अर्नेस्टो चे ग्वेरा : अप्रतिम क्रांतियोद्धा -शहादत दिवस

अर्नेस्टो चे ग्वेरा : अप्रतिम क्रांतियोद्धा

 

ओम  प्रकाश  कश्यप

 

 

 

विश्व के जिन गिने-चुने देशों में साम्यवाद आज भी अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए है, उनमें चीन, लाओस, वियतनाम, उत्तरी कोरिया के अलावा क्यूबा का नाम आता है. 26 जुलाई 1953 से दिसंबर 1956 तक चली क्यूबा जनक्रांति ने तानाशाह सम्राट फल्जेंसियो बतिस्ता को पदच्युत कर, फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में जनवादी सरकार स्थापित करने में सफलता प्राप्त की थी. उसके बाद ही 1961 में वह एक साम्यवादी देश बन सका. क्यूबा क्रांति में फिदेल ने एक वीर और दूरदर्शी सेनापति की भूमिका निभाई थी, जो अपने राष्ट्र की जनभावनाओं को समझते हुए शत्रु को परास्त करने की कुशल रणनीति बनाता तथा अंततः लोकोन्मुखी शासन-व्यवस्था द्वारा समाजार्थिक परिवर्तनों को गति प्रदान करता है. लेकिन क्यूबा समेत पूरे लातीनी अमेरिकी देशों में जनक्रांति का वातावरण तैयार करने, सेनापति कास्त्रो के कंधे से कंधा मिलाकर अग्रणी भूमिका निभाने, बाद में लोगों की अपेक्षा के अनुरूप परिवर्तनों को गति देने का जो अनूठा कार्य अर्नेस्तो चे ग्वेरा ने किया, उसका उदाहरण दुर्लभ है. चे की लोकप्रियता का इससे बड़ा प्रमाण भला और क्या हो सकता है कि जिस अमेरिकी साम्राज्यवाद से वह आजन्म जूझता रहा, उसी की कंपनियां चे की बेशुमार लोकप्रियता को भुनाने के लिए बनियान, अंडरवीयर, चश्मे आदि उपभोक्ता साम्रगी की बड़ी रेंज उसके नाम से बाजार में उतारती रहती हैं. चे ग्वेरा ग्राम्शी जैसा प्रतिभाशाली तो न था, किंतु उसको प्रसिद्धि फिदेल कास्त्रो से कहीं अधिक मिली. यही कारण है कि प्रसिद्ध ‘टाइम’ पत्रिका द्वारा चे को बीसवीं शताब्दी की दुनिया-भर की पचीस सबसे लोकप्रिय प्रतिभाओं में सम्मिलित किया गया है. बाकी प्रतिभाओं में अब्राहम लिंकन, महात्मा गांधी, नेलसन मंडेला आदि अनेक नेता सम्मिलित हैं.

उसका पूरा नाम था अर्नेस्तो चे ग्वेरा. लेकिन उसके चाहने वाले उसको केवल ‘चे’ नाम से पुकारते थे. अपनापन जताने के लिए बोले जाने वाले इस नन्हे से शब्द का अर्थ है—‘हमारा’, हमारा अपना. अत्यंत घनिष्टता और आत्मीयता से भरा है यह संबोधन. अपने साथियों में चे इसी नाम से ख्यात था. उसका जन्म 14 जून, 1928 को अर्जेंटीना के रोसारियो नामक स्थान पर हुआ था. पिता थे अर्नेस्टो ग्वेरा लिंच. मां का नाम था—सीलिया दे ला सेरना ये लोसा. कुछ विद्वानों के अनुसार अर्नेस्टो की वास्तविक जन्मतिथि 14 मई, 1928 थी. इस तथ्य को छिपाने के लिए कि विवाह के समय अर्नेस्टो की मां गर्भवती थी, उसके जन्म की तिथि को बाद में एक महीना आगे खिसका दिया गया था. चे अपने माता-पिता की पांच संतान में सबसे बड़ा था. माता-पिता दोनों का ही संबंध अर्जेंटीना के प्रतिष्ठित घरानों से था. पिता आइरिश मूल के थे, जबकि मां का संबंध स्पेन के नामी परिवार से था. उनका परिवार कभी अर्जेंटाइना के धनाढ्य परिवारों में गिना जाता था, लेकिन अर्नेस्टो के जन्म के समय उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर पड़ चुकी थी. तो भी उनके आदर्श तथा प्रतिबद्धताएं पूर्ववत थीं. अर्नेस्टो के पिता स्पेन की जनक्रांति के प्रबल समर्थक थे. क्रांतिकारी विचारधारा से ओतप्रोत परिवार में अर्नेस्टो को बचपन से ही गरीबों के प्रति हमदर्दी का संस्कार मिला. तीन चीजें मानो उसे उपहार में प्राप्त हुईं. पहली उसका उग्र, जिद्दी और चंचल स्वभाव, दूसरा दमे का रोग और तीसरी उत्कट जिजीविषा. अर्नेस्टो के पिता बेटे के उग्र स्वभाव पर गर्व जताते हुए कभी-कभी कह देते थे—‘लोग यह बात अच्छी तरह जान लें कि मेरे बेटे की शिराओं में आइरिश विद्रोही का लहू दौड़ता है.’ मां सीलिया स्त्री-स्वातंत्र्य और समाजवादी विचारधारा की समर्थक थी. अर्नेस्टो ने पिता से विद्रोही स्वर लिया और मां से समाजवादी, स्त्री-स्वातंत्र्यवादी प्रेरणाएं. लेकिन बचपन में जो कुछ सहा वह एकदम आसान नहीं था. मौत से संघर्ष की प्रेरणा उसको अपनी ही जिंदगी से मिली थी. शिशु अर्नेस्टो मात्र 40 दिन का था, जब उसको निमोनिया ने आ घेरा, जिससे वह मरते-मरते बचा. वह केवल दो वर्ष का था जब मई, 2 1930 को उसे दमा के पहले हमले का सामना करना पड़ा. अगले तीन वर्ष तो दमा मानो उसकी छाती पर सवार रहा. लगभग हर रोज दौरा, हर रोज मौत की ललकार सुनना, अपने जीवट के दम पर मौत को पछाड़ना. छापामार युद्ध का प्रारंभिक प्रशिक्षण उसको मानो मौत से मिला. माता-पिता अबोध अर्नेस्टो की हालत पर दुखी होते. पर बेबसी में कुछ कर न पाते थे. डा॓क्टरों की सलाह पर वे यहां से वहां यात्राएं करते. बार-बार स्थान बदलते. शायद कहीं पर बालक अर्नेस्टो को आराम मिले. लगातार उपचार कराते. एक के बाद एक स्थान बदलते हुए अंततः कुछ सफलता मिली. कोरडोबा नगर के पास एक छोटा कस्बा था, अल्टा ग्रेशिया. वहां की शुष्क जलवायु के बीच अर्नेस्टो को कुछ राहत मिली. माता-पिता की देखभाल और स्नेह-समर्पण भी काम आया. दमा पूरा शांत तो नहीं हुआ, पर उसका प्रकोप अवश्य घट गया. यही वह समय था जब उसको अपनी मां को निकटता से समझने का अवसर मिला. कमजोर होने के कारण उसके लिए पाठशाला जाना तो संभव नहीं था. मां ही उसको घर पर पढ़ाती थी. मां के अलावा और जो अर्नेस्टो की साथी बनीं, वे थीं पुस्तकें. घर में समाजवादी विचारधारा की पुस्तकें आती थीं. मां स्वयं विदुषी थी. पिता तो व्यापार के सिलसिले में अक्सर बाहर रहते थे. बेटे की छाती को सहलाते-सहलाते हुए मां सीलिया रात को उसके बिस्तर पर ही सो जाती थी. अर्नेस्टो ने अपने एकांत को पुस्तकों से समृद्ध करना आरंभ कर दिया. अल्टा ग्रेशिया की जलवायु अर्नेस्टो के स्वास्थ्य के लिए इतनी अनुकूल सिद्ध हुई कि उसके माता-पिता को उसको छोड़कर जाना संभव ही नहीं हो पाया. उसके बचपन का बड़ा हिस्सा उसी कस्बे में बीता. यहीं रहकर पिता ने अपने व्यापार को संभाला. मां ने स्वयं को अपने बच्चों की देखभाल के प्रति समर्पित कर अच्छी मां सिद्ध किया. अर्नेस्टो ने अपने भाई-बहनों के साथ यहां रहते हुए जो शांतिमय और स्नेह से भरपूर जीवन बिताया, वह उसके आगे सक्रिय जीवनकाल में कभी संभव न हो सका. अपने लक्ष्य को समर्पित चे ने निजी सुख के बारे में कभी सोचा भी नहीं.

बीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्ष अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद स्वास्थ्यकारी सिद्ध हुए. 1913 के आसपास प्रतिव्यक्ति आय के मामले में ऊपर से वह तेरहवें स्थान पर था. यहां तक कि फ्रांस भी उससे पीछे था. लेकिन असल चुनौती अभी बाकी थी. बीसवीं शताब्दी के दूसरे वर्ष में अर्जेंटाइना की अर्थव्यवस्था में अचानक भारी बदलाव आया. वहां की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार मांस और गेहूं का निर्यात था. वैश्विक मंदी ने अचानक इन उत्पादों के मूल्य को जमीन पर ला दिया. 1926 से 1932 के बीच इन उत्पादों के दाम गिरकर लगभग आधे रह गए. इसका परिणाम यह हुआ कि कृषि क्षेत्र में बेरोजगारी से घिर गया. इसका प्रभाव दूसरे उद्योगों पर भी पड़ा. उद्योग-धंधे तबाह होने लगे. बेरोजगारी के मारे लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन करने लगे. तब उन्हें एहसास हुआ कि शहरों में रहने वाले उनसे कितनी नफरत करते थे. अपने ही देश के लोग. जिनसे वे उम्मीद लगाए थे कि मंदी के दिनों में मदद करेंगे, संकट के समय काम आएंगे, सब अपने स्वार्थ में सिमटे हुए थे. अपनी चमक-दमक पर गर्व करने वाले अपने शहरी बंधु-बांधवों से गांव से आए लोगों को नफरत ही मिली. लेकिन नफरत भूख से तो बड़ी नहीं थी. मजबूरियों से भी बड़ी नहीं थी. रोजगार के लिए गांव छोड़कर शहर पहंुचे ये लोग आसपास के इलाकों में बसने लगे. कुछ ही वर्षों में उनकी बस्तियां बड़ी हो गईं. संख्याबल के आधार पर वे अच्छी ताकत बटोरने लगे. अर्नेस्टो उस समय मात्र पांच वर्ष का था. उसकी सेहत सुधरने लगी थी. अब वह आसपास के इलाकों में घूमने लगा था. कुछ दोस्त भी बना लिए थे. चोर-सिपाही का खेल, रेत के किले बनाकर तोड़ना, बचपन के उसके पसंदीदा खेलों में सम्मिलित थे. इसी बीच उसको एक नया शौक लगा, मोटरसाइकिल की सवारी का. पूरा इलाका पठारी था. अर्नेस्टो ऊंची-नीची चट्टानों पर मोटरसाइकिल को दौड़ाता हुआ निकल जाता. मानो शरीर की व्याधियों को चुनौती देना चाहता हो. परंतु मां ठहरी मां, वह मानने को तैयारी न थी कि अर्नेस्टो स्वस्थ हो चुका है; या उसमें शरीर की व्याधियों से जूझने, उनको चुनौती देने का अद्वितीय साहस है. वह बेटे को स्कूल भेजने से भी घबराती थी. मां के घने लाड़-प्यार के कारण अर्नेस्टो की प्रारंभिक पढ़ाई घर पर हुई. खुद मां ने उसको वर्णमाला सिखाई. अर्नेस्टो के बचपन को याद करते हुए 1967 में एक साक्षात्कार के दौरान मां सीलिया ने कहा था—

‘दमा के कारण अर्नेस्टो के लिए नियमित पाठशाला जाना संभव न था. अतः मैंने उसको घर पर ही वर्णमाला की शिक्षा दी. उसने केवल दूसरे और तीसरे ग्रेड की शिक्षा नियमित विद्यार्थी के रूप में प्राप्त की. पांचवे और छठे ग्रेड में भी वह यथासंभव स्कूल गया. उसके भाई-बहन स्कूल से मिले काम को उसकी का॓पी में उतार देते थे, जिसका वह घर पर अध्ययन करता था.’

मां की ओर से अर्नेस्टो को प्रारंभिक शिक्षा मिली तो उसके पिता ने उसको खेल, व्यायाम, स्पर्धा में टिके रहने के गुर समझाए. पिता ने ही उसको सिखाया कि किस प्रकार दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर शारीरिक दुर्बलताओं पर विजय पाना संभव है! इरादे मजबूत हों तो कैसे बड़े संकल्प आसानी से साधे जा सकते हैं! इसी से वह उन शारीरिक अक्षमताओं से उबर सकता है, जो उसकी जन्मजात बीमारी से उपजी हैं. यह पिता का ही संबल था कि दमे का शिकार चे बचपन में ही पिंग-पोंग, गोल्फ, तैराकी, पर्वतारोहण जैसे खेलों में पारंगत हो चुका था. दूसरों का नेतृत्व करने का गुण उसमें बचपन से ही था, जो लगातार निखर रहा था. माता-पिता से एक और संस्कार अर्नेस्टो को मिला, वह था, अच्छी पुस्तकें पढ़ने का. घर में क्रांति से जुड़ी पुस्तकें आती थीं. घर पर रहते हुए अर्नेस्टो उन्हें पढ़ता. उनमें व्यक्त विचारों पर सोचता. इसके फलस्वरूप 14 वर्ष की अवस्था तक वह सिंगमंड फ्रायड, अलेक्जेंड्र डूमा, राबर्ट फास्ट, जूलियस बर्ने की पुस्तकें पढ़ चुका था. रोमांचक साहित्य पढ़ने में उसको विशेष आनंद आता था. जेक लंडन की पुस्तकें उसको सर्वाधिक पसंद थीं. फ्रांसिसी कवि चाल्र्स बुडेलायर का प्रभाव भी उस पर पड़ा. उसने रूसो, कार्ल माक्र्स, पाब्लो नेरूदा, फ्रेड्रिको गारशिया लोर्का, अनातोले फ्रांस आदि क्रांतिकारी लेखकों की रचनाएं पढ़ी, जिन्होंने उसके भीतर बौद्धिकता का संचार किया. एल्टा ग्रेशिया में रहते हुए अर्नेस्टो को बहुत कुछ सीखने को मिला. एक तो यह विश्वास कि आत्मबल से किसी भी कमजोरी को दूर किया जा सकता है. दूसरे वहां रहते हुए वह समाज के विभिन्न वर्गों के संपर्क में आया था, जिससे उसको समाज को समझने का अवसर मिला था.

किशोरावस्था में अर्नेस्टो की मित्रमंडली असाधारणरूप से अलग थी. उसमें समाज के भिन्न वर्गों के किशोर सम्मिलित थे. जिनमें उसके पिता की भवन निर्माण कंपनी में काम करने वाले श्रमिकों के बच्चे, गरीब नौकरों के बच्चे, कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों के बच्चे भी सम्मिलित थे. अर्नेस्टो को सभी के साथ समान व्यवहार करने की प्रेरणा मिली थी, मां से—जो अमीर-गरीब सभी के साथ समान व्यवहार करना सिखाती थी. अर्नेस्टो का बचपन हंसी-खुशी बीत ही रहा था कि सहसा अल्टा ग्रेशिया के शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारियों ने अर्नेस्टो के माता-पिता से संपर्क कर, उसको स्कूल भेजने का निर्देश दिया. इसके फलस्वरूप अर्नेस्टो के विधिवत अध्ययन का मार्ग प्रशस्त हुआ. मार्च 1937 में अर्नेस्टो स्कूल स्तर पर भर्ती हुआ. उस समय उसकी वयस् अपनी कक्षा के अन्य विद्यार्थियों की औसत वय से लगभग एक वर्ष अधिक थी. लेकिन मां के सान्निध्य में रहकर वह विश्व-साहित्य का गहन अध्ययन कर चुका था. इसलिए कक्षा में वह अपने सहपाठियों पर प्रभावशाली सिद्ध हुआ. मां के प्रभाव से ही उसका साहित्यिक पुस्तकों के प्रति अनुराग बढ़ा जो आजीवन बना रहा. स्कूल के दौरान अर्नेस्टो को अपने गुरुजनों से प्रशंसा मिलती थी, मगर था वह सामान्य विद्यार्थी ही. अर्नेस्टो के तीसरे ग्रेड के अध्यापक ने उसको याद करते हुए लिखा था—‘वह दुर्भाग्य का मारा, प्रतिभाशाली लड़का था जो अपनी कक्षा में सबसे अलग नजर आता, किंतु उसकी नेतृत्व क्षमता खेल के मैदान में नजर आती थी.’

कक्षा में उसका सदैव यही प्रयत्न होता कि उसके सहपाठी और अध्यापक उस पर ध्यान दें, किसी भी तरह वह उन सबकी नजरों में चढ़ा रहे. नायकत्व की उत्कट चाहत ही कालांतर में एक क्रांतिकारी योद्धा के रूप में विकसित हुई. यह संभवतः उस हीनताग्रंथि से उबरने की कोशिश का परिणाम था, जो निरंतर बीमार रहने के कारण उपजी थी. जो हो, विद्यार्थी जीवन से ही उसके मन में दूसरों से आगे निकलने, स्पर्धा में बने रहने की भावना का जन्म हो चुका था. इसके लिए कई बार वह अजीबोगरीब हरकतें कर जाता, जैसे बोतल से इंक को पी जाना, चाक चबाना, खान में विस्फोट करना, सांड से जूझना. इन सब कारनामों से वह अपने साथियों तथा अध्यापकों के बीच निरंतर लोकप्रिय बनता जा रहा था. अर्नेस्टो की एक अध्यापिका एल्बा रोसी ओवीडो जेलिया ने उसको याद करते हुए लिखा है—

‘मुझे याद आता है कि बच्चे झुंड बनाकर स्कूल की चारदीवारी में उसके पीछे-पीछे घूमते थे. वह किसी ऊंचे पेड़ पर चढ़ जाता और उसके साथी पेड़ के इर्द-गिर्द घेरा बनाकर खड़े हो जाते. वह दौड़ता तो बाकी उसका पीछा करने लगते. वह स्वयं को उनका नेता सिद्ध कर चुका था. शायद उनका एक परिवार था, लेकिन सामान्य परिवारों से पूरी तरह भिन्न. उसके साथी जानते थे कि बातचीत में दूसरों को प्रभावित कैसे किया जाता है और वे इसमें पारंगत भी थे. वे कभी, कुछ भी अधूरा नहीं छोड़ते थे. वे दूसरों से एकदम भिन्न और इतने दंभी थे कि अपने बारे में कभी कुछ नहीं बताते थे, हालांकि उनमें सभी एक जैसे नहीं थे.’

अर्नेस्टो के परिवार के बारे में बाकी कुछ भी कहा जाए, दंभ वहां हरगिज नहीं था. उनका घर अतिथियों के लिए खुला था. कोई अपरिचित भी भोजन के समय वहां आता तो उसको ठहरने और भोजन के लिए आमंत्रित किया जाता. उनके परिवार को दूसरों के बीच ‘बोमियन’ कहा जाता था. मां सेलिया घर की छवि को बनाए रखने का पूरा ध्यान रखती. अल्टा गे्रशिया की वह पहली स्त्री थी जो अपनी कार स्वयं चलाती, खुले में धूम्रपान का हौसला रखती और ब्लाउज पहन कर बाहर निकल आती थी. वह अमीर-गरीब सबके साथ स्नेह-भाव से पेश आती, बौद्धिक बहसों में खुलकर हिस्सा ले सकती थी. अर्नेस्टो पर मां के इसी दबंग व्यक्तित्व का प्रभाव पड़ा था.

राजनीति में पदार्पण 
नेतृत्व का गुण अर्नेस्टो के बचपन में ही निखार ले चुका था. किशोरावस्था बीतते-बीतते वह स्वयं को प्रखर मेधावी, दूरद्रष्टा, सघन इच्छाशक्ति, नेतृत्वकुशल युवक के रूप में ढाल चुका था, जिसकी चिंताएं तथा सामाजिक सरोकार अपने समवयस्क युवकों की अपेक्षा कहीं बड़े थे. यही वे दिन थे जब उसका राजनीति की ओर रुझान बढ़ा. राजनीतिक घटनाक्रम उसमें सहायक सिद्ध हुआ. 1936 में स्पेन में सेना ने अचानक विद्रोह कर दिया. जनरल फ्रांसिस्को फ्रेंको के नेतृत्व में स्पेन की सेना का एक समूह निर्वाचित सरकार को उखाड़ फेंकने पर तुला था. इस विद्रोही समूह को जर्मनी के निरंकुश सम्राट एडोल्फ हिटलर तथा इटली के बेनिटो मुसोलिनी का समर्थन प्राप्त था. विद्रोह में निर्वाचित सरकार के मुखिया मेनुइल अजन को सत्ता गंवानी पड़ी. 1939 में सैन्य-शक्ति के बल पर जनरल फ्रांसिस्को फ्रेंको सत्ता पर काबिज हो गया. युद्ध के दौरान अर्नेस्टो ग्वेरा उन युवकों में था, जो मान रहे थे कि उसमें निर्वाचित सरकार की विजय होगी. दीवार पर स्पेन का नक्शा टांगकर वह रिपब्लिकन सरकार तथा विद्रोही फासिस्ट सेनापति की युद्धरत सेनाओं की स्थिति तथा उनकी रणनीति के बारे में अनुमान लगाता रहता था. मेनुइल अजन और उसके सहयोगी उसकी निगाह में ‘अच्छे बच्चे’ थे. अर्नेस्टो को उनकी विजय का पूरा भरोसा था. यही वे दिन थे, जब अर्नेस्टो को लगा कि अपने विचारों को मूत्र्तरूप देने के लिए राजनीति सबसे उपयुक्त माध्यम है. लेकिन युद्ध का परिणाम उसके सोच की विपरीत दिशा में जा रहा था. रिपब्लिकन सेनाएं कमजोर पड़ने लगी थीं. फासिस्ट सेनापति फ्रेंको को बाहर से मदद मिल रही थी.

रिपब्लिकन की हार की संभावना बढ़ते ही एल्टा ग्रेशिया और आसपास के क्षेत्रों में शरणार्थी बढ़ने लगे थे. अर्नेस्टो उन्हीं के मुंह से फासिस्ट सेनाओं के उत्पीड़न की सच्ची कहानियां सुनता. अर्नेस्टो का परिवार भी रिपब्लिकन सेनाओं का समर्थक था. इससे उसका रिपब्लिकन विचारधारा से अनुराग बढ़ने लगा. विजय प्राप्ति के साथ ही फासिस्ट समर्थक उद्योगपति और व्यापारी उद्योग-धंधों को अपने अधिपत्य में लेते जा रहे थे. उनके बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अर्नेस्टो के पिता ने एक फासिस्ट विरोधी संस्था की नींव रखी. संस्था का काम था, नाजियों का विरोध करने वाले नागरिकों से चंदा जुटाकर उसके माध्यम से जर्मनी द्वारा अर्जेंटीना में घुसपैठ के विरुद्ध युद्ध का संचालन करना. साथ ही अर्जेंटीना के विरुद्ध किसी भी प्रकार की जासूसी पर नजर रखना. अर्नेस्टो उस समय मात्र 11 वर्ष का था, मगर वह हमेशा अपने पिता के साथ रहता. पिता के साथ मिलकर वह संस्था की गतिविधियों के संचालन में भी हिस्सा लेता. इसके बावजूद फासिस्टों का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा था. स्पेन के अलावा जर्मनी, इटली आदि कई देश उसकी जद में आ चुके थे. मध्य यूरोप में अपना प्रभाव जमा लेने के बाद फासिस्टों की महत्त्वाकांक्षाएं आसमान छूने लगी थीं. अब वे पूरी दुनिया पर शासन करने का इरादा रखते थे. अर्जेंटीना उनका सबसे निकटवर्ती पड़ाव बन सकता था. अर्जेंटीना प्रकटरूप में दूसरे विश्वयुद्ध से अलग था, किंतु भीतर ही भीतर वह जर्मनी का समर्थन कर रहा था. उसको उम्मीद थी कि जर्मनी की विजय से उसको नए बाजार मिलेंगे. मगर युद्ध खिंचने के साथ अर्जेंटीना की समस्याएं भी बढ़ती जा रही थीं.

मार्च 1942 में अर्नेस्टो ने हाईस्कूल के लिए ‘का॓लेजियो नेशनल डीन फेन्स’ में प्रवेश प्राप्त कर लिया. उस समय उसकी वयस् मात्र 14 वर्ष थी. अल्टा ग्रेशिया में कोई स्कूल न होने के कारण उसको कोरडोवा तक बस से जाना पड़ता था, जो उसके निवासस्थान से लगभग 32 किलोमीटर दूर था. अर्नेस्टो की मां दमा-ग्रस्त बेटे को इतने लंबे सफर की अनुमति देने को तैयार नहीं थी. इसलिए 1943 के ग्रीष्म में अर्नेस्टो का पूरा परिवार कोरडोवा के लिए प्रस्थान कर गया. इस घटना के बाद अर्नेस्टो के परिवार में बिखराव का सिलसिला आरंभ हो गया. उसके माता-पिता के रिश्ते उतने सामान्य न थे. दोनों में अकसर तनाव बना रहता था. 1943 में दोनों ने संबंध-विच्छेद कर लिया. इसका एक कारण अर्नेस्टो के पिता की स्त्रियों के प्रति तीव्र आसक्ति भी था. वह अपने ‘व्यापार’ के सिलसिले में प्रायः बाहर रहते. इस दौरान उनके युवा महिलाओं से संबंध बनते ही रहते थे. धीरे-धीरे उनके परिवार का धन समाप्त होने लगा, जो आगे चलकर उनके लिए बहुत हानिकर सिद्ध हुआ. अर्नेस्टो के पिता का भवन-निर्माण का कारोबार अब भी सामान्य था. उन्होंने पहाड़ी पर एक बंगला खरीद लिया. उसमें भी उनका काफी धन खर्च हो गया. तो भी उसका परिवार अपने लंबे सामाजिक संबंध अब भी पहले की तरह निभाए जा रहा था. बाहर से जो मेहमान मिलने आते वे उनके घर की हालत देखकर दंग रह जाते थे. उनके घर कुर्सियां, स्टूल आदि पुस्तकों से दबे होते. परिवार का वातावरण खुला था. बच्चे बाहर से साइकिल पर चढ़कर आते और उसी तरह आवासकक्ष को पार कर धड़धड़ाते हुए भीतर घुस जाते थे. अर्नेस्टो अपने खाली समय का उपयोग पढ़ने, खेलने तथा मित्रों के साथ गपशप करने में बिताता. दमे का उसका रोग अब भी उसी प्रकार था. रग्वी उसके प्रिय खेलों में से था. कोरडोवो में रहते हुए अर्नेस्टो का संपर्क था॓मस ग्रेनांडो से हुआ. कुछ ही दिनों के बाद दोनों पारिवारिक दोस्त बन गए. मित्रों के अलावा युवा अर्नेस्टो की साथी थीं, साहित्यिक पुस्तकें. पाब्लो नेरुदा, जा॓न कीट्स, फेडरिको गार्शिया लोर्का की कविताएं, एमिल जोला, आंद्रे जीद, विलियम फाॅकनर के उपन्यास उसको सर्वाधिक प्रिय थे. इसी अवधि में उसने सिंगमड फ्रायड, अनातोले फ्रांस को पढ़ा और उनसे प्रभावित हुआ. उसका अध्ययन विशाल था, इसके बावजूद कक्षा में वह औसत नंबर ही ला पाता था. शायद इसके पीछे उसके अनेक गतिविधियों में उसकी हिस्सेदारी तथा वह छोटी-सी नौकरी भी थी जो उसके पिता के अनुसार उसने अपना समय बिताने के लिए की थी. इस बीच निडरता उसके स्वभाव का हिस्सा बन चुकी थी.

मित्रों के बीच अर्नेस्टो के कई उपनाम थे. कुछ साथी उसको ‘एल लोको’ कहते, जिसका अर्थ है—‘बाबरा’. कुछ अन्य दोस्त उसको चांचो(सुअर) भी कहते थे. अर्नेस्टो के इस विचित्र स्वभाव के बारे में उसके मित्र ग्रेनांडो ने लिखा है कि उसको थोड़ा खतरनाक दिखना भी पसंद था. नदी किनारे पहुंचकर अक्सर वह शेखी बघारता था कि वह कितनी देर तक गहरे जल में छिपकर रह सकता है. उसको अकसर यह कहते सुना जाता—‘इस रग्बी की कमीज को धोए हुए मुझे पचीस दिन बीच चुके हैं.’ उम्र के साथ जहां उसके दोस्तों की संख्या में वृद्धि हो रही थी, वहीं उसका राजनीति के प्रति रुझान भी विकसित हो रहा था. पर जो नहीं बदला, वह था उसका दमा का रोग, जिसके कारण वह अकसर परेशान रहता था. इसके बावजूद वह था दूसरों से एकदम अलग. किशोरावस्था में उसके विद्रोही लक्षण उसके स्वभाव से झलकने लगे थे. एक किवदंति के अनुसार अर्नेस्टो का मित्र एक बार सैन्य कार्रवाही का विरोध करते समय गिरफ्तार कर लिया गया. अर्नेस्टो उससे मिलने पुलिस स्टेशन पहुंचा तो ग्रेनांडो ने उसको विरोध-प्रदर्शन का नेतृत्व करने की सलाह दी. इसपर अर्नेस्टो ने गुस्से में कहा था—

‘कैसा प्रदर्शन, क्या सिर्फ पुलिस की गालियां और मार खाने के लिए….हरगिज नहीं! इस तरह का कोई भी कदम मैं उस समय तक नहीं उठाऊंगा, जब तक मेरे पास एक अदद बंदूक न हो.’

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