आपने 2 साल की जैल व जुर्माना का प्रावधान डाल कर अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता का अधिकार को ही खत्म कर दिया।

 

ऐसा भयावह कानून इस देश में आप ले आई जो अभी भी लागू है। आपको ज्ञात है कि यह 6 हफ्ते तक, यानी 4 दिसम्बर 2017 तक लागू रहेगा। इसका मतलब अभी भी 4 दिसम्बर 2017 तक कोईभी मजिस्ट्रेट के सामने अगर लोक सेवक व अन्य का मामला आयेगा तो वह आप ही को जांच के आदेश व प्रसंज्ञान की मंजूरी के लिए पत्र लिखेगा। मजिस्ट्रेट के काम में कार्यपालिका का हस्तक्षेप एकदिन भी लागू नहीं होना चाहिए। ऐसा हस्तक्षेप गैर संवैधानिक हैं।

आपकी सरकार के प्रतिनिधियों ने लगातार इस कानून के बचाव के पक्ष में कहा है कि 73 प्रतिशत मामले जो इस्तगासा के जरिये दर्ज होते वे झूठे होते हैं। हम आपको याद दिलाना चाहते हैं कि पुलिसजांच अगर लचर हैं कथित अपराधी को बचाने के लिए हैं या अगर सम्पूर्ण साक्ष्य जांच में पुलिस न जुटा पाई इससे मामला झूठा नहीं पड जाता है। आपने यह आंकडे क्यों नहीं दिये कि कितने एफ.आर. के मसले में शिकायत कर्ता ने सम्बन्धित मजिस्ट्रेट के समक्ष एफ.आर. खुलवाने की याचिका लगाई और कितने मामले खोले गये। पुलिस द्वारा मामले में एफ.आर. लगा देना अंतिम जांच की कडी नहींहोती है। इस कानूनी बिन्दू से आप अच्छे से वाकिफ है।

जन आक्रोश के चलते आपने सही किया कि विधान सभा के पटल पर रखे विधेयक को पारित नहीं किया पर उसे विधान सभा की प्रवर समिती को भेजना अभी भी स्थापित करता हैं कि आपकीसरकार की नियत इस कानून को जीवित रखने में लगी हुई हैं। इस लिए हमारी मांग है कि आप वर्तमान विधान सभा सत्र में ही इस विधेयक को पूर्णतः वापस ले लिया जाये।

आज दिनांक 25 अक्टूबर 2017 जब हम विधान सभा पर प्रदर्शन करने आये है तो हम उम्मीद करते है कि आप इस प्रदेश में इस तरह के कानून को अब एक दिन के लिए भी लागू नहीं होने देगीं औरतुरन्त प्रभाव से अध्यादेश वापस लेकर मजिस्ट्रेट को उनका काम स्वतंत्र रूप से करने देंगी व पत्रकारों की अभिव्यक्ति की स्वंत्रता पर हमला नहीं होने देंगी। साथ ही प्रवर समीति में भेजा गया विधेयकको तुरन्त प्रभाव वापस से लेंगे।

अंत में हम आपको यह भी याद दिलाना चाहते हैं कि जनता को जेल भेजने की धमकी भरे कानून आप अब आगे ना लाये। 2014 में भी आपने सितम्बर माह में राजस्थान भूमि अधिग्रहण कानून लानेकी कोशिश की थी जिसमें आपने विरोधकर्ता किसान को 3 साल तक की सजा व सामाजिक कार्यकर्ता को 6 माह की जेल की सजा काटने वाला प्रावधान विधेयक में रखा था। लगातार लोगों केलोकतांत्रिक अधिकारों पर कुठाराघात करने की मंशा जो आपकी सरकार में स्पष्ट दिखाई दे रही है, हमारी गुजारिश है कि अगले 13 महिने में, जब तक आपकी सरकार है पुनः इस तरह के प्रावधानकोई भी कानून में न लाये जाये क्योंकि यह सामंती भारत नहीं है और न ही भारत का उपनिवेश हो रखा है, इस भारत में लोगों की सार्वभौमिकता संविधानिक अधिकारों के तहत सर्वोपरी है।

 

इस विश्वास से कि आप हमारी आव़ाज को प्रसंज्ञान लेते हुये हमारी मांगों को लागू करेंगे।

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