घोड़ा और मनुष्य _शरद कोकास 

घोड़ा और मनुष्य _शरद कोकास 

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आज जैसा कद्दावर घोड़ा आप देखते हैं घोड़ा पहले वैसा नही था । लाखों साल पहले अपने प्रारंभिक काल में घोड़े का न केवल कद छोटा था बल्कि उसकी उंगलियाँ या जिन्हें हम घोड़े के खुर कहते हैं वह भी एक से अधिक थी।

इसका कारण यह था कि घोड़े सर्वप्रथम जंगलों में ही रहते थे जहाँ सूखे पत्तों से भरी ज़मीन पर दौड़ने के लिए उन्हें अधिक उँगलियों की ज़रूरत होती थी । फिर धीरे धीरे जंगल और पेड़ कम होते गए और मैदान बनते गए सो घोड़ों को मैदानों में आना पड़ा । लेकिन जैसे जैसे वे मैदान में आते गए उन्हें दौड़ने के लिए अधिक उँगलियों की आवश्यकता नहीं रह गई सो जीन्स में भी परिवर्तन हुए और अगली पीढ़ियों में उनकी उंगलियाँ कम होती गईं । जैसे पहलीं पीढ़ी में यह पांच थीं ,फिर चार हुई ,फिर तीन और अंत में दो रह गईं जिन्हें हम उसका खुर कहते हैं । इस तरह मैदानों में आने के बाद घोड़ा मनुष्य का साथी बना ।

 

इसी तरह घोड़े के कद में भी परिवर्तन हुआ और वह कद्दावर होता गया । यह सब विकासवाद के अंतर्गत ही घटित हुआ । घोड़े की और मनुष्य की हड्डियाँ खोजी जा चुकी हैं और उनसे उनके शरीर के आकार प्रकार में होने वाले परिवर्तन को दर्ज किया जा चुका है ।

लम्बी कविता पुरातत्ववेत्ता में ‘अपनी उंगलियाँ गँवा चुका एक घोड़ा’ इस पंक्ति में यही आशय है ।

*पुरातत्ववेत्ताओं की नज़र में*
*पसीने की हर बूँद इतिहास का आईना है*
*एक बया है जिसमें मूसलाधार बारिश में*
*मनुष्य के घर का इतिहास बचाती हुई*
*एक मछली जीवन – जल से बाहर आकर*
*मनुष्य को साँस लेना सिखाती हुई*
*और अपनी उँगलियाँ गँवा चुका एक घोड़ा*
*जंगल की ज़ंजीरें तुड़ाकर मैदान की ओर भागता*
*मनुष्य के पठार पर रहने का इतिहास*
*जिसकी पीठ पर सवार है*

*शरद कोकास*
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