| सीलमपुर की लड़कियां | दस्तक में आज प्रस्तुत

✍?  आर चेतन क्रांति

दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले

 

सीलमपुर की लड़कियां `विटी´ हो गईं
लेकिन इससे पहले वे बूढ़ी हुई थीं
जन्म से लेकर पंद्रह साल की उम्र तक
उन्होंने सारा परिश्रम बूढ़ा होने के लिए किया
पद्रह साला बुढ़ापा
जिसके सामने साठ साला बुढ़ापे की वासना
विनम्र होकर झुक जाती थी
और जुग-जुग जियो का जाप करने लगती थी

खुर्राट बुढ़िया
पचपन साल की उम्र में आकर लेस्बियन हुई!
यह डाक्टर मनमोहन सिंह और एम टीवी के उदय से पहले की बात है
तब उन लड़कियों के लिए न देस देश था
न काल-काल
ये दोनों
दो कूल्हे थे
दो गाल
और छातियां
बदन और वक्त की हर हरकत
यहां आकर मांस के
एक लोथड़े में बदल जाती थी
और बंदर के बच्चे की तरह
एक तरफ लटक जाती थी

यह तब की बात है जब हौजखास से दिलशाद
गार्डन जाने वाली
बस का कंडक्टर
सीलमपुर में आकर रेजगारी गिनने लगता था

फिर वक्त ने करवट बदली
सुष्मिता सेन मिस यूनिवर्स बनीं
और ऐश्वर्य राय मिस वर्ल्ड
और अंजलि कपूर जो पेशे से वकील थी
किसी पत्रिका में अपने अर्धनग्न चित्र छपने को दे आई
और सीलमपुर
‘शाहादरा की बेटियों के गालों
कूल्हों और छातियों पर लटके मांस के लोथड़े
सप्राण हो उठे
वे कबूतरों की तरह फड़फड़ाने लगे
पंद्रह साला इन लड़कियों की
हजार साला पोपली आत्माएं
अनजाने कंपनों
अनजानी आवाजों और अनजानी तस्वीरों से भर उठीं
और मेरी ये बेडौल पीठ वाली बहनें
बुजुर्ग वासना की विनम्रता से
घर की दीवारों से और गलियों-चौबारों से
एक साथ तटस्थ हो गई
जहां उनसे मुस्कुराने की उम्मीद थी
वहां वे स्तब्ध होने लगीं
जहां उनसे मेहनत की उम्मीद थी
वहां वे यातना कमाने लगीं
जहां उनसे बोलने की उम्मीद थी
वहां से सिर्फ अकुलाने लगीं.
उनके मन के भीतर दरअसल
एक कुतुबमीनार निर्माणाधीन थी
उनके और उनके माहौल के बीच
एक समतल मैदान निकल रहा था
जहां चौबीसों घंटे खटखट हुआ करती थी.

यह उन दिनों की बात है
जब अनिवासी भारतीयों ने
अपनी गोरी प्रेमिकाओं के ऊपर
हिंदुस्तानी दुलहिनों को तरजीह देना शुरू किया था.
और बड़े-बड़े नौकरशाहों और नेताओं की बेटियों ने
अंग्रेजी पत्रकारों को चुपके से बताया था
कि एक दिन वे किसी अनिवासी के साथ उड़ जाएंगी
क्योंकि कैरियर के लिए यह जरूरी था
कैरियर जो आजादी था

उन्हीं दिनों यह हुआ कि
सीलमपुर के जो लड़के
प्रिया सिनेमा पर खड़े
युद्ध की प्रतीक्षा कर रहे थे
वहां की सौन्दर्यातीत उदासीनता से
बिना लड़े ही पस्त हो गए
चौराहों पर लगी मूर्तियों की तरह
समय उन्हें भीतर से चाट गया
और वे वापसी की बसों में चढ़ लिये
उनके चेहरे एक खूंखार तेज से तप रहे थे
वे साकार चाकू थे वे साकार शिश्न थे
सीलमपुर उन्हें जज्ब नहीं कर पाएगा
वे सोचते आ रहे थे
उन्हें उन मीनारों के बारे में पता नहीं था
जो लड़कियों की टांगों में
तराश दी गई थीं.
और उस मैदान के बारे में
जो उन लड़कियों
और उनके समय के बीच
जाने कहां से निकल आया था
इसलिए जब उनका पांव
उस जमीन पर पड़ा
जिसे उनका स्पर्श पाते ही
धसक जाना चाहिए था
वे ठगे से रह गए
और लड़कियां हंस रही थीं
वे जाने कहां की बस का इंतजार कर रही थीं
और पता नहीं लगने दे रही थीं
कि वे इंतजार कर रही हैं.

 

*|| अगर तुम हिंदी के साहित्यकार हो ||*

तुम अगर हिंदी के साहित्यकार हो
तो प्रसन्नता का बज्जाजखाना खोलने से पहले
तुमको सोचना चाहिए।
प्रसन्नता एक वस्तु है
जिसका व्यापार इतना आसान है
कि अब अंतर्राष्ट्रीय हो चला है
दुख को हांका जा रहा है
किनारों पर अंधेरे में
कि वह शोध का विषय लगने लगे

एक द्वीप है जिस पर तुम बैठे हो एकाकी
और आसपास सस्ती खुशियों का समंदर ठाठे मार रहा है
सर्कस की फ्लडलाइटें कभी कभार तुम्हारे उपर से गुजर जातीं हैं
तुम उन्हें दिखते हो
अपनी कुडली में फंसे
पानी के विषहीन सांप की तरह
दिलचस्प और प्राचीन

तुम एक ऐसे देश में हो
जिसने अपने आराध्यों से काम लेना सीख लिया है
मूर्तियों को उसने भीतर से खुरचा, गणेश जी को गुल्लक कर दिया
और पोथियों को बटुआ

एक देश
पवित्रता के छिद्रहीन परकोटे में
जिसकी रातें इतनी गलत गुजरीं
कि उसने सब कुछ को पटक देना चाहा
पर पटके सिर्फ कूल्हे
और एक पूरी फौज खड़ी कर दी जो अगली एक सदी
सिर्फ नाचने वाली है
यह प्रतिशोध में खेलता हुआ नाच है
जिसका ग्रंथों और नसीहतों पर बहुत कुछ लेना निकलता है
और जहां तक तुम सफल थे वहां तक तुम पर भी
तुम अगर हिंदी में पड़े हो और साहित्यकार भी हो
तो तुम्हें अपने शत्रु को पहचान लेना होगा
हो सकता है वह तुम्हारे घर ही में हो
कोई बेटा तुम्हारा,बीवी या बेटी
पड़ौस में तो वे रहने ही आ गए हैं
शाम के झुटपुटे में छत पर तुम्हें
इतनी मनोरंजक हैरानी में भला और कौन देखेगा।

तुम अगर हिंदी के साहित्यकार हो
तो अब तुम्हें एक नाच का
और कुछ ऐसी नवोन्मेषकारी गालियों का आविष्कार करना होगा
जो उस त्वचा को भी चीर सकें जिसको सब तत्व उपलब्ध रहे
तुम्हें अंग्रेजी के साॅरी और थैंक्यू का जवाब ढूंढ़ना होगा
कि जो तुम्हारे क्रोध से बचकर जाते हुए आदमी को वापस आने पर मजबूर कर दे
और वह खड़ा होकर तुम्हें फिर से समझने की कोशिश करे
तुम्हें मालूम करना होगा
कि लाल किले में बंद खूंखार तलवारों से
अब उनके बच्चे भी क्यों नहीं डरते
तुम्हें उन डाकुओं और लुटेरों को वापस बुलाना होगा
जिन्होंने सदियों तक सुखियों के जोश को बाड़े भीतर रखा
उनकी तनमनरंजक हिंसा को नाथा
और दुनिया को बचाया
तुम्हें अच्छाई के लिहाफ को उधेड़कर देखना होगा
कि सींग वाले पिस्सुओं की यह फौज कहां पल रही है
तुमको इस लोभ से निकलना होगा
कि पुरस्कार समिति

तुम्हारे नमस्कार,नमोनम, कृप्या, कृपा करें, क्षमा चाहता हूं और
जीने दें बराय मेहरबानी को भी गिनेगी
जब गिनने बैठेगी तुम्हारी कामयाबियों को
तुम्हें अपनी कामयाबियों से छुटकारा पाना होगा
क्योंकि उनके बावजूद तुमको हास्यास्पद समझ लिया गया है
हालांकि कहा नहीं गया
क्योंकि संस्थापक की बीवी को भदेस नहीं जमता
वह नहीं चाहती कि आहतकारी कुछ सीधे कहा जाए
क्योंकि तुम्हारे अहंकार से ज्यादा
गरज उसे तुम्हारे अस्तित्व के खात्मे से है।

 

*|| शाम को सिंगार करने वाली औरतें ||*

उन्हें बताया गया कि वे वेश्याएं नहीं विवाहित हैं
सो दोपहर बाद वे पूरे हक़ से सिंगार करने बैठ जातीं

उन्हें यह भी कहा गया कि वे नौकरानियां नहीं
घर की मालकिन हैं
सो सजकर अपनी पूरी सामर्थ्य से
वे रसोई में कल से अच्छी सब्जी आज बनातीं

उन्हें कहा गया
कि यहाँ कोई उन्हें देखकर पैसे नहीं फेंकेगा
तो बेखटके आकर वे छज्जों पर जम जातीं

और इंतिजार करतीं
उनका
जिनके नाम पर वह घर था जिसमें वे रहती थीं
जिनके पास वे पैसे थे जिन्हें वे खर्च करती थीं
जिनके वे बच्चे थे जिन्हें वे पैदा करती
और पालती थीं

वे जब नुक्कड़ पर झूमते दिखते
लहराकर वे दरवाजा खोलतीं
और पूरे होशोहवाश में बिस्तर पर गिर कर बेसुध हो जातीं

शाम को सिंगार करने वाली औरतें
घर से ज्यादा दूर नहीं ले जायी जाती थीं
सो वे नहीं जान पाती थीं
कि वेश्याओं के मोहल्ले में भी यह सब
लगभग ऐसे ही होता है ।

✍? *आर चेतन क्रांति*

*दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले*

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