बस्तर में माओवादियों के खिलाफ ललकार रैली के बाद उठे सवाल

बस्तर में माओवादियों के खिलाफ ललकार रैली के बाद उठे सवाल

राजकुमार सोनी@CatchHindi
| 20 September 2016, 8:43 IST

माओवादियों के खिलाफ एक्शन ग्रुप फार नेशनल इंटेग्रिटी (अग्नि) की तरफ से बस्तर के जगदलपुर में निकाली गई ललकार रैली विवादों में घिर गई है. भारतीय पुलिस सेवा के अफसर आईजी शिवराम कल्लूरी और पुलिस अधीक्षक आरएन दास सहित अन्य पुलिस अफसरों के रैली में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने पर सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया जताई है.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला ने इसे आदिवासियों के खिलाफ एक सोची-समझी साजिश करार देते हुए कहा, ‘रैली माओवादियों के कदमों को उखाड़ फेंकने का मसूंबा नजर आने के बजाय पुलिसिया शक्ति का प्रदर्शन बनकर रह गई.’

आम आदमी पार्टी के संयोजक संकेत ठाकुर का आरोप है कि रैली में शामिल लोगों के वक्तव्यों को सुनकर यह लगा कि सरकार ने माओवादी समस्या का सामाजिक और राजनीतिक समाधान खोजने के बजाय हार मान ली है और पूरी सत्ता पुलिस को सौंप दी है.

आदिवासी नेत्री सोनी सोरी का कहना है कि माओवाद के खात्मे के नाम पर आईजी कल्लूरी जिस ढंग से खुद को प्रोजेक्ट कर रहे हैं उससे तो यही लगता है कि वे किसी राजनीतिक दल की टिकट पर चुनाव लडऩे की तैयारी में हैं.

यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि क्या आईजी और एसपी ने अखिल भारतीय सिविल सेवा आचरण अधिनियम का पालन करते हुए रैली में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है, जबकि शासकीय नियम किसी भी सरकारी व्यक्ति को धरना, प्रदर्शन और रैली में शामिल होने की अनुमति नहीं देता है.

माओवादी भगाओ-फोटो खिंचवाओ

इसी महीने 17 सितम्बर को जब माओवादियों के खिलाफ रैली निकली तो अग्नि के प्रमुख कर्ताधर्ता आनंद मोहन मिश्रा ने दावा किया कि इसमें बस्तर संभाग के सात जिलों के 65 समाज, महिलाओं और बच्चों के अलावा करीब 50 हजार से ज्यादा लोग शिरकत कर रहे हैं.

मिश्रा के इस दावे को किसी तराजू में तौलकर तो देखा नहीं जा सकता है, लेकिन यह सच है कि रैली में अच्छी-खासी भीड़ थी. स्कूली बच्चों के हाथों में नक्सलियों बस्तर छोड़ो जैसे स्लोगन की तख्तियां थीं. रैली में पारम्परिक वाद्य यंत्रों की गूंज तो सुनाई दी, युवाओं को रिझाने के लिए डीजे और आर्केस्ट्रा भी नजर आया.

आयोजकों ने रैली में शामिल होने वाले मोबाइल धारकों के लिए जगह-जगह सेल्फी पाइंट भी बनाया था. सेल्फी लेने वाले युवाओं से पुलिस के जवान यह कहते हुए भी नजर आए- माओवादियों को गांव से भगाओ और मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवाओ.

तो फिर पुलिस और फौज की क्या जरूरत?

रैली के दौरान वक्ताओं ने कहा कि बस्तर के लोग अमन-चैन से रहना चाहते हैं, लेकिन माओवादी इसमें खलल डालते हैं.

वक्ताओं ने ग्रामीणों को माओवादियों के गांव में आने पर उन्हें खाना-पानी न देने का आग्रह किया और कहा कि यदि अब कोई भी माओवादी उन्हें डराता-धमकाता है तो उसे पकड़कर पीटो और पुलिस के हवाले कर दो.

प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव ने वक्ताओं के इस इरादे को खतरनाक ठहराया है. सिंहदेव का कहना है कि वर्ष 2005 में भी जब सलवा-जुडूम प्रारंभ हुआ था तब स्थानीय पुलिस प्रशासन ने नागरिक समाज के हाथों में हथियार थमा दिया था. एक याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि माओवादियों से निपटने का काम पुलिस और सुरक्षाबलों का है.

स्थानीय प्रशासन अपनी कमजोरी छिपाने के लिए किसी भी नागरिक को मौत के मुंह में नहीं धकेल सकता. सिंहदेव का कहना है कि रैली में नागरिकों को माओवादियों से लड़ने-भिड़ने के लिए उकसाया गया है. यदि नागरिक को ही माओवादियों से लड़ना और भिड़ना है तो बस्तर में भारी-भरकम फौज और पुलिस की जरूरत ही क्या है.

सांसद-विधायकों ने किया किनारा

रैली में अफसर, व्यापारी, बच्चे और घरेलू महिलाएं तो नजर आयी, लेकिन कांग्रेस-भाजपा के सांसद और विधायक नदारत रहे. बस्तर से महेश गागड़ा और केदार कश्यप मंत्री सरकार में मंत्री है, लेकिन दोनों अनुपस्थित थे.

कांकेर के विधायक शंकर ध्रुव कहते हैं, ‘हर कोई चाहता है बस्तर से माओवाद का खात्मा हो, लेकिन इसे सैन्य तौर-तरीकों से खत्म नहीं किया जा सकता. जो पुलिसवाले आदिवासियों को माओवादी बताकर मौत के घाट उतार रहे हैं वे अपने आपको साफ-सुथरा बताने के लिए माओवादियों को भगाने का ड्रामा कर रहे हैं. मैं ड्रामे में शामिल नहीं हुआ.’

जगदलपुर से भाजपा के विधायक ने माओवादियों के खात्मे के लिए सरकारी प्रयास को अनुकरणीय ठहराया. उन्होंने बताया कि वे किसी जगह व्यस्त थे सो रैली में नहीं गए.

विधायक मोहन मरकाम ने कहा कि वे बस्तर पुलिस के तौर-तरीकों और हथकंडों से वाकिफ है, इसलिए रैली में जाना जरूरी नहीं समझा.

आदिवासी मसले पर चुप्पी

पूरी रैली में माओवादियों के खिलाफ तो खूब बातें की गई. बस्तर पुलिस के अनोखे प्रयास पर कसीदे भी पढ़े गए लेकिन यह बताने की कोशिश नहीं हुई कि आदिवासियों को माओवादी ठहराना कब बंद किया जाएगा?

सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार कहते हैं, ‘अग्नि की यह रैली. सोनी सोरी की तिरंगा यात्रा को जवाब देने के लिए निकाली गई थी. रैली में देशभक्ति गीतों और राष्ट्रवादी नारों के बीच यह बताने की कवायद की गई कि बस्तर की जनता माओवादियों से मुक्ति का मार्ग ढूंढ रही है, लेकिन माओवादियों से मुक्ति का मार्ग क्या हो सकता है इसका खुलासा किसी ने नहीं किया. बस सारे लोग मारो-पीटो-काटो जैसी बात ही करते रहे. किसी भी वक्ता ने यह नहीं कहा कि सरकार विकास के मसले पर लचर है, इसलिए माओवादी हावी हैं.’

एक भी वक्ता का फोकस इस बात को लेकर नहीं था कि जो आदिवासी बेकसूर होते हुए भी बस्तर की जेलों में बंद है उनकी रिहाई के लिए क्या किया जाएगा? रैली का एक साफ संदेश यह था कि आदिवासियों और गैर आदिवासियों के बीच संघर्ष को तेज करो.

पीयूसीएल के प्रदेश अध्यक्ष लाखन सिंह भी मानते हैं कि रैली में शामिल भीड़ आने वाले दिनों में एक खतरनाक शक्ल अख्तियार करेगी. अग्नि के लोगों ने घोषणा की है कि अब वे गांव-गांव जाकर लोगों से कहेंगे कि माओवादियों को भगाओ. एक बार फिर सलवा- जुडूम चेहरा बदलकर गांवों में घुसपैठ की तैयारी कर रहा है.
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