आखिरकार नियोगी के सपनों का विसर्जन क्यों? –उत्तम कुमार, संपादक, दक्षिण कोसल

आज छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा समन्वय समिति के साथ कई उप हिस्सों में अलग-अलग लोगों द्वारा संचालित है लेकिन फिर भी दूर-दूर से जो लोग आते हैं वे नि:सन्देह वर्तमान नेता या मुखिया के कारण नहीं बल्कि कामरेड शंकर गुहा नियोगी के कारण ही आते हैं। पिछले 26 साल से हजारों लोग एक ऐसे व्यक्ति को श्रद्धांजलि देने आते है जो उनके लिये तो अब कोई करिश्मा नही कर सकता लेकिन आस आज भी बरकरार है। अघोषित आपातकाल ने नौजवानों की पत्रकारिता और राजनीतिक सोच ही बदल कर रख दी है लेकिन 70 के दशक के आपातकाल के समय या बाद में पैदा हुए लोगों ने इन 26 सालों में इस तरह का ऐसा कोई बड़ा घटनाक्रम वाला राजनैतिक दौर नही देखा है। आजादी के इस फासीवादी दौर में केवल कहानी सुनते रहे बाद का जो परिवर्तन था, वह यह कि पहले नोटबंदी, जीएसटी और धार्मिक अंधविश्वास को बढ़ावा देते हुए फासीवाद। आज नौजवानों को इसी ने सबसे ज्यादा जकडक़र रखा है।इस दौर में देश के अलग-अलग हिस्सों में बहुत सी घटनायें हुई लेकिन परिवर्तन लाने की हद तक कोई बहुत बड़ा आन्दोलन नही हुआ। सभी जनसंगठनें अपने-अपने क्षेत्र में अपने-अपने स्तर पर संघर्ष करती रहीं। आज का नौजवान कहीं न कहीं आपातकाल के दौर की तरह झंडे लिए मुट्ठी बांधे बदलाव के प्रहसन करते दिखते हैं।

लगभग दो दशकों के बाद सारे कसमों को तोडक़र श्रमिक नेता स्व. शंकर गुहा नियोगी की अस्थियों को विसर्जित कर दिया गया था l उनके परिवार व असंख्य लोगों ने दल्ली-राजहरा स्थित छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के कार्यालय में सुरक्षित रखे गए अस्थियों को जांजगीर जिले की शिवरीनारायण स्थित महानदी, शिवनाथ व जोंक नदियों के त्रिवेणी संगम में प्रवाहित कर दिया था । इस विसर्जन के बाद किसी ने भी उन कसमों को याद नहीं किया, जिसके एवज में नियोगी की अस्थियों को जिद के साथ रखा गया था। क्या हम ये समझ ले कि वास्तव में अस्थियों के साथ उनके सपनों का विसर्जन कर दिया गया?

18 वर्षों के बाद नियोगी की अस्थियां 24 मार्च 2010 को छत्तीसगढ़ के जांजगीर जिले में स्थित शिवरीनारायण मंदिर के पास महानदी, शिवनाथ व जोंक नदी के त्रिवेणी संगम में विसर्जित कर दिया गया था। इस विसर्जन कार्यक्रम में उनकी पत्नी आशा गुहा नियोगी, उनके दो पुत्री, पुत्र, पश्चित बंगाल से उनके रिश्तेदार, छत्तीसगढ़ से बालचंद कछवाहा, जनकलाल ठाकुर सहित अनेक गणमान्य नागरिक मौजूद थे। यह विसर्जन कार्यक्रम दसियों गाडिय़ों के काफिलों के रूप में दल्ली-राजहरा, राजनांदगांव, दुर्ग, भिलाई, रायपुर से होते हुए बिलासपुर के रास्ते जांजगीर के शिवरीनारायण में पहुंचकर अस्थियां नदी में प्रवाहित कर दिया गया था।

इस विसर्जन ने कई सवालों को जन्म दिया। यह कि उनकी हत्या के बाद जो कसम खाई गई थी, उसका क्या हुआ? क्या उनके हत्यारों को सजा हो गई? क्या मजदूरों की लड़ाई जिन मांगों को लेकर लड़ी गई थी वह सब पूरी हो गई? अब जब अस्थियों का विसर्जन कर दिया गया है, तब सवाल क्यों नहीं उठाया गया कि उन लिए गए कसमों के पूरा होने से पहले क्यों 18 वर्षों के बाद उनके अस्थियों को विसर्जित किया गया? इस प्रकार विवादों में फंसा जवाबदेह संगठन छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा नेताओं की गले की हड्डी आश्चर्यजनक ढंग से निकल गई।

अब हम उन परिस्थितियों पर गौर करेंगे जिसके कारण यह अस्थि विसर्जन कसम पूरी होने के पहले पूरी कर ली गई थी। हत्या के बाद उनका पूरा परिवार हासिए में आ गया था। मोर्चा ने आहिस्ते-आहिस्ते नियोगी के नाम का उपयोग कर परिवार से सहयोग का नाटक रचा। फिर आंदोलन से दूरी बना लिया। रही-सही प्रतिष्ठा को विधानसभा चुनाव व पालिका चुनाव में लगा दिया था। अब मुक्ति गुहा नियोगी को कांग्रेस पार्टी ने प्रदेश महासचिव का पद भी दे दिया है। इसके ठीक विपरीत जिला प्रशासन जिसकी आंख की किरकिरी नियोगी बना रहता था उन्हें जेलों में ठूंस देती थी उनके गतिविधियों पर खुफिया नजर रखी जाती थी उल्टे हत्या के बाद उनकी बड़ी पुत्री क्रांति गुहा नियोगी को सरकारी नौकरी में शिक्षिका नियुक्त कर दिया। यहां यह गौरतलब है कि नियोगी किसी सरकारी व प्रतिष्ठित पद पर कार्यरत नहीं थे।

न ही सरकार की नजर में स्वतंत्रता संग्राम सिपाही थे। फिर भी उनकी बड़ी पुत्री को सरकारी नौकरी दिया गया। यह सब आंदोलनकारी श्रमिकों के उग्र तेवर को शांत करने की कोशिश थी। उनके पुत्र जीत गुहा नियोगी जो एक लंबे समय से एक दीगर जनसंगठन जन मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहे थे। उन्हें निष्क्रिय कर उनके पिता के रास्ते से हटाकर बीएसपी में नौकरी पर लगा दिया गया। उनकी छोटी पुत्री मुक्ति गुहा नियोगी जो बीएसपी हाईस्कूल में संविदा शिक्षिका के रूप में कार्य कर रही थी। कांग्रेस में प्रवेश कर दल्लीराजहरा की पालिका अध्यक्ष पद पर 5 वर्षीय कार्यकाल पूरा कर प्रदेश कांग्रेस की महासचिव बना दी गई।

इस प्रकार एक लड़ाई जो गरीबों व मजदूरों के लिए शुरू हुआ था वक्त के थपेड़ों के साथ खत्म कर दिया गया। जो परिवार कभी मोर्चा नेताओं के समक्ष दाने-दाने के लिए मोहताज रहता था। वह इस तरह आर्थिक रूप से मजबूत हो उठा। मांगों को हासिल करना व नेताओं के हत्यारों को सजा दिलाने की जिद वक्त के साथ कमजोर पड़ गया। आंदोलन के बिखरते ही वे सारे सोच खत्म हो गए। जिसे नियोगी ने रचा था। मोर्चा जो कभी ताकतवर नेतृत्वकर्ता जनसंगठन हुआ करता था अब समय के साथ नियोगी की तस्वीरों व लाल-हरा झंडे में सिमट कर रह गया है, जिन सवालों का जवाब स्वयं मोर्चा को देना नामुमकिन हो गया था वह वक्त के साथ आसान हो गया। छमुमो के प्रतिनिधि पुरोबी वर्मा जो एक दशक से दल्ली-राजहरा की पालिका अध्यक्ष के रूप में आसीन थी नियोगी की पुत्री के राह बदलते ही चुनाव हार गई थी। फर्क बस इतना कि पहले लाल-हरा झंडा था अब तिरंगा के साथ लाल भी हो गया।

पहले नियोगी व आंदोलन से जुड़े शर्तों को पूरा करने की जिम्मेदारी छमुमो की थी पर आश्चर्य देखिए छमुमो की रास्ते का कांटा उखाडक़र स्वयं विवादों से भरा अस्थि कलश को विसर्जित कर दिया। 28 सितंबर 1991 जब नियोगी की हत्या हुई थी, तब लोगों ने कहा था-‘एक सपने की हत्या कर देने की कोशिश की गई है’। आज उक्त मुहावरा फिर से हमसे पूछ रहा है कि ‘क्या साढ़े चार हजार मजदूरों को कभी कार्य में सम्मानजनक ढंग से वापसी होगी?’ क्या बेकारों और मजदूरों का आंदोलन, जो 80 के दशक की तरह सिर चढक़र बोलेगी? आंदोलन के खत्म होने के बाद जिस कांग्रेस पार्टी से नियोगी का छत्तीस का आंकड़ा था। धीरे-धीरे कांग्रेस का उनके परिवार के साथ संबंध मधुरता में बदल गया, कांग्रेस परिवार के करीब आने लगा। उनकी पत्नी के पार्षद बनते ही जोगी-आशा ने दल्ली-राजहरा की जनता को विकास की नई दिशा दिखाने की कोशिश की जो बाद में टॉय टाय फिस हो गया।

कांग्रेसी नेताओं सहित जोगी का राजहरा में भव्य स्वागत नियोगी परिवार के करकमलों से पूरा किया गया था। पहले प्रयास में पालिका चुनाव में मुक्ति कम उम्र के कारण चुनाव नहीं लड़ सकी और जन मुक्ति मोर्चा को असफलता हाथ लगी, लेकिन 2010-14 के कार्यकाल में कांग्रेस के बड़े नेताओं के साथ स्थानीय युवा ब्रिगेड ने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी, पार्टी ने परिवार से अथाह हमदर्दी दिखाकर तन-मन-धन लगाकर मुक्ति को अपने पक्ष में कर लिया। अब तो उन्हें कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में पालिका अध्यक्ष पद के बाद अब प्रदेश महासिचव का कार्यभार सौंपा है। मीडिया ने इस पर खूब लिखा। कांग्रेस का माने तो उनका कहना था। आज तक नियोगी के नाम का उपयोग छमुमो करता था, अब कांग्रेस के रूप में उनका परिवार करेगा। जो नियोगी कभी संगठन की गाडिय़ों का उपयोग अपने परिवार के लिए करने से परहेज करते थे। अब नियोगी का परिवार मुक्ति के द्वारा रचे अभिनय के बाद श्रमिक परिवारों को चिढ़ा रही है।

फिलहाल गरीब मजदूरों की लड़ाई ठंडे बस्ते में चले गई है आंदोलन ठहर गया है। नियोगी के तथाकथित समर्थक अस्थि विसर्जन के साथ अपना सिर मुड़वा चुके हैं। लेकिन ओले गिरेंगे। यह ओला मजदूरों की लड़ाई के रूप में ज्वार की तरंगे बनकर उठेगी। तब कोई नियोगी के नाम व आस्था से खिलवाड़ नहीं करेगा। वहां सही विचारों के तहत जिंदगी जीने की लड़ाई होगी। हां नियोगी और उनके नेतृत्व पर जंग जीत लेने की तमन्ना अब भी मजदूरों और किसानों के सीने में बाकी है। लेकिन उनके पांवों को दिग्भ्रमित करने वाले संगठनों ने जकड़ रखा है। देखना बाकी है कि नियोगी भक्ति के दौर से निकल कर हम उस मंजिल की ओर कब बढ़ेंगे जहां नियागी अपना आंदोलन छोड़ गए थे।

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