छब्बीस : ऐसे बिखरे, पैसे पैसे हो गये!! #बैरक_नंबर_10_बटा_4_सेन्ट्रल_जेल_ग्वालियर.

छब्बीस : ऐसे बिखरे, पैसे पैसे हो गये!! #बैरक_नंबर_10_बटा_4_सेन्ट्रल_जेल_ग्वालियर.

15.8.17

बादल सरोज की कलम से ….

जेल में उपलब्ध खाने के विकल्पों को लेकर चूल्हे अलग हो जाने और उसके बाद मीसा बन्दियों में आहार लोकतंत्र की बहार आ जाने को लेकर लिखी किंचित विस्तृत पिछली पोस्ट में एक दिलचस्प घटना छूट गयी ।
●हमारी बैरक के ठीक नीचे वाली बैरक 10/1 थी । सारे वरिष्ठ बन्धु जनों ?? का निवास और मीसा जेल का अघोषित संघ मुख्यालय इसी में था । हम लोग इसे आर्यावर्त कहते थे ।
● हमारी मैस अलग हो जाने के कोई महीने भर के भीतर ही इस आर्यावर्त में एक हादसा हुआ । इसमें असुरों-दानवों का हाथ नहीं था बल्कि समस्या एक आर्य श्री के हाथ के फिसल जाने से उत्पन्न हुयी थी ।
● हुआ यों कि इस बैरक में ही एक छोटी सी रियासत के राजा भी थे जो बाद में माधवराव सिंधिया के कांग्रेस से जुड़ने के बाद वे उन्हीके साथ रहे । मंत्री-वंत्री भी बने ।
(खुद सिंधिया 1977 तक कांग्रेस में नहीं थे । 77 का लोकसभा चुनाव उन्होंने गुना से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लड़ा था । हम उस चुनाव में जेल से निकलकर सीधे शिवपुरी-गुना में जनता पार्टी के उम्मीदवार कर्नल ढिल्लों (आज़ाद हिन्द फ़ौज के लालकिले से आयी आवाज़/सहगल,ढिल्लों,शाहनवाज़ वाले ढिल्लों) के प्रचार में थे । अपनी आँखों से देखा कि किस तरह पूरी जनसंघ ढिल्लन साब का साथ देने की भंगिमा दिखाते हुए उनके अभियान पर कब्जा किये बैठी थी और असल में सिंधिया को जिताने में तल्लीनता से लगी थी ।)
● राजा साब की खानपान की रुचियाँ ठीकठाक थीं किन्तु सोहबत पाखण्डियों की थी । उन्ही की मैस में खाते थे । हम लोगों से कोई राब्ता था नहीं इसलिए रकाबी और प्याली भी नहीं आ सकती थी ।
● आधुनिक थे इसलिये एक रास्ता उन्होंने निकाला । टिन्ड (प्रोसेस्ड और डब्बा बंद) गोश्त के डब्बे मंगा लिया करते थे । जब खाने जाते टिन्ड डब्बा साथ ले जाते, न पकाने का झंझट न सालन की खुशबू : रिन्द के रिन्द रहे हाथ से जन्नत न गयी ??
● जन्नत तो खैर क्या बचनी थी, एक दिन खाना खाके लौट रहे थे सो चिकनाई लगे हाथ से फिसल कर टिन्ड गोश्त का डब्बा ऐन बैरक के बीच गिरा और सारा डब्बा बंद सामान बिखर कर तितर बितर हो गया ।
● उसके साथ जो घटा उसे बयान करने के लिए हमे शांतिस्वरूप चाचा की कविता याद आ रही है ।
“ऐसे ऐसे कैसे कैसे हो गये
कैसे कैसे वैसे वैसे हो गये
बन्द मुट्ठी थी, खरा कलदार था
ऐसे बिखरे पैसे पैसे हो गये ।”
● आर्यावर्त में भी हमारे वाल पेपर का एक खुफिया स्रोत था । इससे पहले कि बोटियाँ बीनी जातीं और उनका श्राद्द सम्पन्न होता खबर आम हो चुकी थी । बात अनुमानों तक पहुँच चुकी थी कि डिब्बे की वैतरणी में डुबकी लगाने वाले कौन कौन हैं ? कि गिरने के बाद के छीटे कहाँ कहाँ तक पहुंचे ? कि तब किस किस की शक्ल पर कितने कितने बजे थे ?
● बहस और विश्लेषणों का असल मुद्दा यह था कि आखिर उसमें था क्या : बीफ या पोर्क ? हमारे साथ एक अभिजात्य उत्साही आर एन कुमार थे, जिन्हें सब राम कहते थे । उन्होंने जेल जीवन पर एक किताब भी लिखी है । वे विदेश घूमे थे, देश में भी उच्च जीवन स्तर जीये थे । एक बार किसी मामले में ज़िद में आकर तबके कोयला मंत्री दलबीर सिंह को उन्ही के दफ्तर में बंधक बना लिया था – उसी के चलते मीसा में थे ।
● राम ने अपने अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों के आधार पर बताया कि टिन्ड गोश्त दुनिया का सबसे लोकप्रिय प्रोसेस्ड फ़ूड है । यह दो ही तरह का होता है । बीफ या पोर्क …. बहुत ही थोड़े से अफ़्रीकी देशों में लैम्ब का भी होता है । मगर उसकी उपयोगिता समय सिर्फ तीन माह होती है । जबकि बीफ और पोर्क प्रोसेस्ड होने के बाद 9 महीने से 1 साल तक चल सकता है ।
● हिन्दुस्तान में अभी यह तकनीक नहीं आयी । (तब तक हजारों गाय भैंसों को मशीन से काटकर दुनिया भर में बीफ एक्सपोर्ट कम्पनियां, जो भाजपा को चन्दा देती रहती हैं, अस्तित्व में नहीं आयी थीं । प्रसंगवश, भारतीय डब्बा बंद प्रोसेस्ड गोश्त की पहली कम्पनी प्रथम विश्वयुध्द के वक़्त खुली थी। अंग्रेज फ़ौज के लिए बीफ की सप्लाई का पूरा ठेका इसी कम्पनी के पास था । इस कम्पनी के मालिक थे डालमिया । विष्णु हरी डालमिया के पिताश्री । दूसरी जंग में इसे जारी रखा विष्णु हरी डालमिया ने !! आप भूल तो नही गए ? वे ही जो रामन्मभूमि आंदोलन के नायक थे और विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष । एक बार उन्होंने कहा था कि जिस प्रकार धंधे के लिए धर्म नहीं छोड़ा जा सकता, उसी तरह धर्म के लिए धंधा कैसे छोड़ा जा सकता है !!
● अब इस इंटरनेशनल एक्सपर्ट रिपोर्ट के बाद तय करना यही बचता था कि बीफ था या पोर्क : जो भी था आर्यावर्त के लिये तो मुश्किल ही था । शान्तम पापम् शान्तम पापम बीफ मंझे गाय जो उनकी माता है (भले विदेशी सही) और पोर्क माने सूअर यानी वराह जो भगवान् विष्णु के अवतार हैं । फिर इनका तो जेल मैन्युअल में जिक्र तक नहीं था ।
● हम अण्डे और मटन के कानूनी राशन को लेकर हिल्ले लगाये जा रहे थे और भाई लोग चोरी चोरी चुपके चुपके बीफ और पोर्क का डिनर उड़ाये जा रहे थे ।
● वरिष्ठ आर्य का कुछ नहीं बिगड़ा वे राजा थे। सुबह आर्यावर्त की धुलाई जरूर ढंगढौर से हुयी । कुछ अगरबत्तियां सुलगीं । कुछ चेहरे 5-7 दिन तक मुरझाये रहे । मुमकिन है बाद में कुछ कटोरिया-रकाबियां-प्यालियाँ उनके टिन्ड प्रोसेस्ड भण्डार में जाना शुरू हो गयी हों ।
● इसके बाद किसकी मजाल थी जो हमारे मैस अलग करने पर सवाल उठाता । हां, कटोरियाँ जरूर बढ़ गयी, देर रात की बजाए शाम को ही आने लगीं । कुछ दिलेर तो हमारी मैस में ही खाने के लिए आ जाने लगे ।
● नतीजा यह निकला कि शोरबा बढ़ने लगा, नमक की मात्रा बढ़ गयी : मगर होके मायूस कोई दर से सवाली न गया ।

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