कौशिक जी छत्तीसगढ़ की राजनैतिक उपेक्षा से आहत थे और यहां के किसानों की बेहतरी के लिए सतत प्रयत्नशील रहे.

कौशिक जी छत्तीसगढ़ की राजनैतिक उपेक्षा से आहत थे और यहां के किसानों की बेहतरी के लिए सतत प्रयत्नशील रहे.

कौशिक जी छत्तीसगढ़ की राजनैतिक उपेक्षा से आहत थे और यहां के किसानों की बेहतरी के लिए सतत प्रयत्नशील रहे.

कौशिक जी  के मित्रो और  साथीयों ने उन्हें कुछ यों याद किया ।

 

 

 

5.10.2017

छत्तीसगढ़ के बडे समाजवादी जुझारू नेता पुरषोत्तम कौशिक को याद करते हुए समाजवादी आंदोलन के साथी आनन्द मिश्रा कहते है कि देश ने एक जननेता और कृषक मित्र खो दिया है.

24 सितंबर 1930 में जन्मे कौशिक जी अपने छात्र जीवन से ही समाजवादी मूल्यों की ओर आकर्षित हुए और समाजवादी नेता खूबचंद बघेल के साथ छत्तीसगढ़ की अस्मिता के आंदोलन में शरीक हो गये , खूबचंद बघेल प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की ओर से महासमुंद विधानसभा चुनाव विद्याचरण शुक्ल के खिलाफ लड़े और हार गए परंतु उन्होंने विद्याचरण शुक्ल के चुनाव को चुनौती दिया और उसमें सफल रहे विद्याचरण जी का चुनाव रद्द हो गया,1963 में खूबचंद बघेल कांग्रेस में शामिल हो गए तब कौशिक जी ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का नेतृत्व संभाला और लोहिया जी के अनुरोध पर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गए, विद्याचरण शुक्ल से खाली हुई सीट से पहली बार उपचुनाव लड़े और हार गए।1967 में कौशिक जी तत्कालीन राइस किंग श्री श्रीमाल जैन के खिलाफ चुनाव लड़े और हार गए परंतु उन्होंने 1972 में श्रीमाल जैन को हराकर पहली बार मध्यप्रदेश विधानसभा के सदस्य बने।

1973 में महासमुंद क्षेत्र में भयानक सूखा पड़ा उन्होंने मप्र सरकार पर दबाव डाला लेकिन किसानों को फौरी राहत दिलाने रामकृष्ण आश्रम के स्वामी आत्मानंद को कहा और आश्रम के सहयोग से किसानों को राहत शुरू किया यह छत्तीसगढ़ में बिना सरकारी सहायता के बड़े राहत कार्य का बड़ा उदाहरण बना बाद में सरकार का राहत कार्य खुला,1974 महासमुंद सहित छत्तीसगढ़ में फिर सूखा पड़ा, सरकार ने खरीद की सरकारी कीमत तय किया और किसानों से प्रति एकड़ लेव्ही तय कर दिया, चूंकि कीमत बाजार भाव से कम था इसलिए पुरषोत्तम कौशिक जी के नेतृत्व में आरंग को केन्द्र बनाकर लेव्ही नहीं देना तय हुआ।उस क्षेत्र के मजदूरों के साथ मिलकर यह तय किया गया कि सूखा क्षेत्र का धान वहीं रहेगा और उससे किसानों मजदूरों को राहत कार्य का भुगतान होगा,इस आंदोलन को विस्तार देते हुए रायपुर में छात्रों नवजवानों और मजदूरों का विशाल प्रदर्शन हुआ जिसमें कौशिक जी सहित सैकड़ों कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए थे, उन्हीं में छात्र नेता समाजवादी युवजन सभा के आनंद मिश्रा भी थे।

किसान नेता नंद कश्यप उन्हें याद करते हुए कहते है ,कि जेपी आंदोलन में कौशिक जी की सक्रिय भागीदारी रही।1977 में वे रायपुर से लोकसभा के लिए चुने गए और जनता सरकार में पर्यटन और उड्डयन मंत्री बने, उन्होंने पर्यटन को आम आदमी में बढ़ावा देने जनता होटल खोले ,1989 में वे दुर्ग लोकसभा सीट से लोकसभा के लिए चुने गए और सूचना प्रसारण मंत्री बने।
कौशिक जी छत्तीसगढ़ की राजनैतिक उपेक्षा से आहत थे और यहां के किसानों की बेहतरी के लिए सतत प्रयत्नशील रहे.

साहित्यकार और पत्रकार गिरिश पंकज कहते है, छत्तीसगढ़ में समाजवाद की परंपरा की आखिरी बड़ी कड़ी आज टूट गई,उनके साथ छत्तीसगढ़ में समाजवादी आंदोलन का एक युग मौन हो गया । जनता पार्टी के कार्यकाल में कौशिक जी नागरिक उड्डयन मंत्री बने थे । वे जीवन भर समाजवादी आंदोलन के अटूट हिस्से रहे। राजनीति में शुचिता क्या होती है, यह देखने के लिए हमारे बीच कौशिक जी जैसे बड़े नेता मौजूद थे । उन्होंने कभी समझौता नहीं किया वरना अनेक तथाकथित समाजवादियों की तरह वे भी मालामाल रहते लेकिन लोहिया जी के सच्चे अनुयायी होने के कारण वे अपनी मर्यादा से बाहर नही आए। उन्हें शत शत नमन।
कौशिक जी जब नागरिक उड्डयन मंत्री थे तब राजीव गांधी पायलट हुआ करते थे ।राजनीति से उनका कोई खास लेना देना नहीं था ।कौशिक जी जब रायपुर आते तो पायलेट राजीव गांधी हुआ करते थे । कौशिक जी ने तत्कालीन कलेक्टर अजीत जोगी से उन्होंने एक बार कहा था की राजीव गांधी को निर्देश दे रखा था कि राजीव गांधी का विशेष ख्याल रखें। यह हमारे बहुत खास है। कौशिक जी के सानिध्य में रहने का मुझे अनेक बार अवसर मिला।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल और नेता प्रतिपक्ष टी.एस. सिंहदेव ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा है कि स्व. पुरूषोत्तम लाल कौशिक ने जीवन भर किसानों, मजदूरों और आदिवासियों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक उत्थान के लिये खेतीहर संघ का गठन कर सेवायें प्रदान की है। वे सही मायने में छत्तीसगढ़ के माटी पुत्र थे।वे ठेठ किसान नेता, महान समाजसेवी, माटीपुत्र, किसानों-गरीबों के सच्चे हितैषी थे।उनके हृदय में छत्तीसगढ़ की मिट्टी और यहाँ के लोगो के प्रति सही मायने में बढ़ा लगाव था। स्व. कौशिक बहुत ही सरल स्वभाव के थे, राजनीति की समझ उनमें गजब की थी। सहकारी आंदोलन में रूचि रखने वाले स्व. कौशिक ने पिछड़ेपन के खिलाफ एक जन अभियान शुरू किया था, जिसे सदैव याद रखा जायेगा।

 

समाजवादी साथी डॉ  सुनीलम कहते है ,

अभी अभी व्हाट्स एप से विश्वनाथ कौशिक ,जो पुरुषोत्तम कौशिक जी के बड़े बेटे ने खबर दी कि कौशिक जी नहीं रहे ,मेरे लिए यह सदमा देने वाली घटना है ,कौशिकजी से मेरा संबंध उतना ही पुराना है जितना मेरा सार्वजनिक जीवन ,जब समाजवादियों के संपर्क में ग्वालियर में आया तभी कौशिक जी से संपर्क हुआ ,निजी रिश्ते बने ,इतने प्रगाढ़ कि जब वे सांसद बने तब उनके वी पी हाउस ,421 में उन्होंने मुझे रहने की व्यवस्था की।जॉर्ज साहेब के अत्यंत निकट होने के कारण जब भी वे दिल्ली में होते ,लगभग रोज मिलते ।मध्यप्रदेश में राइस किंग के नाम से विख्यात नेमी चन्द्र श्रीमाल से लेकर एक बार वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विद्या चरण शुक्ला को हराने वाले वरिष्ठतम समाजवादी नेता पुरुषोत्तम कौशिक जी ,उड्डयन मंत्री बने लेकिन उनमें कोई परिवर्तन नहीं आया ,इन दिनों छत्तीसगढ़ के महासमुंद्र जिले में बेटे के साथ रहते थे ज्यादातर समय खेती में बिताते थे,कभी 2 रायपुर कार्यक्रमो में भी शामिल होते थे।कौशक जी जैसे ईमानदारी से राजनीति करने वाले मैंने बहुत कम देखे हैं।जिन्होंने चंद्रशेखर जी के मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बनने का प्रस्ताव मेरे सामने अस्वीकार कर दिया था।एक ही कारण दिया वी पी सिंह जी के नाम से जीतकर आये है,उनको नहीं छोड़ेंगे ,पार्टी नहीं तोड़ेंगे।
कुछ वर्ष पहले छत्तीसगढ़ के समाजवादियों ने समाजवादी समागम आयोजित कर उन्हें सम्मानित किया था ,उसके बाद कई बार बात हुए लेकिन मुलाकात नहीं हो सकी,जब भी बात होती एक ही बात कहते ,समाजवादियों के एकजुट होने की कुछ संभावना बन रही है क्या? जीवन में बहुत प्रस्ताव आये पर जिस समाजवादी विचार से सार्वजनिक जीवन शुरू किया ,उसी से अंत किया
कौशिक जी की मौत से समाजवादी आंदोलन की अपूर्णीय नुक्सान हुआ है ,जिसकी भरपाई कभी नहीं जी जा सकेगी,

आप नेता संकेत ठाकुर उन्हें याद करते हुए  कह्ते है कि ,श्री पुरुषोत्तम कौशिक मेरे पिता तुल्य थे अभी कुछ दिनों पूर्व ही रामकृष्ण अस्पताल में उनसे मुलाकात हुई थी ।

बेहद अशक्त हो गये थे लेकिन फीकी मुस्कान के साथ बोले अच्छा हुआ इस बहाने तुम मिलने तो आते हो ।

वे बचपन से मेरे आदर्श रहे ।
दरअसल मेरे राजनैतिक जीवन की शुरुवात 1977 में कौशिक बाबूजी के चुनाव प्रचार हुई थी ।
तब हम छोटे-छोटे स्कूली बच्चे नारा लगाते थे –
बछरू लड़े अमेठी से, गैया लड़े बरेली से,
सांड़ लड़े कहाँ से रे भैया ? कौशिक भैया, कौशिक भैया

3 सितम्बर को जब मिला तो उनसे किसान आंदोलन को लेकर चर्चा होती रही, हमेशा की तरह बोले किसानों के लिये लड़ना कभी मत छोड़ना ..

आज फिर लगा, बाबूजी ने एक बार फिर भौतिक जीवन में साथ छोड़ दिया…..

 

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