जब अशफाक उल्लाह ने कहा था, किसी मुसलमान को भी तो फांसी चढऩे दो :,जयंती पर विशेष

JAMEEL KHAN

Publish: Dec, 19 2016

पत्रिका से साभार

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आजादी की इस मतवाले सिपाही को अंग्रेजी हुकूमत ने काकोरी काण्ड के सिलसिले में 19 दिसम्बर, 1927 को फैजाबाद जेल में फांसी दे दी थी

फैजाबाद। काकोरी कांड के जरिए आजादी की शमा को धधकता लावा बनाने वाले अमर शहीद अशफाक उल्लाह खान को उनके एक शुभचिन्तक ने जेल से भागने की सलाह दी तो मुस्कराहट के साथ उनके अल्फाज थे, ‘भाई किसी मुसलमान को भी तो फांसी चढऩे दो। आजादी की इस मतवाले सिपाही को अंग्रेजी हुकूमत ने काकोरी काण्ड के सिलसिले में 19 दिसम्बर, 1927 को फैजाबाद जेल में फांसी दे दी थी। हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षधर अशफाक उल्लाह खान समय-समय पर इस दिशा में रचनात्मक कार्य भी करते रहते थे।

उनकी हार्दिक इच्छा थी कि क्रान्तिकारी गतिविधियों में हिन्दू-मुस्लिम नवयुवक सक्रिय एवं साझा भूमिका निभाएं। दिल्ली में गिरफ्तार कर लिए जाने के बाद काकोरी काण्ड के विशेष न्यायाधीश सैफ एनुद्दीन ने जब उन्हें समझाने की कोशिश की तो अशफाक उल्लाह ने जवाब दिया, इस मामले में मैं अकेला मुस्लिम हूं, इसलिए मेरी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। जेल में उनसे मिलने आए उनके एक शुभचिन्तक ने जेल से भागने की बात की तो उन्होंने दो टूक जवाब दिया था कि भाई किसी मुसलमान को भी तो फांसी चढऩे दो।

काकोरी काण्ड के नायक शहीद राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में उनके बारे में लिखा है, मेरे कुछ साथी अशफाक उल्लाह के मुसलमान होने की वजह से घृणा की दृष्टि से देखते थे। हिन्दू मुस्लिम झगड़ा होने पर सजातीय लोग खुल्लम खुल्ला गालियां देते थे। उन्हें काफिर के नाम से पुकारते थे, पर ऐसे लोगों के विचारों से सहमत हुए बगैर अपने पथ पर आगे
बढ़ते रहे। शहीद बिस्मिल ने लिखा है कि अशफाक सदैव हिन्दू-मुसलमानों को एक साथ रहकर काम करने के पक्षधर थे। अशफाक उल्लाह खान के क्रान्तिकारी आंदोलन में दिए सहयोग को अपनी एक उपलब्धि मानते हुए शहीद बिस्मिल ने लिखा है, हम दोनों के फांसी पर चढऩे से लोगों को एक संदेश मिलेगा, जो भाईचारे को बढ़ाते हुए देश की स्वतंत्रता और तरक्की के लिए काम करेंगे।

राष्ट्रीयता के प्रबल समर्थक शहीद अशफाक उल्लाह एक अच्छे शायर भी थे, वे हसरत वारसी के नाम से शायरी किया करते थे। उनकी शायरी में ओज और माधुर्य के साथ जनता में राष्ट्रीय भावना जागृत करने की अपूर्व शक्ति थी। उनकी शायरी से झलका है कि उनके दिल में गुलामी और सामाजिक वैमनस्यता को लेकर कितनी पीड़ा थी। अपनी भावनाओं को प्रकट
करते हुए अशफाक ने लिखा है कि ‘जमीं दुश्मन जमां दुश्मन, जो अपने थे पराए हैं, सुनोगे क्या दास्ता क्या तुम मेरे हाले परेशां की। ये झगड़े और बखेड़े भेंट कर आपस में मिल जाओ, ये तकरीके अबस है हिन्दू और मुसलमा की।

स्वतंत्रता के लिए आशावादी रहे इन क्रान्तिकारियों ने सदैव स्वतंत्रता के लिए दृढ़ इच्छा रखी। इनका मानना था कि ‘मरते विस्मिल, रोशन, लाहिड़ी, अशफाक अत्याचार से, होंगे सैकड़ों पैदा इनकी रूधिर की धार से। महान क्रान्तिकारी पं. राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खान, ठाकुर रोशन सिंह ने 19 दिसम्बर 1927 को देश के खातिर हंसते-हंसते फांसी का फन्दा चूम लिया था।

पं. राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जिला जेल में, अशफाक उल्लाह खान को फैजाबाद मण्डल जेल में और ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद जिला जेल में 19 दिसम्बर, 1927 को फांसी दी गई थी। 19 दिसम्बर, 1927 को फैजाबाद जेल में अशफाक उल्लाह को फांसी लगने से एक दिन पूर्व जेल वालों ने अन्तिम इच्छा जाननी चाही तो अशफाक ने रेशम के नए कपड़े और अच्छा सा इत्र मांगा, जेल वालों ने तुरन्त इसकी व्यवस्था कर दी थी।

फैजाबाद जेल स्थित फांसीघर जिसे अब शहीद कक्ष के नाम से जाना जाता है। शहीद की याद में फांसी दिए जाने के दिन 19 दिसम्बर को प्रेरणा के लिए कुछ कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं जिसमें प्रदेश भर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा उनके परिजन व राजनीतिक पार्टी के नेता, स्थानीय लोग, अधिकारी एवं छोटे-छोटे बच्चे आते हैं। शहीद की प्रतिमा पर अपने-अपने स्मरण सुनाते हैं और उनके गले में फूलमाला डालते हैं।

शहीद कक्ष के बाहर निवर्तमान सरकार ने काफी बड़ा गेट बनवाया था जिसका नाम पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के नाम से जाना जा रहा है जबकि उस गेट का नाम अमर शहीद अशफाक उल्लाह खान के नाम से होना चाहिए था।

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