मेरी रात मेरी सडक ” : बिलासपुर में रात 11 बजे  आज़ादी के लिए निकली महिलाये .

मेरी रात मेरी सडक ” : बिलासपुर में रात 11 बजे  आज़ादी के लिए निकली महिलाये .

मेरी रात मेरी सडक ” : बिलासपुर में रात 11 बजे  आज़ादी के लिए निकली महिलाये .

” मेरी रात मेरी सडक ” : बिलासपुर में रात 11 बजे  आज़ादी के लिए निकली महिलाये .

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13.8.17 बिलासपुर

#MeriRaatMeriSada

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आज हमारे  देश  में ही नहीं विश्व भर में महिलाएं रात के अंधियारे में अपने घरों, होस्टलों और अन्य निवास स्थान की चार दिवारी में कैद है.

अपनी रात- अपनी सड़क एक आह्वान है, इस दमनकारी समाज को जो बातें तो करती है समानता की, पर महिलाओं को सुरक्षा, सभ्यता, संस्कार, और सामाजिक नियमों में बांधकर शोषित करती है. आज देश भर के 24 – 25 शहरों में  और छत्तीसगढ़ के 4 – 5 शहरों में महिलाएं एकत्रित होकर, समाज से, सरकार से, और अपने आपसे सवाल करती है कि कब तक इन जंजीरों में घुट घुटकर जीयेंगें ? कब तक पित्रसत्ता की जीत होगी?  कब तक यह रात, यह सड़क पुरुषों की जागीर  रहेगी . इन संस्कार के ठेकेदारों से अपना हक वापस लेने  की यह  पहल हैं .

 

आज जिस प्रकार का लैंगिक, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक शोषण महिलाओं के खिलाफ रातों को सड़कों में हो रहा है, ये केवल कुछ असमाजिक तत्वों के हाथों नहीं  ,  बल्कि यह सभी तत्त्व  पित्रसत्तात्मक समाज की उपज है जहाँ पर औरतों और ट्रांसजेंडर लोगों को नाम मात्र का अधिकार दिया गया है और समाज और सत्ता में बैठे लोग, जो की वास्तव में अधिकतर पुरुष ही हैं  की जवाबदारी बनती है.

आज लगातार हो रही हिंसा को असमाजिक तत्वों के हाथों बताकर समाज और सरकार अपनी खुद की जिम्मेदारी से पीछे हट जाते है. हमें  समाज और सरकार से पूछना है कि अगर सडकें सुरक्षित नहीं हैं तो उन सड़कों को सुरक्षित  बनाने का प्रयास क्यों नहीं  किया जाता है.

 

चंडीगढ़ में हुई दुर्घटना में जहाँ पर एक महिला वर्णिका कुंडू , जब वह रात में गाड़ी चला रही थी, एक पुरुष विकाश बराला ने अपने सहयोगी आशीष कुमार के साथ पीछा किया और उसकी गाड़ी के दरवाजें को बलात खोलने का प्रयत्न किया, यह एक ही बार हुई घटना नहीं है, ना ही उस पर इस  प्रकार की पहली  विपत्ति है , जो की नेताओं और सोशल मीडिया द्वारा  लगातार दी जा रही है, वह कोई नयी बात हैं.  हर घटना के बाद हमारे  समाज में सबसे पहले सवाल यही पूछा जाता हैं के वो बाहर सड़क या रास्ते में क्यो थी, क्या कर रही थी?

 

आज छत्तीसगढ़ में, खासकर दक्षिण छत्तीसगढ़ में आदिवासी महिलाओं पर सुरक्षा के नाम पर लगातार लैंगिक शोषण किया जा रहा है. हाल ही में दंतेवाडा जिले में पालनार में सुरक्षा बल के सिपाहियों ने नाबालिक आदिवासी छात्राओं के साथ उनके विद्यालय में रक्षा बंधन की आड़ में घुसकर उनके साथ में छेडखानी करी. मानव अधिकार आयोग ने बीजापुर जिले में कई गाँव में हुए सामूहिक लैंगिक हिंसा पर छत्तीसगढ़ सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया है. दक्षिण छत्तीसगढ़ में महिलाओं को जितना चुप कराने का प्रयत्न सरकार करती है, उनकी आवाज़ उतनी ही बुलंद होती जा रही है.

 

आज रात देश भर में अपनी सहेलियों के संघर्ष से प्रेरणा लेते हुए, हम महिलाएं बिलासपुर की सड़कों में उतर कर अपनी उपस्थिति दर्ज करायेंगी . हमारा कहना है कि यह हमारी सड़क हैं, हमारी रात है, हम चाहे जहा भी जाएँ, जो भी कारण जाएँ , हमारी मर्ज़ी है, हमारा अधिकार है.

 

कार्यक्रम ;

 

दिनांक 12 अगस्त [ शनीवार ] रात 11 बजे

नेहरुचौक पर एकत्रित होकर मार्च व कार्यक्रम किया।
मार्च में साथी अनुपमा सक्सेना,डॉ सत्यभामा अवस्थी,राशि,मधु शर्मा,निकिता अग्रवाल,ट्रांसजेंडर महिला रेशमा, शालिनी गेरा,अशिता अवस्थी,प्रतिमा,निरुपमा बाजपेई, नेहा कश्यप, प्रियंका,अनुभा शर्मा,कल्याणी धीवर,ऋतु, चम्पा आदि सहित तमाम महिला साथियो की नेहरू युवा केन्द्र की लड़कियां, कॉलेज व स्कूल की छात्राएं उपस्थित हुए। कार्यक्रम लगभग 2 से ढाई घण्टे चला। कार्यक्रम का नेतृत्व व संचालन प्रियंका शुक्ला( अधिवक्ता) ने किया।
साथ ही महिलाओ के इस आंदोलन को समर्थन देने तमाम पुरुष साथी भी सड़को पर उतरे।।

 

#Meriraatmerisadak
7505954475
प्रियंका शुक्ला( अधिवक्ता)

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